...जब PM नेहरू के खिलाफ शेर लिखने पर इस शायर को जाना पड़ा था जेल, ये है उनकी फेमस गजल

Majrooh Sultanpuri Death Anniversary - Sakshi Samachar

नई दिल्ली :  बॉलीवुड में लगभग तीन सौ फिल्मों के लिए गाना लिखने वाले मजरूह सुल्तानपुरी की रविवार को 20वीं पुण्यतिथि है। मजरूह सुल्तानपुरी का नाम असरार-उल हसन ख़ान था। मजरूह का जन्म एक राजपूत परिवार में हुआ था, लिहाजा खानदानी परंपरा के तहत उन्हें भी स्कूली शिक्षा से दूर रखा गया और दीनी तालीम के लिए मदरसे भेजा गया। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि राजपूत पढ़ने के लिए नहीं, लड़ने के लिए पैदा होते थे उन्होंने अपने लगभग 4000 गीत लिखे हैं। उनकी पंक्ति  मै अकेला ही चला था, जानिबे मंजिल मगर लोग पास आते गये कारवां बनता गया।  उनके सफर पर सटीक बैठती है।

मजरूह सुल्तानपुरी को जाना पड़ा था जेल 
सन 1947 में जब देश के हर शहर, गांव में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था। उस वक्त मजरूह सुल्तानपुरी अपने प्रगतिशील लेखक दोस्तों के साथ मिलकर उंचे बांस का कलम बनाकर सड़कों पर डांस कर रहे थे। लेखकों के मुताबिक आजाद देश में कलम की आजादी जरूरी थी।एक शाम जब मजदूरों की एक सभा के दौरान मजरूह सुल्तानपुरी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू पर एक शेर सुनाया था। उन्होंने यह शेर नेहरू और खादी के खिलाफ लिखा था। जिसके बाद सियासी गलियारे में काफी गर्मागर्मी हुई और उनके समर्थकों को आगबबूला कर दिया।तब मुंबई के तत्कालीन गर्वनर मोरारजी देसाई ने मजरूह की गिरफ्तारी का आदेश दिया था। इसके बाद उन्हें मुंबई के ऑर्थर रोड जेल में डाल दिया। 

इसके बाद उन्हें अपने लिखे गाने के लिए माफी मांगने को कहा,  लेकिन मजरूह ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया। जिसके बाद उन्हें 2 साल तक जेल में रहना पड़ा था।  हालांकि जेल में भी अपनी कविताएं लिखनी नहीं छोड़ी। नतीजा ये कि अंत में थक हारकर मजरूह को जेल से रिहा करना पड़ा।ऐसे मिली थी बॉलीवुड में एंट्री आजादी के दो साल बाद ही मजरूह मुंबई में एक मुशायरे में हिस्सा लेने गए थे। उस समय मशहूर फिल्म-निर्माता अब्दुल हफीज कारदार ने उन्हें अपनी फिल्म शाहजहां के लिए गाना लिखने को कहा था। इस गाने के लिए कॉम्पटीशन के जरिए हुआ था।

उनका चुनाव इन गानों के लिए हुआ था- ग़म दिए मुस्तकिल और जब दिल ही टूट गया। ये गाने आज भी युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। इस फिल्म के गीत प्रसिद्ध गायक कुंदन लाल सहगल ने गाए थे।

देश के पहले ऐसे गायक जिन्हे मिला दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड

 मजरूह देश के ऐसे पहले गीतकार थे जिन्हें दादासाहब फाल्के अवार्ड से नवाजा गया था। इसके अलावा इन्हें चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, फिर भी कभी अब नाम को तेरे, दोस्ती फिल्म का ये गीत, जैसे गानों के लिए पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था। 24 मई 2000 को मुंबई में मजरूह सुल्तानपुरी का निधन हुआ।"

मजरूह सुल्तानपुरी की गजल

रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह
बैठे हैं उन्हीं के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह

रोक सकता हमें ज़िंदान-ए-बला क्या ‘मजरूह’
हम तो आवाज़ हैं दीवार से छन जाते हैं

तिश्नगी ही तिश्नगी है किस को कहिए मय-कदा
लब ही लब हम ने तो देखे किस को पैमाना कहें

बे-तेशा-ए-नज़र न चलो राह-ए-रफ़्तगाँ
हर नक़्श-ए-पा बुलंद है दीवार की तरह

अलग बैठे थे फिर भी आँख साक़ी की पड़ी हम पर
अगर है तिश्नगी कामिल तो पैमाने भी आएँगे

बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते

तमन्नाओं से बदली है न बदलेगी कभी किस्मत
लिखा है जो मुकद्दर में वही तेरा करम होगा

अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम
उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम

बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने
ये काँपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके

बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना
किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते

तुझे न माने कोई तुझ को इस से क्या मजरूह
चल अपनी राह भटकने दे नुक्ता-चीनों को

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