अपराध और भड़काऊ कंटेंट का बड़ा अड्डा बन रहा OTT, बच्चों को जरूर बतायें ये बातें

Mafia On ZEE5 violence objectionable content on OTT Platform India - Sakshi Samachar

भारत में OTT प्लेटफॉर्म की समीक्षा

हिंसा और नंगापन परोसने में जुटे निर्माता

किशोरों को कंटेंट को लेकर कैसे बतायें? 

मुंबई: ओटीटी प्लेटफॉर्म पर 'माफिया' वेब सीरीज लोगों को पसंद आ रही है। जी5 पर दिखाई जाने वाली इस थ्रिलर सीरीज को वास्तविक घटनाओं के करीब माना जा रहा है। लोगों को अपराधियों की साजिश और गैंगवार सीक्वेंस में मजा आने लगा है। इससे पहले 'रसभरी' वेब सीरीज को लेकर भी कुछ हद तक आलोचनाएं देखने को मिली। बाद में इसे भी दर्शकों का प्यार मिला। रसभरी की हिरोइन स्वरा भास्कर मानती है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सेंसरशिप की आजादी रचनात्मकता को बढ़ावा दे रही है। अब निर्माता खुलकर ऐसे विषयों का चुनाव कर रहे हैं जिसे परोसने से पहले सेंसर बोर्ड का डर सताता था। सस्ते डाटा के साथ लोग तेजी से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर पहुंच बना रहे हैं। ग्रामीण हलकों में लोगों को कुछ वेब सीरीज परिवार के साथ देखने में असहज महसूस जरूर होती है। जबकि शहरी पृष्ठभूमिक के ज्यादातर लोगों को अधिक एतराज नहीं है। 

ऐसे में जरूरी है कि आप अपने बच्चों को कंटेंट के बारे में जानकारी देते हुए उससे परहेज करने की नसीहत दें। खासकर बच्चे अगर किसी वेबसीरीज या कंटेंट पर क्लिक करें तो सबसे पहले उन्हें उम्र संबंधी सूचनाओं को देखने की हिदायत दें। पैरेंटल कंट्रोल का उपयोग करते हुए बच्चों को सख्ती से कुछ खास कंटेंट से दूर रखें। 

ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए सेंसरशिप जरूरी 

फिल्मी दुनिया से जुड़े लोग भी मानते हैं कि अश्लीलता और हिंसा पर आधारित कहानियों का बड़ा दर्शक वर्ग है। राजकपूर सरीखे शो मैन ने भी अश्लीलता को अपने हिसाब से परिभाषित किया और परोसा भी। उन्हीं की तर्ज पर युवा निर्माता अब ओटीटी प्लेटफॉर्म पर तेजी से अश्लीलता औऱ हिंसा पर आधारित शोज के जरिए प्रयोग करने में जुटे हुए हैं। 
जबकि एक तबका ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सख्स सेंसरशिप की वकालत कर रहा है। हालांकि आम लोगों की जनभावना सेंसरशिप के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि उन्हें वर्जित विषयों पर कथानक में रस आने लगा है। 

ओटीटी प्लेटफॉर्म का तेजी से विस्तार 
सस्ते इंटरनेट और हर हाथ में स्मार्ट फोन ने ओटीटी प्लेटफॉर्म को व्यापक विस्तार दिया है। ऑनलाइन मनोरंजन की सुविधा बड़ी आबादी तक पहुंच बनाने लगी है। साथ ही इससे निर्माताओं की कमाई में भी इजाफा होने लगा है। कई बड़े बैनर की फिल्में भी सिनेमाघरों की बजाय ओटीटी प्लेफॉर्म पर रिलीज हुई। इसमें अमिताभ बच्चन की हालिया फिल्म भी शामिल है। 

क्या है ओटीटी प्लेटफॉर्म?

ओटीटी वास्तव में ओवर दि टॉप का शॉर्ट फॉर्म है। माना जा रहा है कि ओटीटी पर मनोरंजन जगत का चालीस अरब रुपए का कारोबार होता है। जिसके लिए देश में लगभग 50 के करीब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के आकलन पर गौर करें तो ओटीटी का बाजार 2023 तक पांच अरब डॉलर यानी 400 अरब रुपये का हो सकता है। आंकड़ों से आप समझ सकते हैं कि तीन साल के भीतर ही ओटीटी बाजार का विस्तार 10 गुना होने वाला है। लॉकडाउन के कारण सिनेमाघरों और थियेटरों के बंद होने के चलते ओटीटी पर लोगों का झुकाव बढ़ने लगा है। अगर सिनेमाघर शुरू भी होते हैं तो बैठने के लिए कम जगह होगी और दर्शकों को टिकट के दाम अधिक चुकाने होंगे। ऐसे में लोग आने वाली फिल्में ऑनलाइन जरिये से देखना अधिक पसंद करेंगे। 

वीडियो गेम बाजार को भी ओटीटी पहुंचा रहा है चोट

यहां दिये गए डाटा पर गौर करें तो बच्चों में वीडियो गेम्स को लेकर झुकाव कम हुआ है। इसकी बनिस्पत वे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर वक्त बिताना अधिक पसंद करते हैं। बता दें कि वीडियो गेम्स बाजार भी 10 करोड़ से अधिक का है। वीडियो गेम्स बनाने वाली कई कंपनियां अब ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जगह बनाने की जुगत में हैं। जो इससे बाहर हैं उनकी कमाई को चोट पहुंच रही है। 

अपराध और अश्लीलता परोसने को लेकर बहस

अपराध और अश्लीलता को लेकर बहस नई नहीं है। सिनेमा के आगमन के साथ ही इस पर तीखी बहस होती रही है। वहीं समाज में व्यापक बदलाव के साथ सिनेमा की रूपरेखा में जबरदस्त बदलाव भी देखने को मिला है। कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर राजकपूर ने राम तेरी गंगा मैली फिल्म में सारी हदें पार कर दी थी। सेंसर बोर्ड पर फेवरिटिज्म के आरोप भी लगते रहे हैं। फिल्म निर्माता किसी भी सूरत में खुद को बांधना नहीं चाहते। कथानक की मांग के अनुसार वो सब कुछ दर्शकों के सामने रखने के हिमायती हैं। अब तो ओटीटी का अड्डा उन्हें मिल गया है, जहां कोई पूछने वाला नहीं। दर्शकों को वो सबकुछ दिखाने के लिए वे आजाद हैं जिसकी सामाजिक वर्जनाएं लंबे समय से रही है। 

ओटीटी प्लेटफॉर्म से नुकसान

ओटीटी प्लेटफॉर्म का बड़ा नुकसान सामाजिक स्तर पर देखा जा सकता है। खासकर भड़काऊ विषयों पर वेब सीरीज किशोरों के मन को गहरा प्रभावित करते हैं। विकास दुबे सरीखे अपराधी भी फिल्मों से गहरे प्रभावित हुए थे और उन्होंने इससे हिंसा का तरीका भी सीखा था। कंप्यूटर ने आपत्तिजनक सामग्री बच्चों और किशोरों तक आसानी से पहुंचाई है। पैरेंटल लॉक की सुविधा तो है लेकिन बच्चे कुछ नया देखने के चक्कर में और जिज्ञासा के चलते मोबाइल फोन पर ही वर्जित कंटेंट देखने से परहेज नहीं करते हैं। 

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अपराध और यौन से जुड़ी कहानियों के लिए आकर्षण स्वाभाविक है। खासकर किशोरावस्था में इंसान समाज के उन अंधेरे कोनों में स्क्रीन या खबरों के जरिए झांकने की कोशिश करता है, जिसे आम तौर पर वर्जित माना जाता है। यौन सामग्री भी इसी तरह का आकर्षण है। कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर अच्छे-बुरे सीरिज बनते रहेंगे। ये हम सब और समाज का दायित्व है कि हम अच्छे कंटेंट को सराहें और गलत सामग्री का विरोध करें। युवाओं की कुंठा और ललक का फायदा उठाने की फिल्म निर्माताओं को कतई इजाजत नहीं होनी चाहिए। फिल्मों में क्रूरता और गाली गलौज को अब मान्यता दिलाने की कोशिश की जा रही है। मीडिया और सोशल मीडिया इसको खूब हवा देने में लगा है। अवांछित, अपमानजनक और अश्लील सामग्री के लिए सीधे तौर पर सीरिज निर्माता ही दोषी नहीं, बल्कि हमें भी अपने और अपने बच्चों की जिम्मेदारी उठानी होगी। सभ्य नागरिक के तौर पर हमें ऐसे वर्जित विषयों पर बने सीरीज से परहेज करना जरूरी है। 

ओटीटी को लेकर सरकार की भूमिका 

फिलहाल इंटरनेट पर सरकार या उसके सेंसर बोर्ड का बहुत अख्तियार नहीं है। कुछेक खास कंटेंट पर खूब बवाल होता है तो सरकार कार्रवाई करती है। जबकि इसके लिए रुटीन प्रक्रिया नहीं है। ओटीटी प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग तो देखते हुए अब सेंसरशिप कानूनों में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। ताकि हमारा समाज सब कुछ देखने के चक्कर में बर्बाद न हो। 

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