देवशयनी एकादशी पर यूं करेंगे पूजा तो प्रसन्न होंगे श्री हरि, जानें महत्व, पूजा विधि व मुहूर्त

significance of devshayani ekadashi puja method muhurat  - Sakshi Samachar

देवशयनी एकादशी का महत्व 

देवशयनी एकादशी की पूजा विधि

चातुर्मास का होता है शुभारंभ

हिंदू धर्म में एकादशी का बड़ा महत्व होता है। कहते हैं कि एकादशी व्रत करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। हर महीने में दो एकादशी होती है। शुक्ल पक्ष की एकादशी और कृष्ण पक्ष की एकादशी।  माना जाता है कि एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है और यह उन्हें बेहद प्रिय भी होती है। आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। देवशयनी एकादशी को हरिशयनी और पद्मा एकादशी भी कहा जाता है।

हर साल अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ी एकादशी जून या जुलाई के महीने में आती है। इस वर्ष यानी साल 2020 में देवशयनी एकादशी 1 जुलाई, बुधवार को है।

आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक एकादशी तक का ये चार माह का समय देवशयन काल माना जाता है। वर्षा के इन चार माह को चातुर्मास कहा जाता है। इस समय व्रत, उपवास, आराधना, जप तप किए जाते हैं। यह भगवान विष्णु का शयनकाल होता है।

देवशयनी एकादशी का मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारंभ: 30 जून, शाम 07:49 बजे से 
एकादशी तिथि समाप्त: 1 जुलाई, शाम 5:30 बजे 

मांगलिक कार्यों पर लगती है रोक 

पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु चार माह के लिए शयन के लिए चले जाते हैं। भगवान विष्णु 4 मास के लिए शयन निद्रा में होते हैं इसलिए इन दिनों विवाह शुभ मुहूर्त वर्जित माने जाते हैं।

ये है देवशयनी एकादशी का महत्व

शास्त्र कहते हैं कि देवशयनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। महाभारत के समय भगवान श्रीकृष्ण ने खुद एकादशी व्रत का महत्व बताया था। एकादशी व्रत करने से जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। धन-धान्य की कोई कमी नहीं रहती है। 
व्रत के दौरान भगवान विष्णु और पीपल के वृक्ष की पूजा करने से विशेष लाभ मिलता है। 

ऐसे करें देवशयनी एकादशी की पूजा 

- देवशयनी एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें प्रातकाल उठकर स्नान करना चाहिए।
- स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें। 

- भगवान विष्णु जी की प्रतिमा को गंगा जल से नहलाएं। 
अब दीपक जलाकर उनका स्मरण करें और भगवान विष्णु की पूजा में उनकी स्तुति करें। 
- भगवान विष्णु को पीले फूल, पीले वस्त्र और चंदन चढ़ाएं। उनके हाथों में पदम, शंख चक्र और गदा सुशोभित करें।

- भगवान विष्णु को पान और सुपारी अर्पित करें।
- पूजा में तुलसी के पत्तों का भी प्रयोग करें तथा पूजा के अंत में विष्णु आरती करें। 

- शाम को भी भगवान विष्णु जी के समक्ष दीपक जलाकर उनकी आराधना करें। 
विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। 
- द्वादशी के समय शुद्ध होकर व्रत पारण मुहूर्त के समय व्रत खोलें। 

-लोगों में प्रसाद बांटें और ब्राह्मणों को भोजन कर कराकर उन्हें दान-दक्षिणा दें।

मंत्र :
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्दे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।

इस प्रकार विष्णु के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भोजन या फलाहार करें। 
- देवशयनी एकादशी पर रात्रि में भगवान विष्णु का भजन स्तुति करना चाहिए। स्वयं के सोने से पहले भगवान को शयन कराना चाहिए।

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