नेहरू से प्रियंका तक.., जानिए धर्म निरपेक्ष कांग्रेस नेताओं को कब-कब बदलनी पड़ी अपनी नीति ?

secularism from nehru to priyanka how it changed in congress party time by time   - Sakshi Samachar

धर्म निरपेक्ष कांग्रेस पार्टी

समय-समय पर कांग्रेस को भी बदलनी पड़ी नीति

धर्म निरपेक्ष कांग्रेस : लंबे इंतजार के बाद भारत में हिंदुओं का सपना 5 अगस्त को उस वक्त पूरा हो गया जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम मंदिर के लिए  पवित्र शुभ मुहूर्त में मंदिर की आधार शिला रख दी। राम मंदिर भूमि पूजन अनुष्ठान में 9 शिलाओं की विधवत पूजा अर्चना हुई। पीएम मोदी राम लला के आगे दंडवत हुए, और पूरे विधि विधान से आयोजन को संपन्न कराया। जिसके बाद ये दिन ऐतिहासिक हो गया, आने वाली पीढ़ियां इन गौरवशाली पलों के बारे में सदियों तक पढ़ती रहेंगी। क्योंकि यह खास घटना अब इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो चुकी है।  

धर्म के मामले पर हमेशा मुखर रही है बीजेपी

माना जाता रहा है कि बीजेपी शुरू से ही इस मुद्दे पर मुखर रही और अपनी राजनीति का आधार बना कर  आगे बढ़ती रही। यही वजह रही की देश की जनता ने जनादेश आखिरकार बीजेपी को दिया और लंबे आंदोलन के बाद अब राम मंदिर निर्माण का सपना पूरा होने जा रहा है। बीजेपी ने खुले तौर पर देश में जन-भावना का ध्यान रखा, और राम मंदिर निर्माण कराने के अपने वादे को पूरा करने में सफल रही है। 

एक तरफ जहां बीजेपी धर्म के मुद्दे पर साफ तौर पर मुखर हो कर देश की राजनीति करती रही है। बीजेपी का साफ मानना है कि वह धर्म निरपेक्ष होने के साथ ही देश में हिन्दू संस्कृति, सनातन धर्म और हिन्दू परंपराओं का समर्थन करती रहेगी, और देश में राम राज की परकल्पना को साकार करने का काम करेगी। 

धर्म निरपेक्ष कांग्रेस 

वहीं कांग्रेस की बात करें तो देश की प्रमुख पार्टी रही कांग्रेस धर्म निरपेक्षता के नक्शे कदम पर शुरू से ही चलती रही है। लेकिन कांग्रेस के लिए धर्म निरपेक्षता के मायने कुछ इस तरह से रहे हैं कि वह अपनी राजनीति तुष्टीकरण की नीति पर करती रही है। कांग्रेस को हमेशा यह भय सताता रहा कि कहीं मुस्लिम समाज नाराज न हो जाए। आइए जानते हैं नेहरू से लेकर अब तक कांग्रेस नेताओं की हिन्दू समाज के प्रति नीति कैसी रही है? 

जवाहर लाल नेहरू
देश के प्रथम प्रधानमंत्री की राजनीति का आधार पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष रहा, हमेशा वो अपनी इस विचार पर अडिग रहे, उन्होने साल 1933 में महात्मा गांधी को लिखे पत्र में कहा था कि 'जैसे- जैसे मेरी उम्र बढ़ रही है, धर्म के प्रति मेरी नजदीकी कम होती गई है'। इस बात से साफ है कि वो राजनीति और धर्म को अलग-अलग रखना चाहते थे। यही वजह रही कि इस विषय पर अन्य नेताओं से वैचारिक टकराव होते रहे। प्रजातंत्र में धर्म के प्रति उनकी सोच उस वक्त और भी मुखर हो गयी जब साल 950 में गुजरात के सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का समय आया। जवाहर लाल नेहरू इस समारोह से दूरी बना कर रखना चाहते थे, और उन्होंने अन्य नेताओं को भी कार्यक्रम में नहीं जाने की सलाह दी थी। 

जवाहर लाल नेहरू कि इच्छा के विपरीत देश के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इस आयोजन में जाने का निर्णय लिया और वो उसमें शरीक भी हुए। जिसके बाद जवाहर लाल नेहरू उनसे नाराज हो गए थे। अपनी नाराजगी जताते हुए उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ जाने का विरोध किया था और कहा था कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के शासनाध्यक्ष को ऐसे धार्मिक आयोजन के साथ खुद को नहीं जोड़ना चाहिए । लेकिन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जवाहर लाल नेहरू की इस बात से सहमत नहीं हुए थे। इस घटना के बाद से ही दोनों नेताओं के बीच की दूरियां भी बढ़ती चली गईं।

लाल बहादुर शास्त्री 
बात करते हैं लाल बहादुर शास्त्री की, जवाहर लाल नेहरू के विपरीत लाल बहादुर शास्त्री को अपनी हिंदू पहचान से कभी कोई परहेज नहीं रहा। धर्मनिरपेक्षता को लेकर उनका नजरिया अलग रहा, हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही समुदायों के प्रति समान भाव रखने वाले लाल बहादुर शास्त्री को कभी भी भारत की धार्मिक एकता के बारे में कभी कोई शक नहीं रहा। उस दौर में भी 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने पार्टी की नीतियों के खिलाफ जाकर RSS के तत्कालीन प्रमुख गुरू गोलवलकर से सलाह लेने में कोई संकोच नहीं किया। लाल बहादुर शास्त्री के बारे में लालकृष्ण आडवाणी ने भी अपनी आत्मकथा जिक्र किया है। उन्होंने 'माइ कंट्री माइ लाइफ़' में लिखा है कि 'नेहरू के विपरीत लाल बहादुर शास्त्री ने जनसंघ और RSS के प्रति कभी किसी तरह का वैमनस्य नहीं रखा। 

इंदिरा गांधी
इंदिरा गाँधी को जब सत्ता मिली उस वक्त वो धर्मनिरपेक्षवाद और समाजवाद की सबसे बड़ी समर्थक रहीं। यही वजह रही कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ भी ईश्वर के नाम पर न लेकर सत्यनिष्ठा के नाम पर ली थी। साल 1967 में उनके लिए सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा का वक्त रहा जब जब गौरक्षा को लेकर आंदोलन कर रहे कई हजार साधु-संतों ने संसद का घेराव कर दिया था। इस घटना में छह साधुओं को पुलिस की गोली से अपनी जान तक गंवानी पड़ गई, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने संतों की बात नहीं स्वीकारी। 

लेकिन देश काल और परिस्थितियों ने इंदिरा गांधी को भी ईश्वर की ओर झकने को मजबूर कर दिया। साल 1980 के दौरन इंदिरा गांधी का झुकाव ईश्वरी तत्व और मंदिरों की ओर होने लगा था।  जिसकी मुख्य वजह रही 1977 में हुई चुनावी हार और साल 1980 में बेटे संजय गांधी की मौत। बताया जाता है कि उनके अंदर इस तरह के बदलाव लाने का श्रेय रेल मंत्री कमलापति त्रिपाठी को जाता है। कहा जाता है कि एक बार तो इंदिरा गांधी ने नवरात्र के अवसर पर कुंवारी कन्याओं के पैर धुले पानी को पीने की रस्म को भी पूरा किया था। इस बात का उल्लेख  लेखिका कुमकुम चड्ढ़ा ने अपनी किताब 'द मैरी गोल्ड स्टोरी - इंदिरा गांधी एंड अदर्स' में जिक्र किया है। दिल्ली में वो हमेशा  श्री आद्य कात्यायिनी शक्तिपीठ मंदिर भी जाया करती थीं, जिसे छतरपुर मंदिर के नाम से जाना जाता है। 

राजीव गांधी 
बात करते हैं राजीव गांधी की, इंदिरा गाँधी के बेटे राजीव गाँधी वैसे तो खुद धार्मिक नहीं थे लेकिन धर्म को लेकर उनके विचार सौहार्द पूर्ण रहे। उन्होंने अपने राजनीतिक सलाहकारों की बात पर अमल किया। यही वजह रही कि साल 1989 में अयोध्या से अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की थी। अपने चुनाव प्रचार में उन्होंने रामराज्य का वादा जनता से किया था। उस दौर में भी उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हिन्दुओं की जन भावना का ध्यान रखा और 1986 में उन्होंने उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीर बहादुर सिंह को मनाया और राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवाए। जिसके बाद  हिंदुओं को भगवान श्रीराम के दर्शन का लाभ मिला। वहीं साल 1989 में उन्होंने विहिप को राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति प्रदान की थी और तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह को शिलान्यास में शिरकत करने के लिए लिए भेजा था।

नरसिम्हा राव 
ब्राह्मण परिवार में जन्मे नरसिम्हा राव का पूरा जीवन धार्मिक रहा था। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत निजाम के संघर्ष के साथ शुरू हुई थी। वहीं राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही वो हिन्दू महासभा और आर्य समाज से जुड़े रहे थे। बाबरी मस्जिद गिराए जाने के वक्त वो देश के प्रधानमंत्री थे। उस वक्त उनकी चिंता हिन्दुओं और मुस्लिमों दोनों को ही साथ लेकर चलने की थी। एक तरफ मुस्लिम कांग्रेस का साथ छोड़ रहे थे तो वहीं हिन्दुओं में भी सभी जाति के लोगों का झुकाव बीजेपी की ओर हो रहा था। एक तरफ वो जहां हिंदू भावनाओं की भी रक्षा करना चाहते थे तो वहीं यह भी चाहते थे कि बाबरी मस्जिद को भी सुरक्षित रखना चाहते थे। धर्मनिरपेक्षता की इसी नीति पर चलते हुए वो एक राय कायम करने की कोशिश में लगातार लगे रहे। 

प्रियंका गांधी 

वहीं राम मंदिर निर्माण और भूमि पूजन को लेकर कांग्रेस नेताओं के स्वर भी अब बदले बदले से नजर आने लगे हैं। अभी तक भूमि पूजन का या तो कुछ कांग्रेसी नेता विरोध कर रहे थे, या फिर मौन साधे हुए थे। लेकिन अब, जब कांग्रेस नेताओं को भी ये अंदाजा लग गया कि वे जन-भावना का विरोध नहीं कर सकते हैं, वरना हासिए पर पहुंच चुकी कांग्रेस का हश्र और भी बुरा हो सकता है। यही वजह रही की कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने जन-भावना के प्रति सम्मान का इजहार करते हुए ट्वीट किया और कहा कि कि भगवान राम सबमें हैं और सबके हैं तथा ऐसे में पांच अगस्त को अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए होने जा रहा भूमि पूजन राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का कार्यक्रम बनना चाहिए।

मौजूदा दौर में राजनीतिक पटल पर हासिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस अब एक बार फिर से जन-भावना का ध्यान रखते हुए अपनी धर्मनिरपेक्षता के मायने की परिभाषा तैयार करने में जुट गयी है। 

-विमल श्रीवास्तव, वरिष्ठ सब एडिटर
 

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