शीतला अष्टमी पर यूं करेंगे पूजा तो प्रसन्न होंगी मां शीतला, जानें पूजा विधि, महत्व व कथा

Significance of sheetala ashtami puja method, muhurat, story  - Sakshi Samachar

शीतला अष्टमी का पावन पर्व चैत्र मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। इस दिन शीतला माता की पूजा होती है साथ ही उन्हें एक दिन पहले बने बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और वही प्रसाद रूप में ग्रहण भी किया जाता है। 

बासी भोजन के महत्व के कारण इस पर्व को बसोड़ा भी कहते हैं। इस दिन शीतला माता की पूजा होने की वजह से घर में चूल्हा नहीं जलता। मां को भी ठंडी चीजों का भोग लगता है और भक्तजन भी वही प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। 

शीतला अष्टमी की पूजा का महत्व

 चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को बसोड़ा मनाया जाता है। इसे बासड़े और शीतला अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। बसोड़ा मुख्य रूप से राजस्थान में मनाया जाता है लेकिन भारत में इस त्योहार को अलग- अलग नामों से मनाया जाता है। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है। 
बसोड़ा से एक दिन पहले खाना बनाया जाता है। जिसमें कच्चा और पक्का दोनों प्रकार का भोजन होता है। इसके बाद बसोड़ा के दिन जहां पर होलिका दहन किया गया हो उस जगह जाकर माता शीतला की पूजा की जाती है। 

माता शीतला को रोगों को देवी माना जाता है। इस दिन मां अपने बच्चों के लिए माता शीतला की पूजा करती हैं। माना जाता है कि माता शीतला की पूजा करने से बच्चों को किसी भी प्रकार का कोई रोग नहीं होता। माता शीतला का पूजन बासी भोजन से किया जाता है। शीतला माता को शीतलता की देवी कहा जाता है। इसलिए इसी कारण से ही माता शीतला का पूजन ठंडे खाने के साथ किया जाता है। राजस्थान में तो बसोड़ा पूजन के बाद तीन दिनों तक बासी भोजन करने का ही विधान भी है।

ऐसे करें मां शीतला की पूजा 

- शीतला अष्टमी से एक दिन पहले ही सप्तमी तिथि के दिन स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करें और कच्चा और पक्का खाना बनाएं। आपको इसमें शुद्धता का विशेष रूप से ध्यान रखना है। 

-  इसके अगले दिन यानी बसोड़े के दिन ठंडे पानी से नहाएं और साफ वस्त्र धारण करें।

- पूजा के समय एक कड़वारे भरे। कड़वारे में रबड़ी, चावल, पुए,पकौड़े और कच्चा पक्का खाना रखें। 

- इसके बाद एक दूसरी थाली तैयार करें। जिसमें काजल, रोली,चावल, मौली, हल्दी, होली वाले बड़गुल्लों की एक माला व एक रूपए का सिक्का रखें।

- सभी सामग्री तैयार करने के बाद बिना नमक का आंटा गूथकर उससे एक दीपक बनाएं और उसमें रूई की बाती घी में डुबोकर लगाएं।

- इसके बाद यह दीपक बिना जलाए ही माता शीतला को चढ़ा दें। पूजा की थाली पर कंडवारो से तथा घर के सभी सदस्यों को रोली और हल्दी से टीका लगाएं। 

- टीका लगाने के बाद मंदिर में जाकर पूजा करें या शीतला माता घर हो तो सबसे पहले माता को स्नान कराएं। 

- इसके बाद रोली और हल्दी से मां का टीका करें। 

- माता शीतला को काजल, मेहंदी, लच्छा और वस्त्र अर्पित करें। तीन कंडवारे का समान अर्पित करें। 

- माता शीतला को बड़गुल्ले अर्पित करें। आटे का दीपक बिना जलाएं अर्पित करें। इसके बाद मां की आरती उतारें। 

- माता को भोग की चीजें अर्पित करें और जल चढ़ाएं और जो जल बहे उसमें से थोड़ा सा जल लोटे में डाल लें। 

-  इसके बाद यह जल घर में छिड़क दें। इससे घर की शुद्धि होती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

शीतला माता की कथा 

 बसोड़ा की कथा के अनुसार एक बार एक बुढ़िया और उसकी दो बहुओं ने बसोड़े का व्रत रखा। जिसमें उन्होंने माता शीतला की पूजा करके उन्हें बासी चावल चढ़ाए और खाए। लेकिन उन्होंने बसोड़े के दिन ताजा खाना बना लिया था। उन दोनों बहुओं को हाल ही में संतान हुई थी। जिसक वजह से उन्हें डर था कि बासा भोजन उन्हें नुकसान करेगा। जब उन दोनों की सास को इसके बारे में पता तो चला तो वह बहुत ही ज्यादा गुस्सा हुई। जिसके थोड़ी देर बाद ही उन दोनों की संतान मृत्यु को प्राप्त हो गई।

सास को जब इस बारे में पता चला तो उसने अपनी बहुओं को घर से निकाल दिया जिसके बाद वह दोनों घर से निकलकर चल दी रास्ते में वह आराम करने के लिए रूकीं जहां उन्हें ओरी और शीतला मिली वे दोनों अपनी जुओं से बहुत परेशान थीं। जिसके बाद उन दोनों को ओरी और शीतला की यह दशा देखकर दया आ गई और दोनों ने मिलकर उन दोनों का सिर साफ कर दिया। इसके बाद दोनों ने आशीर्वाद दिया कि जल्द ही तुम दोनों की कोख हरी हो जाए। जिसे सुनकर वह दोनों रोने लगी। जिसके बाद दोनों ने अपने- अपने बच्चों के शव दिखाए। जिसके बाद शीतला ने कहा कि तुमने बसोड़े के दिन ताजा भोजन बनाया था। इसी कारण से यह सब हुआ है। जिसके बाद दोनों ने क्षमा याचना की और उनके बच्चे जिंदा हो गए।
 

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