क्या भाजपा को नापसंद लगने लगे हैं 'ब्लैकमेल' करने वाले साथी, पहले शिवसेना अब अकाली दल, कौन होगा अगला

After Shiv Sena Shiromani Akali Dal Quit NDA  - Sakshi Samachar

एनडीए गठबंधन से अलग हुआ अकाली दल

शिवसेना के बाद अकाली दल ने किया भाजपा से किनारा

बिहार में राम विलास पासवान की पार्टी भी हो सकती है अलग

नई दिल्ली : कृषि बिल के खिलाफ शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा से 22 साल पुरानी दोस्ती तोड़ते हुए एनडीए से अलग होने का फैसला किया है। शिवसेना के बाद अकाली दल दूसरी ऐसी पार्टी है, जो एनडीए से अलग हो गई है। सियासी गलियारे में अब चर्चा तेज हो गई है कि जिस गठबंधन की नींव पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी ने रखी थीं, क्या वह अब दरकने लगी है।

किसान बिलों का विरोध करते हुए मोदी सरकार से हरसिमरत कौर बादल के केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफे के बाद शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा को अब एक और झटका दिया है। पार्टी ने किसान बिलों के खिलाफ लड़ाई तेज करते हुए राजग (एनडीए) और भाजपा से 22 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया है। शिरोमणि अकाली दल का यह फैसला इसलिए भी अहम है, क्योंकि साल 2022 में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं।

किसानों को नाराज नहीं करना चाहती अकाली दल

कृषि बिल के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर कर चुकी शिरोमणि अकाली दल राज्य में किसानों की बेरुखी नहीं झेलना चाहती, इसलिए उसने एनडीए से अलग होने का फैसला किया है। पंजाब में दो साल बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। अकाली दल का मुख्य वोट बैंक किसान ही हैं। ऐसे में भाजपा के साथ गठबंधन में रहकर अकाली दल चुनाव में अपना नुकसान नहीं कराना चाहती है।

साल 2017 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा का एक धड़ा पंजाब में अकाली दल से अलग होकर चुनाव लड़ने की वकालत कर रहा था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने सबसे पुराने सहयोगी दल और उसके बुजुर्ग नेता प्रकाश सिंह बादल का साथ न छोड़ने का फैसला किया और मिलकर चुनाव लड़ा। इसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ा था। भाजपा भी अब यह चाहती है कि वह पंजाब में अकेले दम पर सशक्त हो और अकाली दल के प्रभाव से बाहर निकले। 

शिवसेना पहले ही हो चुकी है अलग

कभी एनडीए गठबंधन का सबसे प्रमुख दल रहा शिवसेना अब कांग्रेस और एनसीपी के साथ है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा और शिवसेना में मतभेद हुए। यह पहला मौका नहीं था जब भाजपा और शिवसेना के बीच मनमुटाव हुआ हो। 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर भाजपा और शिवसेना अलग अलग चुनाव लड़े लेकिन चुनाव के बाद दोनों ने मिलकर सरकार बनाई। 2019 के लोकसभा चुनावों तकभाजपा और शिवसेना के बीच खासी दरार आ गई थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने शिवसेना के साथ गठबंधन टूटने नहीं दिया और पहले लोकसभा फिर विधानसभा चुनावों में दोनों दल मिलजुल कर मैदान में उतरे और जीते। 

महाराष्ट्र में पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन परिणाम के बाद शिवसेना अपना मुख्यमंत्री बनाने पर अमादा हो गई। भाजपा ने शिवसेना की शर्त नहीं मानी और सीएम पद देने से इनकार कर दिया। आखिरकार शिवसेना ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाल मिलाकर सरकार बनाई और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने। 

क्या बिहार में गठबंधन के नाम पर होगी राजनीतिक सौदेबाजी

पंजाब में अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना के बाद अब नंबर बिहार का आता है। यहां विधानसभा चुनाव होने में एक महीने से भी कम समय बचा है। गठबंधन को लेकर सभी दल एक-दूसरे से संपर्क कर रहे हैं। इस दौरान राजनीतिक सौदे बाजी भी जमकर देखने को मिल रही है। कभी एनडीए छोड़कर महागठबंधन में शामिल हुए जीतन राम मांझी एक बार फिर राजग में शामिल हो गए हैं, जबकि उपेंद्र कुशवाहा का हाल किसी से छुपा नहीं है। कहा जाए तो बिहार में एनडीए मजबूत हुआ है।

ऐसा नहीं है कि वहां सब ठीक है। राम विलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी एनडीए में है, लेकिन सीट बंटवारे से वह खुश नहीं है। चिराग पासवान पहले ही बगावती सुर अपनाए हुए हैं। ऐसे में वह कभी भी एनडीए से अलग हो सकते हैं। आने वाले दिन में अगर लोजपा भी एनडीए से अपना नाता तोड़ लेती है तो कोई चौंकाने वाली बात नहीं होगी।

साथी छूटें तो छूटें, फैसले पर अडिग भाजपा

महाराष्ट्र में शिवसेना को सीएम पद न देकर विपक्ष में बैठना हो या फिर कृषि बिल पास करके अकाली दल की नाराजगी मोल लेना हो, पीएम नरेंद्र मोदी ने यह तय जरूर कर लिया है कि वह अपने फैसले पर अडिग रहेंगे फिर चाहे पुराने साथी उनके साथ हों या न हों। मोदी सरकार ने बीते कुछ समय में कई ऐसे फैसले किए जिससे यह बात साफ हो गई है कि गठबंधन के नाम पर 'ब्लैकमेल' करने वाली राजनीति फिलहाल नहीं चलेगी।

24 दलों से मिलकर बना था एनडीए 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गैर कांग्रेसी दलों को एकजुट करके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बनाया था,उसमें करीब 24 छोटे बड़े दल शामिल थे, जिनमें प्रमुख रूप से भाजपा, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना,जनता दल(एकीकृत), लोक जनशक्ति पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, तेलुगू देशम, बीजू जनता दल, नेशनल कांफ्रेंस आदि थे। इनमें से वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के आखिरी दौर में द्रमुक एनडीए से बाहर हुआ और उसकी जगह अन्ना द्रमुक ने ले ली। 2004 में भाजपा के चुनाव हारने के बाद तृणमूल कांग्रेस और बीजद अलग हो गए।

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