जयप्रकाश नारायण : जब एक साथ रोए थे इंदिरा और जेपी, इतिहास में दर्ज है ये रोचक किस्सा

Jayaprakash Narayan Death Anniversary  - Sakshi Samachar

लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्म यूपी के बलिया में हुआ था

जेपी का निधन बीमारी के बाद पटना में 8 अक्टूबर 1979 को हुआ

आजादी के बाद देश के सबसे बड़े आंदोलन का किया नेतृत्व

नई दिल्ली : 'एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूं कहे इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।' हिंदी साहित्य के महान कवियों में शुमार दुष्यंत कुमार ने यह पंक्ति लोकनायक जयप्रकाश नारायण के लिए खिला थी। आजादी के बाद देश के सबसे बड़े आंदोलन का नेतृत्व करने वाले जयप्रकाश नारायण को देश का दूसरा गांधी भी कहा जाता था। लोकतंत्र पर आपातकाल की मंडराती काली छाया को जेपी ने अपने हौसले से दूर कर दिया था।  8 अक्टूबर 1979 को पटना स्थित आवास पर जयप्रकाश नारायण का निधन हो गया था। उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन से जुड़ी कई अहम बातें।

जयप्रकाश नारायण को जेपी के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म 11 अक्टूबर 1902 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिताब दियारा इलाके में हुआ था। जयप्रकाश नारायण ने जलियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में ब्रिटिश शैली के स्कूलों को छोड़कर बिहार विद्यापीठ से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की और इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए। उन्होंने करीब आठ साल तक वहां पढ़ाई की। 1922-1929 के बीच जेपी ने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में समाज-शास्त्र का गहन अध्ययन किया।

अमेरिका से लौटकर कूदे आजादी की लड़ाई में

साल 1929 में जब जयप्रकाश नारायण अमेरिका से लौटे, तो पूरे भारत में आजादी की लड़ाई जोरों पर थी। उनका संपर्क जवाहर लाल नेहरू से हुआ। इस तरह वह स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। 1932 में महात्मा गांधी, नेहरु और अन्य महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं के जेल जाने के बाद, उन्होंने भारत में अलग-अलग हिस्सों में संग्राम का नेतृत्व किया। आखिरकार उन्हें भी मद्रास में सितम्बर 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक के जेल में भेज दिया गया। 

...जब सेंट्रल जेल से फरार हो गए जेपी

साल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब कांग्रेस के सभी बड़े नेता जेल में डाल दिए गए तो जंग-ए-आजादी में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया। उस वक्त जयप्रकाश नारायण हजारीबाग की सेंट्रल जेल से फरार हो गए और आंदोलन में नई जान आ गई। पंजाब में चलती ट्रेन में उन्हें दोबारा सितम्बर 1943 में गिरफ्तार किया गया। जब कांग्रेस नेताओं और अंग्रेजों की बातचीत शुरू हुई तो गांधीजी ने साफ कहा कि डॉ लोहिया और जेपी की रिहाई के बगैर अंग्रेजों से कोई बातचीत नहीं होगी।

जेपी की एक अपील पर डाकुओं ने किया था आत्मसमर्पण

जयप्रकाश को जानने वाले बताते हैं कि सक्रिय राजनीति से दूरी के बाद भी जब जहां जिस रूप में लोकनायक की जरूरत हुई जयप्रकाश वहां पहुंच गए। चंबल में जब दस्यु गिरोह का आतंक इस कदर बढ़ गया कि लोगों का जीना मुश्किल हो गया, तो जेपी की एक अपील पर सैकड़ों कुख्यात डकैतों ने सरेंडर कर दिया।

आपातकाल में जेल गए

सभी जानते हैं कि जेपी इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध थे। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन किया। उनके नेतृत्व में पीपुल्स फ्रंट ने गुजरात राज्य का चुनाव जीता। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की जिसके अन्तर्गत जेपी सहित 600 से भी अधिक विरोधी नेताओं को बन्दी बनाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गयी। हालांकि तबीयत खराब होने के चलते उन्हें सात महीने बाद जेल से आजाद कर दिया गया।

इंदिरा के साथ जेपी भी रोए

मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जनता की नाराजगी उठानी पड़ी। कांग्रेस का बुरी तरह पूरी देश में सफाया हुआ और इंदिरा गांधी को कुर्सी छोड़नी पड़ी। मोरारजी देसाई की अगुवाई में जनता पार्टी की सरकार बनी। जिस वक्त दिल्ली के रामलीला मैदान में शपथ कार्यक्रम चल रहा था, उस वक्त जयप्रकाश नारायण कार्यक्रम से दूर गांधी शांति प्रतिष्ठान के अपने कमरे से निकलकर सफदरजंग रोड की एक नंबर की कोठी में गए, जहां इंदिरा गांधी रहती थीं। इंदिरा गांधी के साथ उनके सिर्फ एक सहयोगी एचवाई शारदा प्रसाद थे और जेपी के साथ गांधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री राधाकृष्ण और वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी। इस मुलाकात के दौरान इंदिरा गांधी रोई और जेपी भी रोए। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि ये लोकनायक के व्यक्तित्व का सर्वोत्तम गुण था।

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