क्या आप जानते हैं राम प्रसाद बिस्मिल के इन किस्सों के बारे में, ऐसे हुनर वाले इकलौते क्रांतिकारी

 Know About Ram Prasad Bismil History on Birth anniversary - Sakshi Samachar

उत्तर प्रदेश की शहीदी धरती पर एक से बढ़कर एक क्रांतिकारी पैदा हुए थे, उनमें से ही एक क्रांतिकारी को रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से जाना जाता हैं। आज इनका जन्मदिन है। 11 जून 1897 को  राम प्रसाद बिस्मिल उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में पैदा हुए थे। उनका नाम ऐतिहासिक काकोरी कांड में आता है। उसके बाद राम प्रसाद बिस्मिल की गिरफ्तारी भी हुई थी और उन्हें फिर गोरखपुर के जेल में ले जाकर फांसी पर चढ़ा दिया गया था।

 बहुत सारे लोग यह बात तो जानते हैं कि राम प्रसाद बिस्मिल बहुत ही अच्छे साहित्यकार और बहुआयामी प्रतिभा के व्यक्तित्व वाले इंसान थे। उनके अंदर एक संवेदनशील कवि, शायर, साहित्यकार, इतिहासकार के साथ-साथ एक अच्छा अनुवादक भी छुपा था।  'बिस्मिल' तो उन्होंने लेखन के लिए अपना उपनाम रखा था इसके अलावा उन्होंने कविता के लिए भी दो अलग-अलग नाम रखे थे एक नाम 'राम' था तो दूसरा 'अज्ञात'।


रामप्रसाद बिस्मिल

आपको बता दें कि अपने 30 साल के जीवन काल में राम प्रसाद बिस्मिल ने 11 किताबें लिख डालीं, जो अंग्रेजी शासनकाल में प्रकाशित तो हुई लेकिन अंग्रेजों द्वारा जप्त कर ली गयीं। आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि वह दुनिया के इकलौते ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने किताबों के लेखन से जो भी धन अर्जित किया उसे अपनी क्रांति के लिए जरूरी हथियार और सामग्री खरीदने में लगा दिया।

राम प्रसाद बिस्मिल के क्रांतिकारी बनने की घटना भी अजीबोगरीब है। राम प्रसाद बिस्मिल आर्य समाज और वैदिक धर्म के प्रमुख प्रचारकों में से एक भाई परमानंद की गिरफ्तारी और उनकी फांसी की सजा के बाद इतने दुखी और प्रभावित हुए कि उन्होंने परमानंद की फांसी की सजा पर एक कविता लिखिए जिसका शीर्षक था 'मेरा जन्म'>  इस कविता को लिखने के बाद उन्होंने तय कर लिया था कि अब उनका एक ही धर्म होगा और वह धर्म होगा "भारत माता को आजाद कराना" । इसी संकल्प के साथ राम प्रसाद बिस्मिल एक क्रांतिकारी बनने का फैसला कर चुके थे।

ऐसे हैं उनसे जुड़े किस्से
कहा जाता है कि 'बिस्मिल' ने 'देशवासियों के नाम संदेश' नाम का एक पम्फलेट प्रकाशित किया था, जिसके लिए अंग्रेजों ने उनकी धरपकड़ का फरमान जारी कर दिया। उसके कारण उन्हें भूमिगत होना पड़ा। इसी दौरान जब वह एक कार्यक्रम में गए तो वहां पुलिस का छापा पड़ा और उन्हें यमुना में कूदकर भागना पड़ा। वह यमुना में डूबते-उतराते उस समय के बीहड़ों व बबूलों वाले जंगल में जा पहुंचे । उसी स्थान को अब ग्रेटर नोएडा के नाम से जाना जाता है।

लोग बताते हैं कि इसके बाद उन्होंने फिर रामपुर जागीर नाम के एक छोटे से गांव में शरण ली और यहां वो फिर किताब लिखने में जुट गए। इस दौरान उन्हें भगोड़ा घोषित करके सजा सुनाई जा चुकी थी। इसके बाद बिस्मिल भी पकड़ में आए। सजा भी हुई पर फरवरी, 1920 में रिहा होने के बाद वो शाहजहांपुर वापस लौटे। इसके बाद कांग्रेस के 1920 में कलकत्ता और 1921 में अहमदाबाद अधिवेशन में हिस्सा लिया। लेकिन वह कांग्रेस की कार्य प्रणाली देख खुद को अलग कर लिया।

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इसके बाद बिस्मिल ने चंद्रशेखर 'आजाद' के नेतृत्व वाले हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ मिलकर गोरों के सशस्त्र प्रतिरोध का नया दौर शुरू किया। इसी दौरान 9 अगस्त, 1925 को अपने साथियों के साथ मिलकर काकोरी में ट्रेन से ले जाये जा रहे सरकारी खजाने को लूटा। इसके बाद 26 सितंबर, 1925 को वह फिर से पकड़े गए। इसी आरोप में बाद में  उन्हें 19 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी गई।

इसी बीच जब उनकी मां जेल में उनसे मिलने पहुंची तो बिस्मिल की आंखें डबडबाई आईं। तब उनकी मां ने उन्हें उलाहना देते हुए कहा था, 'अरे, मैं तो समझती थी कि मेरा बेटा बहुत बहादुर है और उसके नाम से अंग्रेज सरकार भी थरथराती है। मुझे पता नहीं था कि वह मौत से इतना डरता है। तुझे ऐसे रोकर ही फांसी पर चढ़ना था तो तूने क्रांति की राह चुनी ही क्यों..? तब तो तुझे तो इस रास्ते पर कदम ही नहीं रखना चाहिए था...।'

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