बिमल रॉय : फिल्मों के जरिए मचा देते थे तूफान, तभी इन्हें मिली थी ‘साइलेंट थंडर’ की उपमा

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मुंबई : बिमल रॉय सिर्फ फ़िल्मकार ही नहीं बल्कि अपने आप में एक संस्था थे। उन्होने सिनेमा जगत में कई लोगों को पहचान दी, वो एक ऐसे फिल्मकार थे जिनकी फिल्मे आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ी हुईं हैं। बांग्लादेश के ढाका में 12 जुलाई को एक जमीदार परिवार में जन्मे बिमल रॉय के पिता की अचानक हुई मौत ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। घर में पारिवारिक विवाद के चलते जमींदारी उनके हाथ से छिन गयी। जिसके बाद वो अपने परिवार के साथ कोलकाता में आकर बस गये।

जमींदारी से बेदखल होने का ही नतीजा था कि, कुछ फिल्मों में उस वक्त की हकीकत को उन्होंने पर्दे पर कुछ इस अंदाज में पेश किया जो यादगार फिल्में बन गयीं। इन्हीं फिल्मों में से एक फिल्म थी 'दो बीघा जमीन' जिसे उस दौर की बेहतरीन फिल्मों में शुमार किया गया। वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस फिल्म को काफी पसंद किया गया। इस फिल्म ने कई पुरस्कार जीते थे। 

बिमल रॉय की सोच सामान्य फिल्मकारों से अलग कुछ ऐसी थी कि, जो वो सोचते थे उस दौर में कोई और उस अंदाज में सोचता हो ऐसा संभव ही नहीं था। यही वजह रही कि, उनके जैसी फिल्में बना पाना किसी और के लिए संभव नहीं हो पाया। एक बार महान फिल्मकार राजकपूर ने भी फिल्म 'दो बीघा जमीन' को देख कर कहा था कि उनके जैसी फिल्म वो क्यों नहीं बना पाए। 

उन्होंने मानवीय सरोकारों से जुड़े पहलुओं को अपनी फिल्मों में बेहद खूबसूरत अंदाज में पेश किया, जो हमेशा के लिये यादगार बन गये।  सलिल चौधरी बिमल रॉय के विशेष करीबी रहे। उन्होने ही 'दो बीघा जमीन' फिल्म की कहानी लिखी थी और अभिनेता बलराज साहनी को इस फिल्म में मुख्य भूमिका दिलवाई थी। 

रबींद्रनाथ टैगोर के गीत ‘जन गण मन’ को राष्ट्रीय गान बनाए जाने से पहले उन्होने इस महान गीत को अपनी दूरदर्शिता से बहुत पहले ही परख लिया था। उन्होने साल 1945 में अपनी फ़िल्म ‘हमराही’ में इस गीत को पहली बार प्रस्तुत किया था। 

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ़ासीवाद ने इटली के समाज को तहस नहस कर के रख दिया था। मुसोलिनी के भय से जब ज्यादातर फिल्मकार ऐसा कुछ दिखाने से डर रहे थे, उस दौर में कुछ ही फिल्मकार वास्तविकता दिखाने का साहस कर पाए। इन फिल्मकारों की लिस्ट में रॉबर्ट रोसेलिनी, वित्तोरियो डी सिका और विस्कोन्ती जैसे कुछ फिल्मकारों के साथ बिमल रॉय भी शामिल थे। उन्होने अपनी फिल्म ‘नव-यथार्थवाद’, में शोषित और शोषक के बीच के द्वंद को प्रदर्शित किया। 

वहीं भारतीय संदर्भों में इस संघर्ष को उन्होने अपनी बांग्ला फिल्म ‘उदेर पाथेय' में दिखाया। इस फिल्म ने बांग्ला सिनेमा में जबरदस्त हलचल मचा दी थी। यही वजह रही कि स्वभाव से शांत बिमल रॉय को फिल्म क्रिटिक बुर्जोर खुर्शीदजी करंजिया ने ‘साइलेंट थंडर’ नाम की उपमा दी थी। 

बिमल रॉय को 11 फिल्म फेयर पुरस्कार मिले थे, तो वहीं 1954 में कांस फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हे दो राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था। 1958 में उनके द्वारा बनाई गयी फिल्म 'मधुमति' को 9 फिल्मफेयर पुरस्कार दिये गये थे। यह रिकॉर्ड अगले 37 साल तक कोई नहीं तोड़ पाया था। इस बात से आप उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगा सकते हैं। 'दो बीघा जमीन', 'मधुमति', 'बिराज बहू', सुजाता', 'देवदास' और 'बंदिनी'और 'परिणीता', उनकी शानदार फिल्मों में गिनी जाती हैं । 

महान फिल्मकार बिमल रॉय का निधन साल 1955 में कैंसर की बीमारी से हो गया और वो अपने अधूरे सपने को छोड़ इस दुनिया से चल बसे। दरअसल वो कुंभ पर फिल्म बनाना चाहते थे। अपनी जिंदगी के कम समय में ही उन्होने फिल्म जगत को इतना कुछ दे दिया जो हमेशा याद किया जाएगा। 
 

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