इस फिल्म को बनाने के चक्कर में सुनील दत्त हो गए थे कंगाल, ताने मारते थे लोग

Bollywood actor sunil dutt death anniversary  - Sakshi Samachar

सुनील दत्त ने 25 मई, 2005 को इस दुनिया को अलविदा कहा 

हर कोई उन्हें दत्त साहब के नाम से जानता था 

वे ऐसे राजनेता थे जिनका विपक्ष भी सम्मान करता था 

बॉलीवुड में एक ऐसे एक्टर भी हुआ करते थे जो न सिर्फ अच्छी एक्टिंग करते थे बल्कि वे निर्माता-निर्देशक भी थे और उन्हें अपनी फिल्मों में किसी तरह का कोई समझौता करना मंजूर नहीं था चाहे फिर इसके लिए उन्हें कितना ही नुकसान क्यों न हो जाए। जी हां, हम बात कर रहे हैं सुनील दत्त की जिन्हें हर कोई दत्त साहब के नाम से जानता है। सुनील दत्त एक्टर, निर्माता-निर्देशक के साथ ही राजनेता भी थे, ऐसे राजनेता जिनका विपक्ष के नेता भी सम्मान करते थे। 

6 जून 1929 को दीना, पाकिस्तान में जन्मे सुनील दत्त का निधन 25 मई, 2005 को हुआ था। सुनील दत्त में फिल्मों को लेकर एक अलग ही पैशन हुआ करता था और वे इस मामले में किसी तरह का कोई समझौता करने के पक्ष में नहीं रहते थे। 

ऐसा ही एक किस्सा फिल्म रेशमा और शेरा (1971) के समय हुआ। यही वह फिल्म थी जिसने दत्त साहब को कंगाल कर दिया था और इसी फिल्म में उन्होंने सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को एक रोल भी दिया था।

फिल्म रेशमा और शेरा ने सुनील दत्त को बनाया कर्जदार

वैसे तो यह फिल्म जब अनाउंस हुई तो दत्त साहब की प्लानिंग थी कि वे इसे 15 दिन के अंदर राजस्थान में शूट करेंगे। एस. सुखदेव इसे डायरेक्ट करने वाले थे और सुनील दत्त-वहीदा रहमान का लीड रोल था। विनोद खन्ना, राखी गुलजार और अमिताभ बच्चन का भी फिल्म में अहम रोल था। लीड एक्टर्स समेत फिल्म की यूनिट के सभी 100 लोग जैसलमेर के करीब पोचिना गांव में टेंट में रहे। 

फिल्म का ज्यादातर हिस्सा शूट हो चुका था लेकिन इसी दौरान सुनील दत्त ने इसके रशेस देखे, जो उन्हें पसंद नहीं आए। इसके बाद उन्होंने एस. सुखदेव को हटाकर खुद डायरेक्शन का जिम्मा हाथ में लिया और पूरी फिल्म दोबारा शूट की। जहां इसकी शूटिंग 15 दिन में पूरी होनी थी। वहां इसमें दो महीने का वक्त लग गया। 
सुनील दत्त ने एक इंटरव्यू में कहा था, "जब तक फिल्म पूरी हुई, तब तक मुझ पर 60 लाख रुपए का कर्ज हो चुका था। इसके अलावा, मैं एक्टर के तौर पर पांच फिल्में भी ठुकरा चुका था।" 
 
 जब फिल्म फ्लॉप हुई तो कर्जदार बाकायदा सुनील दत्त के पास अपना पैसा मांगने आने लगे। यह बात अलग है कि फिल्म ने तीन नेशनल अवॉर्ड (बेस्ट एक्ट्रेस, बेस्ट म्यूजिक और बेस्ट सिनेमैटोग्रफी) अपने नाम किए थे। 

सुनील ने एक बार बताया था, "मैं 42 साल का हो चुका था और तीन बच्चों का पिता था। पैसे मेरे पास थे नहीं। मेरी 7 में से 6 कार बिक चुकी थीं। सिर्फ एक बचाई थी, जो बेटियों को स्कूल छोड़ने और वापस लाने के काम आती थी। मेरा घर गिरवी रखा हुआ था। मैंने बस से आना-जाना शुरू कर दिया था। तब लोग ताने मारते हुए कहते थे- क्यों सुनील दत्त, सब खत्म हो गया तेरा? अभी बस में जाना शुरू कर दिया?" इस बुरे दौर में घर के अंदर मौजूद नरगिस का प्रीव्यू थिएटर काम आया, जो उन्होंने कुछ वक्त पहले बनाया था। इसमें फिल्ममेकर्स को उनकी फिल्मों के प्रीव्यू और डबिंग के लिए बुलाया जाने लगा।"
सुनील दत्त के लिए दो साल बहुत मुश्किल भरे रहे लेकिन इसके बाद उनकी किस्मत एक बार फिर जागी। उन्होंने 'हीरा' (1973), 'गीता मेरा नाम' (1974), 'प्राण जाए पर वचन न जाए' (1974) और 'नहले पर दहला' (1976) जैसी कई फिल्मों में काम किया, जो बॉक्स ऑफिस पर खूब चलीं। 

सुनील दत्त को इस नाम से बुलाती थी नरगिस 

सुनील दत्त के साथ नरगिस की प्रेम कहानी भी बेहद दिलचस्प है। दोनों ने 1957 में आई फिल्म मदर इंडिया में मां-बेटे का रोल किया था। बाद में असल जिंदगी में में वो पति-पत्नी बने। खास बात यह है कि नरगिस सुनील को मदर इंडिया में उनके ऑनस्क्रीन नाम (बिरजू) से ही पुकारती थीं। 

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