भारत में एशियाई और अफ्रिकी प्रजातियों के चीतों के बीच प्रजनन

Genetic Study of Source of Extinct Indian Cheetah - Sakshi Samachar

विश्व स्तर पर एशियाटिक चीतोें की संख्या

माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए विश्लेषण

स्तनधारी जीवों की गैलरी से एक चीते की त्वचा का नमूना

डॉ के थंगराज
सीएसआईआर-कोशिकीय एवं आण्विक जीव विज्ञान केंद्र 
हैदराबाद
पिछली कई शताब्दियों से भारत में चीता जो कि बिल्ली की सबसे बड़ी प्रजाति है, की आबादी में लगातार कमी दर्ज की जा रहीं हैं। वर्तमान में इन बिल्लियों की सबसे बड़ी आबादी अफ्रिका में पायी जाती है। इन्हें अफ्रिकी चीता कहा जाता है। दूसरी ओर, ईरान में एशियाई चीतों की संख्या मात्रा 50 के लगभग है। लगभग एक दशक से भी अधिक समय से, भारत इस विषय पर चर्चा कर रहा है कि क्या देश में चीतों को पुन: जंगलों में लाना चाहिए। जबकि भारत में पहले एशियाटिक चीते थे, जिनकी संख्या विश्वभर में घट रही है, यह देखने की कोशिश की जा रही है कि क्या अफ्रिकी चीता भारतीय परिस्थितियों को अपना सकते है। इस वर्ष के शुरुआत में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को देश में दक्षिणी अफ्रिकी चीता को अनुकूल आवास में रखने की अनुमति दी थी। 
एक प्रमुख पैरामीटर जो भारत में एशियाई और अफ्रिकी प्रजातियों के चीतों के बीच प्रजनन का फैसला करता है। यह देखना होगा कि दोनों आबादियां आपस में कितनी अलग हैं। सीएसआईआर-कोशिकीय एवं आण्विक जीव विज्ञान केंद्र (सीसीएमबी), हैदराबाद के वैज्ञानिक बीरबल साहनी, इंस्टीट्यूट ऑफ पलायोसाइंसेस,लखनऊ, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, दक्षिण अफ्रिका, नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, सिंगापुर के सहयोग से एशियाटिक और जुबेटस की उप-प्रजातियों-एशियाटिक और दक्षिण अफ्रिकी चीतों के विकास के इतिहास के विवरण को गहराई से समझने के लिए माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए विश्लेषण प्रदान करते हैं। बहुत पहले क्रमिक विकास के साथ ये दोनों आबादियां एक-दूसरे से भिन्न होती गयीं। यह परिणाम हाल ही में वैज्ञानिक रपट में प्रकाशित हुई। 
इस अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और सीसीएमबी के मुख्य वैज्ञानिक डॉ के थंगराज ने कहा, "हमने तीन पृथक प्रजातियों के चीतों के नमूनों का विश्लेषण किया है-पहला कोलकाता के भारतीय प्राणई सर्वेक्षण (जेडएसआई) के स्तनधारी जीवों की गैलरी से एक चीते की त्वचा का नमूना था, जिसे मैसूर प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय से प्राप्त किया गया था और तीसरा नेहरू प्राणी उद्यान (एनजेडपी), हैदराबाद से वर्तमान में पाये जानेवाले चीते के नमूने का एक रक्त नमूना था।"
"हमने सीसीएमबी की प्राचीन डीएनए सुविधा में दोनों ऐतिहासिक नमूनों (त्वचा और हड्डी) से डीएनए अलग किया है, इस अध्ययन के प्रमुख लेखकों में से एक डॉ नीरज राय ने कहा कि इन दो नमूनों के माइटोकॉन्ड्रियल (एमटीडीएनए) और वर्तमान में पाये जाने वाले चीतों के नमूनों को क्रमबद्ध किया गया और अफ्रिका व दक्षिण पश्चिम एशिया के विभिन्न भागों में पाये जाने वाले 118 चीतों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए का विश्लेषण किया गया। 
डॉ थंगराज ने कहा कि " जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के संग्रहालय से प्राप्त नमूने एवं नेहरू प्राणी उद्यान के आधुनिक नमूने पूर्वोत्तर अफ्रिकी मातृवंश के हैं, मैसूर के संग्रहालय से प्राप्त नमूने दक्षिण पूर्व अफ्रिकी चीतों के साथ घनिष्ठ संबंध दर्शाते हैं।"
इस अध्ययन के व्यापक विश्लेषण से पता चलता है कि दक्षिण-पूर्व अफ्रिकी और एशियाई चीतों दोनों के साथ उत्तर-पूर्वी अफ्रिकी चीतों के बीच विभाजन 100-200,000 वर्ष पूर्व का है। उनके परिणाम यह भी बताते हैं कि दक्षिण-पूर्व अफ्रिकी और एशियाई चीतों 50-100,000 वर्ष पूर्व एक-दूसरे से अलग हो गये थे। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के डॉ गाई जैकब्स के अनुसार- "यह एक मौजूदा धारणा के विपरीत है कि एशियाई और अफ्रिकी चीतों के बीच विकासवादी विभाजन मात्र 5,000 वर्षों का ही है।" सीसीएमबी के निदेशक डॉ राकेश कुमार मिश्र ने कहा कि यह अध्ययन एशियाई चीतों की आनुवंशिक विशिष्टता स्थापित करने की दिशा में साक्ष्य प्रदान करता है और इसलिए उनके संरक्षण के लिए लक्षित प्रयास को पूरा करता है। 

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