IIM के पूर्व निदेशक पद्मश्री डॉ. प्रीतम सिंह के निधन से युवा प्रोफेशनल्स में मायूसी

IIM Former Director Dr Preetam Singh memoir  - Sakshi Samachar

IIM के पूर्व निदेशक पद्मश्री डॉ. प्रीतम सिंह की खास बातें

युवा प्रोफेशनल्स और छात्रों के बीच रहे लोकप्रिय 

नई दिल्ली: आईआईएम के पूर्व निदेशक पद्मश्री डॉ प्रीतम सिंह के हाल ही में निधन के बाद शिक्षा जगत में शोक की लहर है। उनकी याद में कई शोक सभाएं आयोजित की जा रही हैं। शिक्षाविद, लेखक और भारतीय प्रबंध संस्थान लखनऊ तथा प्रबंध विकास संस्थान (एमडीआई) गुरुग्राम के निदेशक रह चुके डॉ सिंह का व्यक्तित्व अनूठा था। अपने अभिभावकत्व में उन्होंने न जाने कितने ही छात्रों का करियर संवारा। प्रबंधन गुरू प्रीतम सिंह के असामयिक बिछोह से युवा प्रोफेशनल्स बेहद मायूस हैं। 

पद्मश्री डॉ प्रीतम सिंह अपनी रौ में जिंदगी जीने के आदी थे। जब दुनिया से रुखसत हुए तो इस तरह जैसे हवा का कोई झोंका सबकुछ उड़ा कर ले जाता है। परिवार के मुताबिक 79 वर्षीय डॉ सिंह बिल्कुल फिट थे। संयमित खान पान और दिनचर्या के कारण उन्होंने कभी थकान महसूस नहीं की। माइल्ड हार्ट अटैक के कारण उन्हें परेशानी जरूर हुई और डॉक्टर से संपर्क किया गया। शारीरिक परेशानियों के बावजूद डॉ सिंह ने हौसला बनाए रखा। दिल का दौरा पड़ने के कई दिनों बाद तक वे खुद को संभाले रखे। आखिरकार अचानक तकलीफ बढ़ने पर उन्हें दोबारा दिल्ली स्थित मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्हें बचाया नहीं जा सका। 

क्लास लेने का अनूठा तरीका 

डॉ प्रीतम सिंह के पढ़ाने का तरीका भी अनूठा था। प्रबंधन की गूढ बातों को भी वे बेहद सरल व हल्के फुल्के तरीके से समझाते थे। अक्सर हवाला देने के लिए वो गीता के श्लोक और मुल्ला नसीरुद्दीन से जुड़े वाकये सुनाते। असर ये होता कि छात्रों के दिमाग में बड़ी और मोटी बातें भी आसानी से पहुंच पाती थी। डॉ सिंह हमेशा छात्रों के सकारात्मक पक्ष को तरजीह देते थे। उनका मानना था कि कमजोर से कमजोर छात्र में भी कुछ ऐसी बात होती है, जिससे दुनिया बदली जा सकती है। 

छात्रों के साथ दोस्ताना रवैया 

प्रबंधन संस्थान में डॉ सिंह का रवैया अपने छात्रों के प्रति बेहद दोस्ताना रहा। उनकी व्यक्तिगत परेशानियों को भी वे आत्मसात करते और किसी दोस्त की ही तरह हाथ बंटाते थे। मुश्किल समय में डॉ सिंह अपने छात्रों के अजीज दोस्त बन जाया करते थे। उनकी जिंदादिली ने उन्हें संस्थान में बेहद लोकप्रिय बना दिया था। 

एमडीआई को पहुंचाया मुकाम पर 

प्रबंध विकास संस्थान यानी एमडीआई को आज जो प्रतिष्ठा और मुकाम हासिल है उसमें डॉ प्रीतम सिंह का बड़ा योगदान माना जाता है। गुरुग्राम के एमडीआई में उन्होंने 1994 से 1998 और फिर 2003 से 2006 तक बतौर निदेशक दो बार सेवाएं दीं। लगातार सात सालों तक किसी संस्थान का नेतृत्व करना बूते की बात है। इस दौरान डॉ सिंह ने न सिर्फ संस्थान में शैक्षिक गुणवत्ता पर ध्यान दिया। बल्कि युवाओं को संघर्षशील बनने के लिए भी प्रेरित करते रहे। साल 1998 से 2003 तक भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम), लखनऊ में पांच सालों तक बतौर निदेशक सेवाएं दी। डॉ सिंह ने इस दौरान आईआईएम की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाया। आईआईएम से विदा लेने के बाद एक बार फिर एमडीआई की बागडोर संभाली और दूसरे कार्यकाल में संस्थान को सुदृढ़ करने में खुद को खपा दिया। 

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डॉ सिंह ऐसे शिक्षाविद् थे जिनमें प्रशासनिक गुण भी कूट कूटकर भरा था। निदेशक होने के बावजूद अक्सर युवा छात्रों के बीच वक्त बिताना पसंद करते थे। जब संस्थान के काम काज से फुर्सत मिलती तो किताबें लिखने में वक्त बिताते थे। डॉ सिंह के इसी जुझारू व्यक्तित्व के कारण उन्हें केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री के एंपावर्ड एक्सपर्ट कमेटी (ईईसी) का सदस्य बनाया। सरकारी समिति में रहते हुए डॉ सिंह ने अपनी बात रखने में कभी हिचकिचाहट महसूस नहीं की। बड़ी से बड़ी बात वे चुटकी में अधिकारियों को समझा पाते थे। 

डॉ प्रीतम सिंह जैसे महान शिक्षाविद् का विदा लेना एक शून्य की स्थिति पैदा करता है। ऐसा लगता है कि शैक्षणिक जगत में अभिभावक का रोल अदा करने वाली एक पीढ़ी ही हमसे विदा हो गई। मिर्जापुर जिले की आदर्श नगर पंचायत कछवां के पांडेयपुर वार्ड निवासी डॉ प्रीतम सिंह अपने इलाके से भी हमेशा जुड़े रहे। 

डॉ प्रीतम सिंह के परिवार में फिलहाल तीन बेटे डॉ. विकास सिंह, डॉ. विपुल सिंह, विधान सिंह और दो पुत्रियां सविता राय और अलका चावला के अलावा उनकी पत्नी सरोज और पोते पोतियां हैं। डॉ. प्रीतम सिंह के पुत्र डॉ. विवेक सिंह का 5 साल पहले निधन हो चुका है। ये डॉ सिंह का संस्कार ही था कि घर में आज भी पढ़ने लिखने का माहौल है। परिवार में पैसा कमाने से अधिक ज्ञानार्जन को तरजीह दी जाती है। 
 

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