श्रावण 2020 : यहां स्थित है भोलेनाथ का दूसरा ज्योतिर्लिंग, मल्लिकार्जुन के रूप में देते हैं दर्शन

second jyotirlinga of lord shiva is at srisailam  - Sakshi Samachar

भगवान शिव का दूसरा ज्योतिर्लिंग है श्रीशैलम 

यहां भोलेनाथ मल्लिकार्जुन के रूप में देते हैं दर्शन 

भोलेनाथ का प्रिय महीना सावन चल रहा है। सावन में भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है, व्रत किया जाता है और माना जाता है कि ऐसा करने से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। वहीं इस पावन महीने में भक्तजन ज्योतिर्लिंग के दर्शन करके भी स्वयं के जीवन को कृतार्थ करते हैं। देश में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग है जिनके नाम लेना शुभ होता है। 

पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ में तो आइये आज दूसरे ज्योतिर्लिंग के बारे में जानते हैं। यह ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश में स्थित है और चमत्कारी है। यहां महादेव मां पार्वती के साथ विराजते हैं। 
 
आंध्र प्रदेश में स्थित है श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग

आंध्र प्रदेश के पश्चिमी भाग में कर्नूल जिले के नल्ला मल्ला जंगलों के मध्य श्री शैलम पहाडी पर स्थित है। यहाँ शिव की आराधना मल्लिकार्जुन नाम से की जाती है। स्कंदपुराण में श्री शैल काण्ड नाम का अध्याय है। इसमें उपरोक्त मंदिर का वर्णन है। इससे इस मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है।

तमिल संतों ने भी प्राचीन काल से ही इसकी स्तुति गायी है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने जब इस मंदिर की यात्रा की, तब उन्होंने शिवनंद लहरी की रचना की थी। श्री शैलम का सन्दर्भ प्राचीन हिन्दू पुराणों और ग्रंथ महाभारत में भी आता है।

आंध्र प्रदेश के इस ज्योतिर्लिंग को दक्षिण का कैलाश भी कहते हैं और यह भगवान शिव के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यहां भगवान शिव मल्लिकार्जुन के नाम से पूजे जाते हैं और माता पार्वती को भ्रमरांबिका कहा जाता है। यह शक्तिपीठ है जिसका बड़ा महत्व है।

जंगल से होकर गुजरता है मंदिर का रास्ता

श्री शैलम ज्योतिर्लिंग तक पहुंचने के लिए घने जंगलों के बीच से सड़क मार्ग से जाना पड़ता है। घने जंगलों के बीच से रास्ता होने की वजह से शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे तक यह बंद कर दिया जाता है। सुबह गेट खुलने के बाद ही यात्री यहां से गुजरते हैं। इस रास्ते को पार करने के बाद ही श्री शैलम बांध दिखाई देता है जहां 290 मीटर की ऊंचाई से गिरता प्रबल जलावेग देखा जा सकता है। इसे देखने के लिए भी पर्यटकों का तांता लगा रहता है।

कुछ ऐसा है श्रीशैलम के मंदिर का इतिहास

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास शातवाहन राजवंश के शिलालेख बताते हैं। इन शिलालेखों से पता चलता है कि यह मंदिर दूसरी शताब्दी से अस्तित्व में हैं। मंदिर के अधिकांश आधुनिक जोड़ विजयनगर साम्राज्य के राजा हरिहर प्रथम काल से मिलते हैं।

ऐसी है श्री शैलम मंदिर की संरचना

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के अंदर भी कई मंदिर बने हुए हैं जिनमें मल्लिकार्जुन और भ्रमराम्बा सबसे प्रमुख मंदिर हैं। यहां सबसे उल्लेखनीय और देखने लायक विजयनगर काल के दौरान बनाया गया मुख मंडप है। मंदिर के केंद्र में कई मंडपम स्तंभ हैं और जिसमें नादिकेश्वरा की एक विशाल दर्शनीय मूर्ति भी है।

श्री शैलम मंदिर से जुड़ी है ये पौराणिक कथा

शिवपुराण के अनुसार मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कहानी भगवान भोलेनाथ के परिवार से जुडी हुई हैं। माना जाता है कि शंकर भगवान के छोटे पुत्र गणेश जी कार्तिकेय से पहले शादी करना चाहते थे। इसी बात पर भोलेनाथ और माता पार्वती ने इस समस्या को सुलझाने के लिए दोनों के समक्ष यह शर्त रखी कि जो भी पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा उसका विवाह पहले होगा।

यह सुनकर कार्तिकेय ने परिक्रमा शुरू कर दी लेकिन गणेश जी बुद्धि से तेज थे उन्होंने माता पार्वती और भगवान शिव की परिक्रमा करके उन्हें पृथ्वी के समान बताया। जब यह समाचार कार्तिकेय को पता चला तो वह रुष्ट होकर क्रंच पर्वत पर चले गए। उन्हें मनाने के सारे प्रयास जब असफल हुए तो देवी पर्वती उन्हें लेने गई लेकिन वह उन्हें देखकर वहां से पलायन कर गए।

इस बात से हताश होकर पार्वती जी वहीं बैठ गई और भगवान भोलेनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रगट हुए। यही स्थान मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में विख्यात हुआ।

यहां गिरा देवी सती का ऊपरी होंठ

शक्तिपीठ का आशय उन स्थानों से हैं जहां देवी सती के अवशेष गिरे थे। पौराणिक कथाओं से पता चलता हैं कि देवी सती के पिता राजा दक्ष द्वारा भगवान भोलेनाथ का अपमान न सह पाने की वजह से देवी सती ने आत्मदाह कर लिया था।

भगवान शिव ने देवी सती के जलते हुए शरीर को उठा कर तांडव किया और इस दौरान उनके शरीर के अंग जहां-जहां गिरे उस स्थान को शक्ति पीठ के रूप में जाना गया। माना जाता है कि मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग में माता पार्वती का ऊपरी होंठ गिरा और ऐसे ये बन गया शक्तिपीठ। श्रीशैलम श्री मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर 18 महाशक्ति पीठों में से एक है।

मल्लिकार्जुन स्वामी- भ्रमरांबा मंदिर

श्रीशैलम शहर में कृष्णा नदी के तट पर स्थित श्री भ्रमरांबा मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर में यूं तो हमेशा ही भक्तों की भीड़ रहती है पर महाशिवरात्रि पर तो यहां मेला लगता है जिसमें लाखों की संख्या में लोग पूरे देश से आते हैं।

श्री शैलम में पातालगंगा का महत्व

श्रीशैलम के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है पातालगंगा। भक्तजन श्री शैलम पहुंचते हैं तो सबसे पहले इसमें स्नान करते हैं फिर भगवान के दर्शन के लिए जाते हैं।

माना जाता है कि इसके पानी में डुबकी लगाने से त्वचा रोग दूर हो जाते हैं। यहां आने वाले पर्यटक रोपवे की सवारी का लुत्फ भी उठाते हैं। सवारी के दौरान कृष्णा नदी और हरे-भरे घने जंगल का नजारा भी देखा जा सकता है।

अद्भुत है शिखरेश्वर मंदिर

शिखरेश्वर मंदिर श्रीशैलम के सबसे ऊंचे स्थान पर स्थित हैं जो शिखरम के नाम से प्रसिद्ध हैं और शिखरेश्वर स्वामी को समर्पित हैं। मंदिर यहां की प्राचीन नदी कृष्णा के पास ही स्थित हैं। शिखरेश्वर भगवान शिव के एक अन्य रूप में जाने जाते हैं। यहां की ऊंचाइयों पर खड़े होकर भक्त मल्लिकार्जुन स्वामी के मंदिर के दर्शन भी करते हैं।

लिंगाला गट्टू के नाम से जाना जाता है श्रीशैलम का घाट

श्री शैलम कृष्णा नदी के किनारे स्थित है और जो भक्त श्री शैलम आता है वह इस घाट पर जरूर आता है। यहां कृष्णा का सौंदर्य देखते ही बनता है। साथ ही यहां नौका विहार करके भी भक्त स्वयं को धन्य बनाते हैं।

साक्षी गणपति मंदिर

साक्षी गणपति मंदिर खूबसूरत परिवेश के बीच स्थित भगवान गणेश को समर्पित एक दर्शनीय स्थल हैं। कहते हैं कि इस मंदिर में भगवान गणेश के दर्शन किये बगैर श्री शैलम की यात्रा पूरी नहीं होती क्योंकि साक्षी गणपति ही यहां आने वाले भक्तों का पूरा रिकॉर्ड रखते हैं और उसे भगवान शिव तक पहुंचाते हैं।

हाटकेश्वर मंदिर

हाटकेश्वर मंदिर श्रीशैलम के लोकप्रिय मंदिरों में एक हैं और यह भगवान शिव को समर्पित हैं। इस मंदिर के बारे में कहा जाता हैं कि यह वही मंदिर हैं जहां श्री शंकराचार्य ने अपने एक दार्शनिक ग्रंथ की रचना की थी।

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