लॉकडाउन में मासूम को घर से निकाला, आखिर ऐसा कैसे कर लेते हैं लोग ?

How people can be so insensetive - Sakshi Samachar

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा

मासूम को घर से निकाला

IPS अधिकारी ने की बच्चे की मदद

दुनिया भर में कोरोना महामारी ने कहर मचा रखा है। एक तरफ जहां लगातार कोरोना मरीजों की संख्या दुनिया भर में बढ़ रही है, तो वहीं मरने वालों का भी आंकड़ा भी डरा रहा है । ऐसे में दुनिया भर में लोगों को जिंदगी का असल मतलब समझ में आया, लोग एक दूसरे की मदद करते नजर आए । कोरोना वायरस से मुक्ति दिलाने के लिये लोग आगे आए हैं और कोरोना वारियर्स बन कर बिना किसी स्वार्थ के लोगों की मदद कर रहे हैं । इन कोरोना वारियर्स में डॉक्टर्स, पुलिसकर्मी, और तमाम समाजसेवी शामिल हैं । वहीं कुछ ऐसे भी लोगों ने बढ़ चढ़ कर लोगों की मदद की जिन्हे कोई भी नहीं जानता, बावजूद इसके ये लोग मदद करने के लिये आगे आ रहे हैं । 
 
ऐसे में क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं, कि कोई जान पहचान वाला मदद करने के नाम पर पीछे हट जाए, जी हां ऐसे लोग भी समाज में हैं जो केवल अपने निजी स्वार्थ के बारे में ही सोचते हैं। कुछ ऐसा ही मामला सामने आया है दिल्ली में, इस पूरी कहानी को जान कर आप हैरान रह जाएंगे । 13 साल के माता-पिता अपने बच्चे को इस भरोसे के साथ दिल्ली में एक शख्स के पास छोड़ कर गये थे कि वह उसकी लॉकडाउन मे देखभाल कर लेगा, लेकिन उस शख्स ने उस बच्चे को घर से भगा दिया ।  

वह बच्चा कई दिन तक भूखा प्यासा पार्क में पड़ा रहा। मामले का खुलासा तब हुआ जब कुत्तों को पार्क में रोटी खिलाने पहुंची एक महिला की नजर बच्चे पर पड़ी, जिसके बाद  उड़ीसा कैडर के एक आईपीएस अधिकारी की मदद से अब बच्चा माता-पिता से मिल चुका है, और स्वास्थ्य लाभ कर रहा है। दरअसल ये घटना दिल्ली के द्वारका इलाके की है। बच्चे के बारे में उड़ीसा कैडर के जिस आईपीएस अधिकारी ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा था उनका नाम अरुण बोथरा है। अरुण बोथरा के मुताबिक, बच्चा कई दिनों तक पार्क की बेंच पर ही लेटा-बैठा रहा। जब पार्क में कुत्तों को रोटी खिलाने जाने वाली महिला की नजर बच्चे पर पड़ी, तो वे उसे खाना खिलाने लगी । 

उसके बाद एक एनजीओ की और सोशल मीडिया की मदद ली गई। जिसमें कामयाबी मिल गई। जैसे ही परिवार को पता चला वो बच्चे से मिलने दिल्ली पहुंच गया। हालांकि, बच्चे का परिवार समस्तीपुर में था। किसी आईपीएस अधिकारी संजय ने बच्चे के परिवार को पटना पहुंचाने का इंतजाम किया। फिलहाल बच्चा और परिवार अब साथ साथ हैं।

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लेकिन ये घटना बेहद चौकान वाली है कि आखिर लोग ऐसा किस प्रकार कर सकते हैं । कोरोना महामारी के इस दौर में जब लोग अंजान लोगों की मदद भी दिल खोल कर कर रहे है, तो ऐसे में कोई किसी के भरोसे का कत्ल कैसे कर सकता है। क्या लोगों की संवेदनाए मर चुकी हैं । जी नहीं अगर ऐसा होता तो लोग एक दूसरे की मदद नहीं कर रहे होते। लेकिन अफसोस की बात तो इस बात का है कि समाज में ऐसे लोग भी मौजूद हैं जिन्हे अपने आगे कुछ और नहीं सूझता है। शायद उन्हे नहीं मालूम कि इंसान को अपने किये का फल भुगतना पड़ता है । 
 

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