रक्षाबंधन से जुड़ी Top 5 कहानियां, जो हमें सिखाता है जीने का सलीका 

Raksha Bandhan related top 5 Mythology Stories - Sakshi Samachar

रक्षाबंधन से जुड़ी पांच कहानियां

इन कहानियों से भाई बहन ले सकते हैं प्रेरणा 

नई दिल्ली: इस बार साल 2020 को कोरोना काल में राखी 3 अगस्त को पड़ रहा है। परिवहन की दिक्कतों के चलते कई भाई अपनी बहनों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। राखी का उत्साह तो है लेकिन इसको लेकर बाजारों में गहमागहमी कम ही देखने को मिल रही है। बंदी के दौर में डाक व्यवस्था की लेटलतीफी के चलते भाइयों को राखियां नहीं मिली है। बावजूद इसके सभी राखी के इस पावन त्यौहार को दिल से सेलेब्रेट कर रहे हैं।

राखी और रक्षाबंधन से जुड़ी हम पांच प्रसिद्ध कहानियां यहां बता रहे हैं। जिसका मर्म आप समझ लें तो जीवन की दिशा ही बदल जाएगी। आप राखी पर भाइयों के बीच स्टोरी सेशन के दौरान ये कहानियां भी सुना सकती हैं। ये कहानियां भारत के गौरवशाली इतिहास और धर्म से जुड़ी है। जिससे हमें नैतिक बल भी मिलता है।

1. राजा बलि को मात लक्ष्मी ने बांधी थी राखी

पौराणिक कहानी है, एक बार भगवान विष्णु मुश्किल में फंस गए। हालत ये हो गई कि भगवान विष्णु को द्वारपाल बनना पड़ा। दरअसल एक बार भगवान विष्णु लंबे समय तक पृथ्वी पर ही टिके रहे और राजा बलि के दरबार में उन्हें द्वारपाल बनना पड़ा। माता लक्ष्मी को इस बारे में चिंता हुई। उन्होंने भी धरती पर आने का फैसला किया और पहुंच गईं राजा बलि के दरबार में। माता लक्ष्मी ने बलि से कहा कि उनके पति काम के सिलसिले में कहीं बाहर गए हुए हैं लिहाजा वो शरण लेना चाहती हैं। राजा बलि ने देवी लक्ष्मी को आदर के साथ शरण दी। पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी ने बलि की कलाई पर राखी बांधी साथ ही उन्हें अपना भाई बना लिया। बलि खुश होकर माता लक्ष्मी से वरदान मांगने को कहा। तो माता ने झट से द्वारपाल के रूप में पति विष्णु को मुक्त करने का आग्रह किया। राजा बलि ने भी वादा निभाया और विष्णु भगवान को मुक्त कर दिया। 

2. भाई बहन थे कृष्ण और द्रौपदी

युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के बाद बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं से भरे दरबार में श्रीकृष्ण की बुआ के बेटे शिशुपाल ने भगवान का अपमान किया। श्रीकृष्ण के अलावा वहां बैठे भीष्ण को भी शिशुपाल ने गालियां दी। शिशुपाल के लाख मना करने पर भी वो नहीं माना। आखिरकार भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल की हत्या कर दी। ऐसा करते हुए श्रीकृष्ण की उंगली जख्मी हो गई थी। जिसे देखने के बाद द्रौपदी ने अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण की पट्टी बांधी थी। इसे ही भाई बहन का रक्षा सूत्र माना गया और भगवान ने वचन दिया कि वो जरूरत पड़ने पर बहन द्रौपदी की रक्षा करेंगे। भरे दरबार में जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तब कृष्ण ने उनकी लाज बचाई थी। अपमान और लज्जा से भरी द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को याद किया और फिर चमत्कार के बारे में हर कोई जानता है। दुःशासन साड़ी खींचता रहा और श्रीकृष्ण के प्रभाव के कारण द्रौपदी की सा़ड़ी लंबी होती चली गई। 

3. राजा पुरु और सिकंदर की पत्नी 

भारतीय इतिहास की बेहद प्रभावशाली कहानी है ये। सिकंदर दुनिया को फतह करते हुए भारत की धरती पर आ पहुंचा था। उत्तर-पश्चिम भारतीय राज्य आम्बी के शासक राजा पुरु जिन्हें पोरस के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने सिकंदर महान को चुनौती दी थी। पुरु की बहादुरी से सिकंदर की पत्नी चिंतित थीं। सिकंदर की पत्नी रोक्साना अपने पति की रक्षा के लिए पुरु को राखी भेजी। साथ ही पति की रक्षा का वचन मांगा। माना जाता है कि युद्ध में एक वक्त ऐसा भी आया जब पुरु सिकंदर को एक ही वार में खत्म कर सकते थे। उस वक्त उन्होंने बहन को दिये वचन की लाज रखी और सिकंदर की जान बख्श दी। ये कहानी भारत की वीरता की महान विरासत को दरशाती है। 

4. हुमांयू और रानी कर्णावती की कहानी

रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कहानी है ये। जब दिल्ली पर मुगलों का राज था। उस वक्त राजस्थान के चित्तौड़ में राणा सांगा की विधवा रानी कर्णावती शासन कर रही थीं। कर्णावती के बेटे राणा विक्रमादित्य की उम्र उस वक्त कम थी। ऐसे में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। रानी कर्णावती को मुगलों की ताकत का अंदाजा था। कर्णावती ने आखिरी उम्मीद के तहत मुगल बादशाह हुमायूँ को एक राखी के साथ संदेशा भिजवाया। हुमायूँ उस समय किसी दूसरी लड़ाई में व्यस्त था। उसने कर्णावती की राखी की लाज रखी और कर्णावती को बचाने के लिए निकल पड़ा। अफसोस ये कि हुमायूं के पहुंचने से पहले ही रानी कर्णावती ने जौहर कर लिया। हुमायूं ने बाद में बहादुर शाह को हराकर चित्तौड़ का शासन फिर से कर्णावती के बेटे को सौंद दिया। 

5. संतोषी माँ का जन्म

धार्मिक कहानी है। माना जाता है कि भगवान गणेश के दो बेटे थे, शुभ और लाभ था। रक्षाबंधन पर हर साल वे बहुत निराश हो जाते क्योंकि इनकी कोई बहन नहीं थी। एक दिन दोनों पुत्र पिता गणेश के पास बहन की चाहत के साथ पहुंचे। उसी समय नारद मुनि भी प्रकट हुए। उन्होंने भगवान गणेश को पुत्री को जन्म देने के लिए राजी कर लिया। गणेश जी की पत्नियों रिद्धि और सिद्धि में से दिव्य ज्वालाएँ निकलने लगीं और एक बेटी का जन्म हुआ, जिसे हम संतोषी माँ के तौर पर पूजते हैं। इसी कारण से संतोषी माता की पूजा रक्षा बंधन के दिन होती है। 
 

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