कार्टूनिस्ट लक्ष्मण थे बाला साहब के गुरु, इंदिरा गांधी भी नहीं डरा सकीं 'आरके' को

Cartoonist RK Laxman Birth Anniversary special - Sakshi Samachar

आरके लक्ष्मण की जयंती पर विशेष

लक्ष्मण के कार्टून्स एमरजेंसी में हुए थे फेमस 

बाला साहब के गहरे दोस्त थे आरके 

पुणे: 24 अक्टूबर 1921 को आरके मैसूर में मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण का जन्म हुआ था। उन्हें कार्टून की दुनिया में मशहूर 'द कॉमन मैन' का निर्माता होने का गौरव हासिल है। हम यहां कार्टूनिस्ट लक्ष्मण की कई खास बातें शेयर कर रहे हैं। आपको आर.के लक्ष्मण के कार्टून्स की ताकत का इसी बात से अंदाजा लगेगा कि एमरजेंसी के दौर में आरके कार्टून्स पर बैन लगा दिया गया था। मजे की बात ये कि लक्ष्मण तमाम धमकियों के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आगे नहीं झुके। उन्होंने उस समय की पीएम के खिलाफ कार्टून बनाना जारी रखा। 

बाला साहब मानते थे आरके को गुरु 

दिग्गज नेता बाला साहब ठाकरे आरके लक्ष्मण को अपना गुरु मानते थे। बता दें कि बाला साहब ने भी करियर की शुरुआत कार्टूनिस्ट के तौर पर ही की थी। लक्ष्मण के धारदार और चुटीले कार्टून आम लोगों के जेहन पर तत्काल हिट किया करते थे। कुछ ऐसी ही खासियत बाला साहब के कार्टून्स में भी हुआ करती थी। जब बाला साहब ने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली तो जाहिर है उनके कार्टून्स की सार्वभौमिकता खत्म हो गई। ठाकरे एक खास विचारधारा में बंध गए थे। जबकि उनके गुरु आर के लक्ष्मण ने कभी किसी एक राजनीतिक पार्टी की धारा को नहीं पकड़ी। 

जब आरके लक्ष्मण से खफा हुई थीं इंदिरा गांधी 

आरके लक्ष्मण के कार्टून्स ने एमरजेंसी में भी धूम मचाया था। एक वाकया ऐसा भी था जब इंदिरा गांधी आरके के बनाये कार्टून को लेकर सख्त खफा हो गई थीं। एमरजेंसी में राजनीतिक कार्टून्स पर पाबंदी थी। बावजूद इसके लक्ष्मण ने डी के बरूआ के वक्तव्य ' इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा' पर कार्टून बनाया था। इस कार्टून को लेकर इंदिरा ने इसे अपमानजनक बताया था। आरके से संपर्क कर इंदिरा ने उन्हें उलाहना देते हुए कहा था कि आपको ऐसे कार्टून नहीं बनाने चाहिए। घटना के कुछ ही दिनों बाद आरके लक्ष्मण मॉरिशस चले गए थे। इसके बाद एमरजेंसी खत्म होने के उपरांत ही भारत लौटे थे। भारत लौटने पर आरके ने इंदिरा गांधी के खिलाफ धारदार कार्टून्स बनाने जारी रखे। 
 
राजनीतिका खामियों पर कटाक्ष करते थे कार्टून्स

आरके लक्ष्मण के कार्टून्स समसामयिक राजनितक विकृतियों और खामियों को निशाना बनाती थी। इनके कार्टून्स खासकर आम लोगों की समस्याओं के बेहद करीब हुआ करती थी। कटाक्ष ऐसा कि लोग कई बार सोचने के लिए मजबूर हो जाया करते थे। 

बाला साहब और आरके के बीच थी गहरी दोस्ती 

बाल ठाकरे आरके लक्ष्मण को अपना सबसे गहरा दोस्त मानते थे। तभी तो निधन से ऐन पहले बाला साहब ठाकरे ने आर के से ही मिलने की इच्छा जाहिर की थी। हालांकि मुलाकात संभव नहीं हो पाई तो बाला साहब ने फोन पर आरके से गुफ्तगू की थी। करियर के शुरुआती दौर में आरके और बाला साहब ठाकरे ने साथ काम किया था। हालांकि वक्त के साथ दोनों की राहें जुदा होती चली गई।  

आरके ने बनाया था 'कॉमन मैन' का किरदार 

आर के लक्ष्मण का सबसे चर्चित कार्टून किरदार 'कॉमन मैन' था। जिसकी पहचान मुड़ी-चुड़ी धोती,चारखाना कोट, सिर पर बचे चंद बाल और टेढा चश्मा थी। आम आदमी सरीखे दिखने वाला ये किरदार आम लोगों के बीच बेहद पोपुलर था। आम आदमी के किरदार वाले कार्टून्स की लोकप्रियता ऐसी थी कि सन् 1985 में इसकी प्रदर्शनी लंदन में लगाई गई थी। 

जे.जे. स्कूल ने नहीं दिया था प्रवेश 

जिस तरह कभी संघर्ष के दिनों में अमिताभ बच्चन को ऑडिशन में छांट दिया गया था। कुछ ऐसा ही वाकया आरके के साथ भी हुआ। हाई स्कूल पास करने के बाद लक्ष्मण ने मुंबई के 'जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स' में प्रवेश के लिए आवेदन किया। लेकिन कॉलेज के डीन ने यह कहकर दाखिला देने से मना कर दिया कि उनके चित्रों में कोई खास बात नजर नहीं आती है। इसके बाद में आर के ने मैसूर विश्वविद्यालय से बी.ए किया। कॉलेज के जमाने में ही आरके ने स्वराज्य पत्रिका और एक एनिमेटेड मैगजीन के लिए कार्टून्स बनाए। जिसकी लोगों ने खूब तारीफ की थी। आरके लक्ष्मण स्वराज्य, ब्लिट्ज, दि हिंदू जैसी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में काम किया। लक्ष्मण के बड़े भाई आरके नारायण की कहानियां भी बेहद लोकप्रिय हैं। 

बचपन से ही चित्र बनाने का था शौक

आर के लक्ष्मण घर में 6 भाई बहनों में सबसे छोटे थे। वो अक्सर फर्श, दरवाजों और दीवारों पर चित्रकारी किया करते थे। जिसके चलते उन्हें डांट भी सुननी पड़ती थी। हालांकि स्कूल में एक बार पीपल के पत्ते पर चित्रकारी करने को लेकर उन्हें खूब वाहवाही मिली थी। पिता के असमय निधन के बाद आरके को काफी संघर्ष भी करना पड़ा था। 'द फ्री प्रेस जर्नल' में नौकरी मिलने से पहले वो छोटे मोटे काम करके गुजर बसर किया करते थे। बाद में आर के ने 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' भी ज्वाइन की थी। आरके ने अपने करियर का सर्वाधिक समय टाइम्स ऑफ इंडिया को ही दिया। 2003 में लक्ष्मण को लकवे का अटैक हुआ। जिंदगी के आखिरी दिन आरके ने पुणे में गुजारे थे। लक्ष्मण को पद्म भूषण, पद्म विभूषण और 1984 में रमन मैग्सेसे पुरस्कारों से नवाजा गया था। 

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