श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2020 : जानें क्यों खास होती है मथुरा की जन्माष्टमी, देवता भी होते हैं शामिल

Krishna Janmashtami 2020 Celebration In Mathura - Sakshi Samachar

कोरोना काल में इस तरह मनाई जाएगी जन्माष्टमी

यहां अलग-अलग दिन मनाया जाता है अष्टमी

भादो महीने के कृष्णपक्ष की अष्टमी को जन्माष्टमी का पावन पर्व मनाया जाता है। इस बार अष्टमी 11 और 12 अगस्त मनायी जाएगी। जन्माष्टमी का पर्व इस बार खास भी है, क्योंकि 27 साल बाद एक बेहद अद्भुत संयोग बन रहा है। लेकिन हम आप को मथुरा की जन्माष्टमी के बारे में  बताने जा रहे हैं। मथुरा कृष्ण की जन्मभूमि है और यहां जन्माष्टमी का अंदाज ही निराला होता है। तीन लोक से न्यारी मथुरा में जन्माष्टमी अनूठे तरीके से मनाई जाती है और सबसे बड़ी बात यह है कि जिस भाव से यहां जन्माष्टमी मनाई जाती है उसके दर्शन अन्यत्र दुर्लभ हैं।

यहां अलग-अलग दिन मनाया जाता है अष्टमी

मथुरा और गोकुल में अलग-अलग दिन कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है। प्रचलित मान्यता के मुताबिक भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को कृष्ण जन्मोपलक्ष्य में जन्माष्टमी पर्व मनाया जाता है। विद्वानों के अनुसार वैष्णवों द्वारा भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि में सूर्यादय होने के अनुसार ही कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। वहीं नन्दगांव में श्रावण मास की पूर्णमासी के दिन से आठवें दिन ही जन्माष्टमी मनाने की प्रथा चली आ रही है। हालांकि इस परंपरा के पीछे क्या कारण है और दोनों जगहों में समय का अंतर क्यों है इस पर कोई साफ मत पता नहीं चल पाया है। 

कोरोना काल में इस तरह मनाई जाएगी जन्माष्टमी

इस तरह इन तिथियों के अनुसार मथुरा में 12 और गोकुल में 11 अगस्त को कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। इस बार कोरोना काल में जन्माष्टमी पड़ रही है। जिसकी वजह से इस बार जन्माष्टमी पर धूमधाम पिछले वर्षों के मुकाबले कम नजर आएगी। कोरोना संकट की वजह से इस बार नंद गांव में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही 'खुशी के लड्डू' बांटे जाने की परम्परा भी नहीं निभाई जाएगी। मथुरा के मंदिरों में भी प्रसाद नहीं बांटा जाएगा। मंदिरों में सोशल डिस्टैंसिंग का कड़ाई का पालन किया जाएगा। 

मथुरा में मंदिरों का कृष्ण से नाता 

कहा जाता है कि इस नगरी में स्थित हर मंदिर का भगवान श्रीकृष्ण से नाता भी है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागरा में हुआ था। जिस जगह कन्हैया का जन्म हुआ था उस स्थान को कृष्ण जन्मभूमि कहा जाता है। कृष्ण जन्मभूमि की जन्माष्टमी विश्व प्रसिद्ध है। यह मंदिर मथुरा के बीचो-बीच है। 

मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में जन्माष्टमी 

द्वारकाधीश मंदिर मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर यहां बहुत भीड़ होती है। माना जाता है कि जन्मभूमि के बाद द्वारकाधीश के मंदिर में सबसे ज्यादा पूजा होती है। इस मंदिर का निर्माण 1814 में हुआ था।

निधिवन में  शाम होते ही मंदिरों में विशेष तैयारियां 

निधिवन के बारे में कहा जाता है कि कान्हा आज भी यहां गोपियों से रास रचाने आते हैं। यहां पर शाम होते ही मंदिरों में विशेष तैयारियां की जाती है। बताया जाता है कि शाम होते ही सभी घरों की खिड़की दरवाजे बंद हो जाते हैं और पक्षी और जानवर भी निधिवन से चले जाते हैं।

बांके बिहारी मंदिर की विशेषता 

बांके बिहारी मंदिर बांके बिहारी मंदिर वृंदावन में स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर के बिना वृंदावन की यात्रा पूरी नहीं होती है। यहां कान्हा के होने वाले अलग तरह के श्रृंगार को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु यहां आते हैं। जन्माष्टमी के मौके पर यहां पर एक सप्ताह पहले से तैयारी शुरू हो जाती है।

राधा रमण मंदिर जन्माष्टमी के मौके पर आप राधा रमण मंदिर भी जा सकते हैं। राधा रमण मंदिर काफी प्राचीन और भव्य मंदिर है। इस मंदिर की स्थापना 1542 में हुई थी। यहां पर भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी शालिग्रम के रूप में स्थापित हैं। 

चीरघाट कदम के पेड़ के लिए मशहूर है। कहा जाता है कि यहां मौजूद कदम के पेड़ पर भगवान कृष्ण ने राक्षस के वध के बाद विश्राम किया था। बताया तो ये भी जाता है कि बाल-गोपाल ने स्नान कर रही गोपियों की कपड़ों के लेकर इसी पेड़ पर चढ़ गए थे।

कालिया दमन घाट

जन्माष्टमी के मौके पर भगवान श्रीकृष्ण को जानना है तो आप कालिया दमन घाट जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी घाट पर भगवान कृष्ण कालिया नाग का दमन कर लौटे थे। वहीं, यमुना तट पर स्थित श्रृंगार घाट राधा और कृष्ण को समर्पित है। कहा जाता है कि इसी घाट पर कृष्ण जी ने राधा का श्रृंगर किया था।

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