सोलह दिनों के महालक्ष्मी व्रत का हो रहा शुभारंभ, जानें इसका महत्व व पूजा विधि

Sixteen days Mahalakshmi fast is about to start its importance puja method - Sakshi Samachar

25 अगस्त, मंगलवार से शुरू हो रहा है 16 दिनों का महालक्ष्मी व्रत 

महालक्ष्मी व्रत का महत्व व पूजा विधि 

भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की अष्टमी को हिंदू पंचांग के अनुसार महालक्ष्मी व्रत होता है। मराठी परिवारों में महालक्ष्मी व्रत उत्सव के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। इस वर्ष महालक्ष्मी व्रत 25 अगस्त मंगलवार से आरंभ हो रहा है।

कई लोग महालक्ष्मी का यह पर्व 3 दिन तक मनाते हैं तो कई लोग यह व्रत 16 दिनों तक करते हैं। मां महालक्ष्मी अपने पूरे परिवार सहित घर आकर सुख-संपन्नता का आशीर्वाद दें, इसी कामना के साथ यह उत्सव मनाया जाता है।

धन-संपदा और समृद्धि की देवी माता महालक्ष्मी की पूजा भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ होकर 16 दिनों तक आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तक चलती है। महालक्ष्मी का व्रत गणेश चतुर्थी के चार दिन बाद से प्रारंभ होता है जो लोग 16 दिनों तक महालक्ष्मी का व्रत नहीं रख पाते हैं, वे पहले और आखिरी दिन महालक्ष्मी व्रत रखते हैं।

ये है 16 दिनों के महालक्ष्मी व्रत का महत्व

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को महालक्ष्मी व्रत होता है, इस दिन राधा अष्टमी यानी राधा जयंती भी मनाई जाती है। अष्टमी के दिन प्रारंभ होने वाला महालक्ष्मी व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस दिन दूर्वा अष्टमी व्रत भी होता है। दूर्वा अष्टमी को दूर्वा घास की पूजा की जाती है। महालक्ष्मी व्रत धन, ऐश्वर्य, समृद्धि और संपदा की प्रात्ति के लिए किया जाता है। इस दिन लोग धन-संपदा की देवी माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

महालक्ष्मी व्रत प्रारंभ: 25 अगस्त 2020, मंगलवार से।

महालक्ष्मी व्रत समापन: 10 सितंबर 2020, गुरुवार तक।

महालक्ष्मी व्रत मुहूर्त 

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी ति​थि का प्रारंभ 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से हो रहा है, जो 26 अगस्त को सुबह 10 बजकर 39 मिनट तक है।

ऐसे किया जाता है महालक्ष्मी व्रत व पूजन-

- सुबह-सवेरे स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें।

* व्रत संकल्प के समय निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
करिष्यsहं महालक्ष्मि व्रतमें त्वत्परायणा।
तदविघ्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत:।।

अर्थात् हे देवी, मैं आपकी सेवा में तत्पर होकर आपके इस महाव्रत का पालन करूंगा/करूंगी। मेरा यह व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो।

मां लक्ष्मीजी से यह कहकर अपने हाथ की कलाई में डोरा बांध लें जिसमें 16 गांठें लगी हों।

- यह व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रतिदिन आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक किया जाता है। 16वें दिन व्रत पूरा हो जाने पर वस्त्र से एक मंडप बनाकर उसमें लक्ष्मीजी की प्रतिमा रखें।

- माता की पूजन सामग्री में चंदन, ताल पत्र (ताड़ के वृक्ष का पत्ता, ताड़ पत्र), पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल तथा नाना प्रकार की सामग्री रखी जाती है।

- पूजन के दौरान नए सूत 16-16 की संख्या में 16 बार रखें। 
इसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्र सहोदरा।
व्रतोनानेत सन्तुष्टा भवताद्विष्णुबल्लभा।।

अर्थात् क्षीरसागर से प्रकट हुईं लक्ष्मी, चन्द्रमा की सहोदर, विष्णुवल्लभा मेरे द्वारा किए गए इस व्रत से संतुष्ट हों।

- श्रीलक्ष्मी को पंचामृत से स्नान कराएं फिर 16 प्रकार से पूजन करके व्रतधारी व्यक्ति 4 ब्राह्मण और 16 ब्राह्मणियों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें। इस प्रकार यह व्रत पूरा होता है।

16वें दिन महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन किया जाता है। अगर कोई व्रतधारी किसी कारणवश इस व्रत को 16 दिनों तक न कर पाए तो केवल 3 दिन तक भी इस व्रत को कर सकता है जिसमें पहले, 8वें और 16वें दिन यह व्रत किया जाता है।

नोट : इस व्रत में अन्न ग्रहण नहीं किया जाता है केवल दूध, फल, मिठाई आदि का सेवन किया जा सकता है।
 

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