जोहरा सहगल की ये बातें, जिसे सुनकर हर कोई जिंदगी नए सिरे से शुरू कर देगा जीना

 Zohra Sehgal Google Doodle - Sakshi Samachar

मुंबई : जिंदगी जीने का असली नाम जिंदादिली है, जिसे जोहरा सहगल ने सही साबित किया। अपनी अदायगी से फिल्मी पर्दे पर खास मुकाम बनाने वालीं जोहरा सहगल 100 साल की उम्र में भी एक छोटी बच्ची जैसे हरफनमौला रहती थीं। अभिनेत्री जोहरा सहगल के सम्मान में उन्हें याद करते हुए मंगलवार को गूगल ने डूडल बनाया है। 

जोहरा सहगल का जन्म 27 अप्रैल, 1912 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुआ था। उनका असली नाम साहिबजादी जोहरा बेगम मुमताज उल्लाह खान था। उनका जन्म एक सुन्नी मुस्लिम परिवार में हुआ था। महज सात वर्ष की आयु में मोतियाबिंद ने उनकी बायीं आंख की रौशनी छीन ली।

जोहरा सहगल देश की पहली कलाकारों में से थीं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त थी। उन्हें 1998 में पद्म श्री, 2001 में कालिदास सम्मान और 2010 में पद्म विभूषण सहित देश के सर्वोच्च पुरस्कार से नवाजा गया। 

जोहरा सहगल की ऐसी बातें जो हमेशा रहेगी याद

ज़िंदगी मुश्किल रही, लेकिन मैं उससे ज़्यादा मज़बूत रही. मैंने ज़िंदगी को उसी के खेल में हरा दिया।

आप मुझे अब देख रहे हैं, जब मैं बूढ़ी और बदसूरत हूं. आपको मुझे तब देखना चाहिए था, जब मैं जवान और बदसूरत थी।

काम के प्रति लगाव आपको ख़ूबसूरत बनाता है, और ये तभी हो सकता है जब आपको अपने काम से प्यार हो।

अगर आपके जीवन में हंसी ना हो तो जीवन बोझ बन जाएगा।

हंसने-हंसाने की आदत हो तो आप दुख का मज़ाकिया चेहरा भी देख सकते हैं।

कौन कहता है बुढ़ापे में ज़िंदगी बोर करती है? अगर आपमें वो बात नहीं, तो इसके लिए जवानी काफ़ी है।

जोहरा सहगल का निधन

9 जुलाई 2014 को उन्हें निमोनिया से पीड़ित होने के बाद दक्षिणी दिल्ली के मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 10 जुलाई 2014 को उनकी मृत्यु हो गई। 102 वर्ष की आयु में, कार्डियक अरेस्ट से पीड़ित होने के बाद और 11 जुलाई को दिल्ली के लोधी रोड श्मशान में उनका अंतिम संस्कार किया गया।

जोहरा सहगल का पारिवारिक जीवन

जोहरा सहगल ने कामेश्वर सहगल से शादी की। उनके माता-पिता का प्रारंभिक विरोध था लेकिन उन्होंने अंतत अपनी स्वीकृति दे दी। उन्होंने 14 अगस्त 1942 को शादी की। ज़ोहरा और कामेश्वर के दो बच्चे थे; किरण सहगल और पवन सहगल। पवन सहगल WHO के लिए काम करते हैं। किरण एक बेहद प्रतिष्ठित ओडिसी नर्तकी हैं। 2012 में, उनकी बेटी किरण सहगल ने ज़ोहरा की जीवनी "ज़ोहरा सहगल: फैटी" शीर्षक से लिखी लिखी थी।

ज़ोहरा सहगल का करियर

सहगल ने अपने करियर की शुरुआत उदय शंकर की मंडली में एक नर्तकी के रूप में की थी, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान जैसे देशों में प्रदर्शन किया।

देहरादून में आयोजित मशहूर नृत्यांगना उदय शंकर के नृत्य ने उन्हें प्रेरणा दी। अलग-अलग संस्कृतियों और रीति-रिवाज़ों में उनकी बहुत रुचि थी। अपनी डिग्री पूरी करने के बाद उदय शंकर की नृत्य-मंडली में शामिल हो गईं और जगह-जगह यात्रा की। अपनी इसी सफर के दौरान उन्होंने अपने से आठ वर्ष छोटे कामेश्वर सहगल से प्रेम-विवाह किया।

1959 में पति कामेश्वर के असमय निधन के बाद ज़ोहरा दिल्ली आ गई और नवस्थापित नाट्य अकादमी की निदेशक बन गई। 1962 में वे एक ड्रामा स्कॉलरशिप पर लंदन गई, जहां उनकी मुलाकात भारतीय मूल के भरतनाट्यम नर्तक रामगोपाल से हुई और उन्होंने चेलेसी स्थित उनके स्कूल में 1963 में उदयशंकर शैली के नृत्य सिखाना शुरू कर दिया। यहीं उन्हें 1964 में बीबीसी पर रूडयार्ड किपलिंग की कहानी में काम करने का मौका मिला।

ब्रिटिश टेलीविजन पर यह उनकी पहली भूमिका थी। आगे चलकर पृथ्वी थिएटर से जुड़ीं, वहां 400 रुपए वेतन पर काम किया। रंगमंच से उनका जुड़ाव बना रहा और वह वामपंथी विचारधारा से प्रेरित रंगमंच ग्रुप इप्टा में शामिल हुईं। 1945 में ज़ोहरा सहगल पृथ्वी थिएटर से जुड़ीं और क़रीबन 15 साल तक जुड़ी रहीं। पृथ्वीराज कपूर का वो बहुत आदर किया करती थीं और थिएटर में उन्हें अपना गुरु मानती थीं।

1946 में ख़्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में इप्टा के पहले फ़िल्म प्रोडक्शन धरती के लाल और फिर इप्टा के सहयोग से बनी चेतन आनंद की फ़िल्म 'नीचा नगर' में उन्होंने काम किया।

नीचा नगर पहली ऐसी फ़िल्म थी जिसे अंतरराष्ट्रीय कांस फ़िल्म समारोह में गोल्डन पाम पुरस्कार मिला। फ़िल्मों में काम करने के साथ उन्होंने गुरु दत्त की 'बाज़ी' (1951) राज कपूर की आवारा समेत कुछ हिन्दी फ़िल्मों के लिए नृत्य संयोजन भी किया। कुछ फ़िल्मों का कला निर्देशन और फिर निर्देशक की भूमिका भी निभाई।

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