पुण्यतिथि विशेष : जब तबला बजाते आरडी बर्मन के हुनर को महमूद ने पहचाना

Special Story On rd burman death anniversary  - Sakshi Samachar

महमूद के साथ की पहली फिल्म

निजी जिंदगी में नाकामी, संगीत हिट

जब पंचम की फिल्में फ्लॉप हो रही थीं

हैदराबाद : बॉलीवुड जगत में 'पंचम दा' के नाम से मशहूर राहुल देव बर्मन यानी आरडी बर्मन की आज पुण्यतिथि है। 04 जनवरी 1994 को आरडी बर्मन ने दुनिया को अलविदा कहा था। उनके गीत आज भी लोगों के होठों पर तैरते हैं। पंचम दा की कहानी को किसी एक खांचे में नहीं बांध सकते. कामयाबी, नाकामयाबी, शोहरत, एकाकीपन... सब कुछ इसमें मिलेगा।

कलकत्ता में उनका जन्म हुआ था। जीनियस पिता के जीनियस पुत्र होने के लक्षण बचपन में ही दिखने लगे थे। पिता ने नाम रखा था टबलू। लेकिन एक दिन उन्हें रोते देखा तो अशोक कुमार ने कहा कि ये तो पंचम में रोता है। नाम पड़ गया पंचम। घर में हमेशा संगीत का माहौल होने के कारण उनकी रुचि भी इस क्षेत्र में हो गई।

परिवार कलकत्ता से बंबई (अब मुंबई) आया, तो उन्होंने अली अकबर खां साहब से सरोद सीखा। हार्मोनिका भी सीख लिया। समता प्रसाद से तबला सीखा। संगीतकार सलिल चौधरी को उन्होंने हमेशा अपना गुरु माना। नौ साल के थे, जब पहला गाना कंपोज किया। यह गाना सचिन देव बर्मन ने फिल्म फंटूश में इस्तेमाल किया, जो 1956 में रिलीज हुई थी। 

महमूद के साथ की पहली फिल्म

कहा जाता है कि उसी दौरान महमूद एक फिल्म के लिए सचिन देव बर्मन से मिलने आए। बर्मन दा व्यस्त थे। उन्होंने मना कर दिया। महमूद ने देखा कि बड़ा चश्मा लगाए एक छोटा बच्चा कोने में तबला बजा रहा है। वो पंचम दा थे। महमूद ने सचिन देव बर्मन से इजाजत ली कि पंचम को उनके लिए काम करने दें और इस तरह पंचम को वो फिल्म मिली। फिल्म थी छोटे नवाब, जिसका गाना घर आजा घिर आए बेहद मकबूल हुआ। 

निजी जिंदगी में नाकामी, संगीत हिट

60 का दशक पंचम दा के लिए कामयाबी और कड़वाहट दोनों लेकर आया। उनका विवाह 1966 में रीता पटेल से हुआ। लेकिन वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा। 1971 में उनका तलाक हो गया। 1975 में पिता सचिन देव बर्मन नहीं रहे। इन सारी बातों के बीच उनका संगीत फलता-फूलता रहा। एक के बाद एक ऐसी फिल्में आईं, जिनका संगीत बेमिसाल था। उसी दौरान आशा भोसले का साथ भी उन्हें मिला। 80 के दशक में दोनों ने साथ जीवन बिताने का फैसला किया।

जब पंचम की फिल्में फ्लॉप हो रही थीं

पंचम दा की पहली सुपरहिट फिल्म थी तीसरी मंजिल। इसके बाद वो लगातार नासिर हुसैन की फिल्में करते रहे। उन्हें तब झटका लगा था, जब कयामत से कयामत के लिए उन्हें नहीं लिया गया। नासिर हुसैन के बेटे मंसूर खां ने उन्हें न लेने का फैसला किया। ये वो दौर था, जब पंचम की फिल्में फ्लॉप हो रही थीं। कहा जाता है कि सुभाष घई ने राम लखन के लिए पहले आरडी बर्मन से बात की थी। लेकिन फिर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को साइन किया। कहा जाता है कि पंचम इससे बहुत दुखी थे कि उन्हें बताने की भी जरूरत नहीं समझी गई।

जब आरडी बर्मन के पास भी नहीं था काम

80 के दशक में फिल्म इंडस्ट्री बड़े बदलाव से गुजर रही थी। उस वक्त दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी रीमेक आने लगे और हीरो हिरोइन के भड़कीले डांस को ज्यादा जगह मिलने लगी। संगीत पर हीरो का एक्शन भारी पड़ने लगा था। नए-नए संगीतकार दोयम दर्जे के गाने लिखने लगे थे। इस बात से आरडी बर्मन बेहद दुखी हुए थे। उन्होंने कुछ दिनों तक काम करना ही छोड़ दिया था। आर डी बर्मन की आखिरी फिल्म '1942 एक लव स्टोरी' थी। 

गुलजार के साथ यादगार गाने

हां, गुलजार के साथ जरूर उनके यादगार गाने आते रहे। चाहे फिल्म किनारा हो या इजाजत या मासूम। गुलजार हमेशा ही उनके सबसे अच्छे दोस्तों में थे। गुलजार का ही एक गीत है, जो हमेशा पंचम दा की याद दिलाएगा – तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं... तेरे बिना जिंदगी भी लेकिन जिंदगी तो नहीं। संगीत हमेशा रहा है और रहेगा। लेकिन पंचम सुर की कमी संगीत में हमेशा महसूस की जाती रहेगी। 

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