आज है शनि पुष्य नक्षत्र का शुभ योग, खरीदारी के साथ करेंगे ये खास काम तो चमकेगा भाग्य

Significance of shani pushya nakshatra which is on 7 november  - Sakshi Samachar

शनि पुष्य नक्षत्र का महत्व 

पुष्य नक्षत्र में करें खास खरीदारी

खरीदारी का मिलता है शुभ फल

हिंदू धर्म में पुष्य नक्षत्र का बड़ा महत्व है और माना जाता है कि इस नक्षत्र में किया गया काम या फिर खरीदी उपयोगी, शुभ फल देने वाली और अक्षय होती है । वहीं इस दिन खास खरीदारी से भाग्य का सितारा चमकने लगता है। ऋग्वेद में पुष्य नक्षत्र को मंगलकर्ता भी कहा गया है इसीलिए पुष्य नक्षत्र को खरीदारी के लिए विशेष मुहूर्त माना जाता है।

दिवाली से पहले इस बार 7 नवंबर,2020 शनिवार को शनि पुष्य नक्षत्र है और इसी दिन बहीखाता खरीदी मुहूर्त भी रहेगा। इस दिन का लोग कई दिन पहले से इंतजार कर रहे होते हैं और इस दिन खास खरीदी की जाती है साथ ही कुछ खास काम भी किए जाते हैं। 

यदि पुष्य नक्षत्र सोमवार को आए तो उसे सोम पुष्‍य, मंगलवार को आए तो उसे भौम पुष्य, बुधवार को आए तो बुध पुष्य, गुरुवार को आए तो गुरु पुष्य, शुक्र को आए तो शुक्र पुष्‍य, शनि को आए तो शनि पुष्‍य और रवि को आए तो रवि पुष्‍य नक्षत्र कहते हैं। इनमें से गुरु पुष्‍य, शनि पुष्‍य और रवि पुष्य नक्षत्र सबसे उत्तम बताए गए हैं। सभी का फल अलग-अलग होता है।

शनि पुष्य नक्षत्र मुहूर्त 

शुभ समय-
शुभ का चौघड़िया : सुबह 7.59 से 9.23 तक।
चर का चौघड़िया :
दोपहर 12.10 से 13.34 तक।
लाभ का चौघड़िया :
दोपहर 13.34 से दोपहर 14.57 तक।
अमृत का चौघड़िया : दोपहर 14.57 से 16.21 तक।
लाभ का चौघड़िया : शाम 17.44 से 19.21 तक।
शुभ का चौघड़िया :
रात्रि 20.57 से 22.34 तक।
अमृत का चौघड़िया :
22.34 से 00.11 तक।
इस समयावधि में व्यापारीगण अपनी सुविधानुसार बहीखाता ला सकते हैं।

बहीखाता खरीदी के लिए उत्तम पुष्य नक्षत्र

दिवाली से पहले पुष्य नक्षत्र का इंतजार व्यापारी गण खासतौर पर करते हैं जिससे कि बहीखाता खरीद सकें। तो ये लोग जान लें कि शनिवार, 7 नवंबर 2020 को पुष्य नक्षत्र 8.05.00 से लगेगा, जो रविवार, 8 नवंबर 2020 को 8.45.00 बजे तक रहेगा। 

आजकल कम्प्यूटर का जमाना आ गया है और बहीखाते का चलन कम हो गया है लेकिन अभी भी कई व्यापारी अपना हिसाब-किताब रखने के लिए बहीखाते का ही उपयोग करते हैं और इसे शुभ माना जाता है। 

व्यापारी भाई अपने सालभर का हिसाब-किताब रखने के लिए बहीखाता शुभ पुष्य नक्षत्र में ही लाते हैं। इस बार पुष्य नक्षत्र शनिवार को है, वहीं पुष्य नक्षत्र शनि का ही नक्षत्र है।

शनि पुष्य नक्षत्र में करें ये खास काम ....

- पुष्य नक्षत्र में खासतौर पर सोना खरीदा जाता है। सोना खरीदने का प्रचलन इसलिए है क्योंकि इसे शुद्ध, पवित्र और अक्षय धातु के रूप में माना जाता है और पुष्य नक्षत्र पर इसकी खरीदी अत्यधिक शुभ होती है। पुष्य नक्षत्र पर गुरु, शनि और चंद्र का प्रभाव होता है तो ऐसे में स्वर्ण और चांदी की वस्तुएं खरीदी जा सकती है। मान्यता अनुसार इस दौरान की गई खरीदारी अक्षय रहेगी। अक्षय अर्थात जिसका कभी क्षय नहीं होता है।

- इस नक्षत्र में वाहन, भवन और भूमि खरीदना भी शुभ होता है। इस दिन मंदिर निर्माण, घर निर्माण आदि काम भी प्रारंभ करना शुभ हैं। इस नक्षत्र में शिल्प, चित्रकला और पुस्तक खरीदना उत्तम माना जाता है।

- पीपल के पेड़ को पुष्य नक्षत्र का प्रतीक माना जाता है इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग अपने घर के खाली हिस्से में पीपल का वृक्ष लगाकर उसकी पूजा करते हैं जिससे उनके जीवन में हमेशा सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

- इस दिन पूजा या उपवास करने से जीवन के हर एक क्षेत्र में सफलता की प्राप्ति होती है। सर्वप्रथम अपने घरों में सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय मां लक्ष्मी के सामने घी से दीपक जलाएं। किसी नए मंत्र की जाप की शुरुआत करें।

- इस दिन दाल, खिचड़ी, चावल, बेसन, कड़ी, बूंदी की लड्डू आदि का सेवन भी किया जाता है और यथाशक्ति दान भी कर सकते हैं।

- इस दिन बहीखातों की पूजा करना और लेखा-जोखा कार्य भी शुरू कर सकते हैं। इस दिन से नए कार्यों की शुरुआत करें, जैसे दुकान खोलना, व्यापार करना या अन्य कोई कार्य। कुछ नया सीखना, लेखक हैं तो कुछ नया लिखना आदि।

- इसके अलावा पुष्य नक्षत्र में दिव्य औषधियों को लाकर उनकी सिद्धि की जाती है। इस दिन कुंडली में विद्यमान दूषित सूर्य के दुष्प्रभाव को घटाया जा सकता है।

- इस दिन धन का निवेश लंबी अवधि के लिए करने पर भविष्य में उसका अच्छा फल प्राप्त होता है।

- इस शुभदायी दिन पर महालक्ष्मी की साधना करने, पीपल या शमी के पेड़ की पूजा करने से उसका विशेष व मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

इसे भी पढ़ें: 

जानें इस बार कब है संतान की दीर्घायु के लिए किया जाने वाला व्रत अहोई अष्टमी, महत्व, मुहूर्त व पूजा विधि

- गुरु-पुष्य या शनि-पुष्य योग के समय छोटे बालकों के उपनयन संस्कार और उसके बाद सबसे पहली बार विद्याभ्यास के लिए गुरुकुल में भेजा जाता है।

Advertisement
Back to Top