निर्जला एकादशी पर पूजा के बाद सुनें ये व्रत कथा, जानें आखिर इस दिन क्या करें, क्या न करें

nirjala ekadashi story do's and dont's - Sakshi Samachar

निर्जला एकादशी पर पूजा के बाद सुनें ये व्रत कथा 

निर्जला एकादशी पर करें ये काम, न करें ये गलतियां 

एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। हर महीने में दो बार एकादशी तिथि पड़ती है, एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। विष्णु भगवान को एकादशी तिथि प्रिय होती है। माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंगलवार, 2 जून यानी कल निर्जला एकादशी है। 

निर्जला एकादशी को पूजा के बाद कही-सुनी जाती है ये व्रत कथा। जो इस प्रकार है ....

भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूं कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूं, दान भी दे सकता हूं परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।
इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एकादशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूं कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूं, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है। अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए।

व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और कांप कर कहने लगे कि अब क्या करूं? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हां वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूं। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।

यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।

यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।
व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौ दान करना चाहिए।
इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूं, दूसरे दिन भोजन करूंगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूंगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएं। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढंक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए

जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।

हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौ दान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी नाम से भी जाना जाता है।

निर्जला एकादशी पर क्या करें और क्या न करें ....

-एकादशी का दिन भगवान विष्णु की पूजा का होता है। इस दिन विष्णु भगवान की पूजा करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विष्णु भगवान की पूजा के साथ मां लक्ष्मी की पूजा का भी विधान है। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का इस्तेमाल करना न भूलें।

-अगर संभव हो तो निर्जला एकादशी का व्रत करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत करने का फल साल की सभी एकादशी के व्रत करने के समान मिलता है। इस बात का ध्यान रखें कि इस व्रत में जल का सेवन नहीं किया जाता है। निर्जला एकादशी के दिन सुबह स्नान करने के बाद घर के मंदिर में दिप प्रज्वलित करें और विष्णु भगवान का ध्यान करें।

-इस दिन भगवान विष्णु को भोग अवश्य लगाएं। भगवान को सात्विक आहार का भोग लगाएं। अगर संभव हो तो भोग में कुछ मीठा भी शामिल करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के भोग में तुलसी भी शामिल करें। विष्णु भगवान तुलसी के बिना भोजन ग्रहण नहीं करते हैं। 

इस दिन क्या न करें 

-एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन व्रत नहीं रखने वालों को भी चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।

-एकादशी का दिन भगवान विष्णु की पूजा का होता है। इस दिन मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। निर्जला एकादशी के दिन सात्विक भोजन करें।

- एकादशी के दिन शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन भजन-कीर्तन करने चाहिए।

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