गुरुदेव के 'शांति निकेतन' में अंग्रेजी पढ़ाते थे अभिनेता बलराज साहनी, बापू की सिफारिश पर इंग्लैंड जाकर की थी नौकरी

Balraj Sahani a english Scholar got a job in England with the Refrence of Mahatma Gandhi - Sakshi Samachar

मध्यम वर्गीय व्यवसायी परिवार में हुआ था जन्म

महात्मा गांधी के साथ भी किया था काम

शूटिंग खत्म करके वापस चले जाते थे जेल

बेहतरीन अदाकारी वाली फिल्म थी 'गर्म हवा'

हैदराबाद : "ऐ मेरी जोहरा जबीं, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक हसीं और मैं जवां..." गीत आज भी दिलोदिमाग में बिल्कुल उसी तरह तरोताजा महसूस होती है, जैसे पहली बार सुनने पर  हुई होगी। गाने की मिठास का कोई तोड नहीं, पर बलराज साहनी के अभिनय की तारीफ किए बगैर भी नहीं रहा जा सकता। आज भी उनके अभिनय की बारीकियों को अपने अंदर उतारने में अच्छे-अच्छे कलाकारों के पसीने छूट जाते हैं। उसी महान कलाकार और बॉलीवुड अभिनेता बलराज साहनी को उनकी पुण्यतिथि पर आज हम याद कर हैं। बॉलीवुड में बलराज साहनी को आज भी एक ऐसे अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने अपने संजीदा और दमदार अभिनय से लगभग चार दशक तक सिने प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन किया।

मध्यम वर्गीय व्यवसायी परिवार में हुआ था जन्म
रावलपिंडी शहर (अब पाकिस्तान) में एक मध्यम वर्गीय व्यवसायी परिवार में एक मई 1913 को जन्मे बलराज साहनी का झुकाव बचपन से ही अपने पिता के पेशे की ओर न होकर अभिनय की ओर था। असल में उनका नाम युधिष्ठिर साहनी था। उन्होंने अपनी स्नाकोत्तर की शिक्षा अंग्रेजी साहित्य में लाहौर के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। स्नाकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद बलराज रावलपिंडी लौट गये और पिता के व्यापार में उनका हाथ बंटाने लगे। वर्ष 1930 के अंत में बलराज साहनी और उनकी पत्नी दमयंती रावलपिंडी को छोड़ गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन पहुंचे, जहां बलराज साहनी अंग्रेजी के शिक्षक नियुक्त किये गए।

महात्मा गांधी के साथ भी किया था काम
वर्ष 1938 मे बलराज साहनी ने महात्मा गांधी के साथ भी काम किया। इसके एक वर्ष के बाद महात्मा गांधी के सहयोग से बलराज साहनी को बीबीसी हिन्दी के उदघोषक के रूप में इग्लैंड में नियुक्त किया गया। लगभग पांच वर्ष के इग्लैंड प्रवास के बाद वह 1943 में भारत लौट आये। इसके बाद अपने बचपन के शौक को पूरा करने के लिये इंडियन प्रोग्रेसिव थियेटर ऐसोसियेशन (इप्टा) में शामिल हो गये। इप्टा में वर्ष 1946 में उन्हें सबसे पहले फणी मजमूदार के नाटक 'इंसाफ' में अभिनय करने का मौका मिला। साथ ही ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में इप्टा निर्मित फिल्म 'धरती के लाल' में बलराज साहनी को बतौर अभिनेता काम करने का भी मौका मिला।

शूटिंग खत्म करके वापस चले जाते थे जेल
इप्टा से जुड़े रहने के कारण बलराज साहनी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्हें अपने क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट विचार के कारण जेल भी जाना पड़ा । उन दिनों वह फिल्म 'हलचल' की शूटिंग में व्यस्त थे और निर्माता के आग्रह पर विशेष व्यवस्था के तहत फिल्म की शूटिंग किया करते थे। शूटिंग खत्म होने के बाद वह वापस जेल चले जाते थे। अपनी पहचान को तलाशते बलराज साहनी को लगभग पांच वर्ष तक फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करना पड़ा। वर्ष 1951 में जिया सरहदी की फिल्म 'हमलोग' के जरिये बतौर अभिनेता वह अपनी पहचान बनाने में सफल हुए। वर्ष 1953 में बिमल राय के निर्देशन में बनी फिल्म 'दो बीघा जमीन' बलराज साहनी के कैरियर मे अहम पड़ाव साबित हुई।

मील का पत्थर साबित हुई फिल्म 'दो बीघा जमीन' 
फिल्म 'दो बीघा जमीन' की कामयाबी के बाद बलराज साहनी शोहरत की बुंलदियो पर जा पहुंचे। इस फिल्म के माध्यम से उन्होंने एक रिक्शावाले के किरदार को जीवंत कर दिया था। रिक्शावाले को फिल्मी पर्दे पर साकार करने के लिये बलराज ने कोलकाता की सड़को पर 15 दिनों तक खुद रिक्शा चलाया और रिक्शेवालों की जिंदगी के बारे में उनसे बातचीत की।

वास्तव में बहुत पढ़े-लिखे इंसान थे बलराज साहनी
फिल्म की शुरुआत के समय निर्देशक बिमल राय सोचते थे कि बलराज शायद ही फिल्म में रिक्शावाले के किरदार को अच्छी तरह से निभा सकें। इसका कारण यह था कि वास्तविक जिंदगी में बलराज साहनी बहुत पढ़े-लिखे इंसान थे। लेकिन उन्होंने बिमल राय की सोच को गलत साबित करते हुये फिल्म में अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया। 'दो बीघा जमीन' को आज भी भारतीय फिल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कलात्मक फिल्मों में शुमार किया जाता है। इस फिल्म को अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी सराहा गया तथा 'कांस फिल्म महोत्सव' के दौरान इसे अंतराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

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'काबुलीवाले' के घर एक महीना रहे थे साहनी
वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म 'काबुलीवाला' में भी बलराज साहनी ने अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। बलराज का मानना था कि पर्दे पर किसी किरदार को साकार करने के पहले उस किरदार के बारे में पूरी तरह से जानकारी हासिल की जानी चाहिये। यही वजह थी कि वह मुंबई में एक 'काबुलीवाले' के घर में लगभग एक महीना रहे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी बलराज साहनी अभिनय के साथ-साथ लिखने में भी काफी रूचि रखते थे। वर्ष 1969 में तत्कालीन सोवियत संघ के दौरे के बाद उन्होंने 'मेरा रूसी सफरनामा' किताब लिखी। इसके अलावा बलराज साहनी ने 'मेरी फिल्मी आत्मकथा' किताब के माध्यम से लोगों को अपने बारे में बताया। देवानंद निर्मित फिल्म 'बाजी' की पटकथा भी बलराज साहनी ने लिखी। वर्ष 1957 मे प्रदर्शित फिल्म 'लाल बत्ती' का निर्देशन भी बलराज साहनी ने किया।

चरित्र अभिनेता के रूप में खुद को किया स्थापित
अभिनय में आई एकरूपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में स्थापित करने के लिए बलराज साहनी ने खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इनमें हकीकत, वक्त, दो रास्ते, एक फूल दो माली, मेरे हमसफर जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल हैं। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म 'वक्त' में बलराज साहनी के अभिनय के नये आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इस फिल्म में उन्होंने लाला केदारनाथ के किरदार को जीवंत कर दिया। फिल्म में उन पर फिल्माया गाना 'ऐ मेरी जोहरा जबीं तुझे मालूम नहीं..' सिने दर्शक आज भी नहीं भूल पाए हैं।

बेहतरीन अदाकारी वाली फिल्म थी 'गर्म हवा'
निर्देशक एम.एस.सथ्यू की वर्ष 1973 मे प्रदर्शित फिल्म 'गर्म हवा' बलराज साहनी की मौत से पहले बनी उनकी महान फिल्मों में से सबसे अधिक सफल फिल्म थी। उत्तर भारत के मुसलमानों के पाकिस्तान पलायन की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में बलराज साहनी केन्द्रीय भूमिका में रहे। इस फिल्म में उन्होंने जूता बनाने बनाने वाले एक बूढे़ मुस्लिम कारीगर की भूमिका अदा की। उस कारीगर को यह फैसला लेना था कि वह हिन्दुस्तान में रहे अथवा नवनिर्मित पाकिस्तान में पलायन कर जाये। यदि 'दो बीघा जमीन' को छोड़ दें तो बलराज साहनी के फिल्मी कैरियर की सबसे बेहतरीन अदाकारी वाली फिल्म 'गर्म हवा' ही थी। अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों को भावविभोर करने वाले महान कलाकार बलराज साहनी आज के दिन 13 अप्रैल 1973 को इस दुनिया को अलविदा कह गये।

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