बड़े गुलाम अली खान ने इस फिल्म के एक गाने के लिए रफी और लता से 50 गुना फीस ली

Special Story On Bade Ghulam Ali Khan Birth Anniversary  - Sakshi Samachar

मुगल-ए-आज़म के गाने के लिए बड़े गुलाम अली खान ने रिकॉर्ड फीस ली

 मोरारजी देसाई की मदद से उन्हें हिंदुस्तान की नागरिकता मिली

यूं तो भारत में संगीत और संगीतज्ञ बहुत हैं, जिनके नाम आदर से लिए जाते हैं। इनमें गुलाम अली खां ऐसे हैं, जिनकी शख्सियत कुछ अलग थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की की गायकी और उनकी शख्सियत को शब्दों में समेटना बेहद मुश्किल काम है। वे संगीत के एक ऐसे विद्वान और दिग्गज गायक थे, जिनका लोहा आने वाली पीढ़ियां भी मानती रहेंगी। गुलाम अली खान ध्रुपद, ठुमरी सब कुछ गाते थे लेकिन वो सबसे ज्यादा मशहूर ठुमरी के लिए हुए। आजा उसी दिग्गज गायक गुलाम अली खान की जयंती है। उनका जन्म 2 अप्रैल 1902 को लाहौर के निकट कसूर नामक गांव में हुआ था। 

पटियाला घराने की विरासत

बड़े गुलाम अली खान को संगीत विरासत में मिला था। उनके पिता अली बक्श खान भी उस दौर के जाने-माने गायक थे। उनकी तालीम 5 साल की उम्र से शुरू हो गई थी । 7 साल की उम्र में उन्होंने अपने चाचा काले खान से सारंगी और गाना दोनों सीखना शुरू कर दिया था, और  21 साल की उम्र में बड़े गुलाम अली खान बनारस आ गए, सारंगी पर संगत करने के साथ उन्होंने छोटे मोटे समारोहों में गाना शुरू कर दिया था। बताया जाता है कि कोलकाता में उनका एक बड़ा कॉन्सर्ट हुआ जिसके बाद उन्हें बड़ी पहचान मिल गई थी। 

भारत का विभाजन और खान साहब 

1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तब कसूर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया और खान साहब पाकिस्तान चले गए, लेकिन कुछ सालों के बाद वो हिंदुस्तान लौटे और फिर यहीं के होकर रह गए। बड़े गुलाम अली खान कहा करते थे- अगर हर घर में एक बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सिखाया गया होता तो देश का कभी बंटवारा नहीं होता। 1957 में मोरारजी देसाई की मदद से उन्हें हिंदुस्तान की नागरिकता मिल गई।

मुगल-ए-आज़म के गाने के लिए बड़े गुलाम अली खान ने रिकॉर्ड फीस ली

बड़े गुलाम अली की आवाज और उनकी लोकप्रियता देखकर कई फिल्म निर्माताओं ने उन्हें अपनी फिल्म में गवाना चाहा लेकिन खान साहब इनकार करते रहे। बताया जाता है कि निर्माता के. आसिफ ने उन्हें किसी तरह अपनी फिल्म मुगल-ए-आज़म में दो राग गाने गाने के लिए राजी कर लिए।  कहते हैं कि बड़े गुलाम अली खान ने के. आसिफ से एक गाने के लिए 25,000 रुपए मांगे थे।  के. आसिफ ने भी उन्होंने खान साहब की मांग के मुताबिक पैसे दिए। नौशाद के संगीत से रचे राग सोहनी और रागेश्वरी के उन दो गीतों ने बड़े गुलाम अली खान को और मशहूर बना दिया। ये वो दौर था जब लता और रफी जैसे गायकों को एक गाने का 500 रुपया से भी कम मिलता था। 

खान साहब को पद्मभूषण सम्माण

बड़े गुलाम अली खान आज भी गायकी का वह नाम हैं, जिसे किसी और पहचान की जरूरत नहीं। इस महान गायक को 1962 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। उन्होंने पुरस्कार और पदवियों से ज्यादा तवज्जों हमेशा अपने चाहने वालों के प्यार को दिया। अपने आखिरी दिनों में खान साहब लंबी बीमारी के बाद पैरालिसिस के शिकार हो गए थे। हैदराबाद के बशीरगढ़ पैलेस में 1968 को हिंदुस्तानी संगीत की यह बुलंद आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। उनके सम्मान में बशीरगढ़ की मुख्य गली का नाम उस्ताद बड़े गुलाम अली खान मार्ग कर दिया गया है।

बड़े गुलाम अली खान की आवाज़ में ‘का करूं सजनी आए न बालम’, ‘याद पिया की आए’, ‘प्रेम जोगन बन के’, ‘नैना मोरे तरस रहे’, ‘कंकर मार जगाए’ ये ठुमरियां अमर हो चुकी हैं।

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