जानें आखिर क्यों गुरु पूर्णिमा को कहते हैं व्यास पूर्णिमा, यह आषाढ़ में ही क्यों मनाई जाती है

Know why Guru Purnima is called Vyas Purnima why it is celebrated in month of Aashadh - Sakshi Samachar

5 जुलाई रविवार को है गुुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं 

आषाढ़ में ही क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा 

हमारे जीवन में गुरु का बड़ा योगदान होता है और वैसे तो हमें अपने जीवन में हर दिन और हर उपलब्धि पर उन्हें याद करना चाहिए, उनके गुणगान करना चाहिए पर आषाढ़ मास की पूर्णिमा गुरु को ही समर्पित है और इसे गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है।  इस दिन गुरु की पूजा की जाती है, उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है, कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इस बार गुरु पूर्णिमा का ये पावन पर्व 5 जुलाई, रविवार को है। 

प्राचीनकाल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होते थे।

गुरु पूर्णिमा को क्यों कहते हैं व्यास पूर्णिमा 

देखा जाए तो हमारे भारतवर्ष में कई विद्वान हुए हैं परन्तु व्यास ऋषि, जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, की इस दिन विशेष पूजा होती है। हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं। अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति को ताजा रखने के लिए हमें अपने-अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए।

कहते हैं कि व्यासजी ने ही वेदों का विस्तार किया और कृष्ण द्वैपायन से वेदव्यास कहलाये। 6 शास्त्रों एवं 18 पुराणों के रचयिता वेदव्यास जी ने गुरु के सम्मान में विशेष पर्व मनाने के लिये आषाढ़ मास की पूर्णिमा को चुना। इसी कारण इस गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि इसी दिन व्यास जी ने शिष्यों एवं मुनियों को सबसे पहले श्री भागवत् पुराण का ज्ञान दिया था। इसीलिए इस दिन को ‘व्यास पूर्णिमा’ कहा जाता है।

इसी दिन (आषाढ़ मास की पूर्णिमा) वेदव्यास के अनेक शिष्यों में से पांच शिष्यों ने गुरु पूजा की परम्परा शुरू की थी। इसके लिए पुष्पमंडप में उच्चासन पर अपने गुरु व्यास जी को बिठाकर पुष्प मालाएं अर्पित कीं थी और तत्पश्चात् उनकी आरती की थी।

व्यास जी ने सर्वप्रथम सूत जी को अपना शिष्य मानकर उन्हें ज्ञान प्रदान किया। व्यास जी के बाद ऋषियों एवं मुनियों ने श्री शुकदेव जी को उनका स्थान प्रदान किया। जब कभी श्री भागवत् पुराण का पाठ किया जाता है, तो सर्वप्रथम श्री शुकदेव जी का स्मरण किया जाता है। 

इसी के बाद से सदियों से इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है।

आषाढ़ मास में ही क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा 

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को चन्द्रमा देव गुरु बृहस्पति की धनु राशि में होता है और शुक्राचार्य के नक्षत्र पू. आषाढ़ में होता है अर्थात् मन दोनों ही गुरुओं से संबंध कर पूर्ण ज्ञान का अभिलाषी बन जाता है। चन्द्रमा की रोशनी ही वनस्पतियों में रस उत्पन्न करती है। इसी चन्द्रमा से मानव में ज्ञान रस की वृद्धि होती है और यह मन ही है जो मनुष्य को ज्ञान-विज्ञान दोनों में प्रवीण कर सकता है। मन की शांति व समय के लिए चन्द्रमा की उपासना करना जरूरी है। मन शान्त हो, तो ही जीवन यात्रा सफल होती है।

आषाढ़ मास में वर्षा ऋतु के बादल कभी चांद की ओर हों, तो उसकी रोशनी भी ढक सकते हैं और जब अंधकार हो जायेगा तब गुरु पूर्णिमा का प्रकाश बेहद शीतलता देगा। उसी प्रकार सच्चे शिष्य कितने भी अंधकार में हों, गुरुदेव उन्हें ढूंढ ही लेते हैं। चन्द्रमा केवल निमित्त मात्र है। वह केवल दर्पण है जो आत्मसाक्षात्कार कराता है।

अध्यात्म में सूर्य रूपी ज्ञान के प्रकाश से सीधा साक्षात्कार न करके गुरु रूपी चन्द्रमा के माध्यम से लाभ उठाने का नियम है। सूर्य परम तेजस्वी है और चन्द्रमा परम शीतल। चन्द्रमा माध्यम है सूर्य की रोशनी का। उसी प्रकार गुरु भी माध्यम है परमात्मा के उस दिव्य विराट तेज का। प्रेम/भक्ति योग में भी प्रभु से मिलन की अपेक्षा गुरु का सान्निध्य शिष्यत्व के सहज ही प्रभु के दर्शनों में सहायक है, मुक्ति दाता है।

गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर कोई और तिथि हो ही नहीं सकती, क्योंकि गुरु और पूर्णत्व दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। जिस प्रकार चंद्रमा पूर्णिमा की रात सर्वकलाओं से परिपूर्ण हो जाता है और वह अपनी शीतल रश्मियां समभाव से सभी को वितरित करता है उसी प्रकार सम्पूर्ण ज्ञान से ओत-प्रोत गुरु अपने सभी शिष्यों को अपने ज्ञान प्रकाश से आप्लावित करता है। पूर्णिमा गुरु है। आषाढ़ शिष्य है। बादलों का घनघोर अंधकार। आषाढ़ का मौसम जन्म-जन्मान्तर के लिए कर्मों की परत दर परत है। इसमें गुरु चांद की तरह चमकता है और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।

तमसो मा ज्योर्तिगमय
मृर्त्योमा अमृतं गमय

चांद जब पूरा हो जाता है तो उसमें शीतलता आ जाती है। इस शीतलता के कारण ही चांद को गुरु के लिए चुना गया होगा। चांद में मां जैसी शीतलता एवं वात्सल्य है। इसलिए हमारे ऋषियों व महापुरुषों ने चांद की शीतलता को ध्यान में रखकर आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु को समर्पित किया है। अत: शिष्य, गृहस्थ, संन्यासी सभी गुरु पूर्णिमा को गुरु पूजन कर आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। गुरु महिमा को इस स्तुति से वंदित किया गया है-

गुरुर्ब्रह्म' गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:
गुरु: साक्षात् परमब्रह्म' तस्मै श्री गुरवे नम:।।

गुरु स्मरण एवं गुरु के कार्य से ही शिष्यत्व की पात्रता आती है। अत: इस गुरु पूर्णिमा से हमें कुछ विशेष करने का संकल्प लेना चाहिए। तभी हमारे सद्गुरु हमारे जीवन में अवतरित होंगे और जीवन धन्य बन सकेगा।

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