गजब के शायर थे कैफी आजमी, आज भी चाव से पढ़ी जाती है इनकी शायरी

famous lyricist poet  Kaifi Azmi death anniversary - Sakshi Samachar

मशहूर शायर व गीतकार कैफी आजमी

कैफी आजमी की पुण्यतिथि 

कौन नहीं जानता मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी को। इनकी शायरी गजब की थी तो कमाल के थे इनके गीत।  उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में पैदा हुए सैयद अतहर हुसैन रिजवी यानी कैफ़ी आज़मी ने अपने लेखन के जरिए खूब नाम कमाया।
 कैफ़ी आज़मी प्रेम की कविताओं से लेकर बॉलीवुड गीत, पटकथा लिखने में माहिर थे। 20वीं सदी के सबसे प्रसिद्ध शायरों में एक कैफ़ी आज़मी ने अपनी पहली कविता 11 साल की उम्र में लिखी थी। कैफ़ी आज़मी उस वक्त 1942 में हुए महात्मा गांधी के भारत छोड़ा आंदोलन से प्रेरित थे।

उर्दू के इस अज़ीम शायर कैफी आज़मी का जन्म आजमगढ़ जिले के मिजवां गांव में 14 जनवरी 1919 को हुआ था और 10 मई 2002 को कैफी का निधन हुआ।  कैफी आजमी एक ऐसे शायर थे जिन्होंने अपनी शायरी में सामाजिक न्याय और समानता को अहमियत दी।  कैफी सैयद अतहर हुसैन रिजवी उर्फ कैफी आजमी के पिता जमींदार थे। कैफी आजमी ने महज 11 साल की उम्र से ही मुशायरों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। जहां उन्हें काफी तारीफें भी मिलती थी। 

कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि पर पढ़िये उनके ये 5 मशहूर शेर...

बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में 
कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमां जो बस गए 
इंसां की शक्ल देखने को हम तरस गए 

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह 
जी ख़ुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े 

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं 

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले 
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है 

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था 
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा 

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ 
यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता 

ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उस की धूप 
क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बाद 

बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें 
मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले 

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क 
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े 

1944 में सिर्फ 26 साल की उम्र में पहला संग्रह 'झनकार' छपी थी। उनकी 5 रचनाएं, आज भी लोगों की जुबान पर रहती है।

राह में टूट गये पांव तो मालूम हुआ
जुज मेरे और मेरा राहनुमा कोई नहीं
एक के बाद खुदा एक चला आता था
कह दिया अक्ल ने तंग आके खुदा कोई नहीं 
(आवारा सज्दे)

आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है

या बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद उनकी यह नज्म सोचने वाले हर शख्स की जुबान पर गूंजने लगी. 
राम बनबास से जब लौट के घर में आये
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये
राजधानी कि फिजा आई नहीं रास मुझे
छे दिसम्बर को मिला दूसरा बनबास मुझे
(दूसरा बनबास)

ख़ारो-ख़स तो उठें, रास्ता तो चले
मैं अगर थक गया, काफ़िला तो चले
चाँद-सूरज बुजुर्गों के नक़्शे-क़दम
ख़ैर बुझने दो इनको, हवा तो चले
हाकिमे-शहर, ये भी कोई शहर है
मस्जिदें बन्द हैं, मयकदा तो चले
(काफिला तो चले)

ये जीत-हार तो इस दौर का मुक्द्दर है
ये दौर जो के पुराना नही नया भी नहीं
ये दौर जो सज़ा भी नही जज़ा भी नहीं
ये दौर जिसका बा-जहिर कोइ खुदा भी नहीं
(दो-पहर)

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
तू कि बेजान खिलौनों से बहल जाती है
तपती सांसों की हरारत से पिघल जाती है
पांव जिस राह में रखती है फिसल जाती है
बनके सीमाब हर इक ज़र्फ में ढल जाती है
जीस्त के आहनी सांचे में भी ढलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

(औरत)

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