जानें आखिर क्या होता है अलविदा जुमा और रमजान में क्या है इसकी अहमियत

Know what is goodbye Zuma and what is the significance of Ramadan - Sakshi Samachar

रमज़ान का पाक महीना अब बस खत्म होने को है 

आज अलविदा जुमा है जो बेहद खास होता है 

रमज़ान का पाक महीना अब बस अलविदा कहने को है और दो-चार दिनों में ईद भी आने वाली है। आज रमज़ान महीने का आखिरी जुमा यानी अलविदा जुमा है। रोज़ेदारों के लिए यह दिन खास अहिमत रखता है और उन्हें इस दिन का बेसब्री से इंतज़ार भी होता है। 

हर साल आखिरी जुमे को धूमधाम से मनाया जाता है, अलविदा जुमे की नमाज़ के लिए मस्जिदों में पहले से खास तैयारियां होती हैं। हालांकि, इस साल कोरोना वायरस और लॉकडाउन की वजह से अलविदा जुमा लोग अपने-अपने घरों में ही मनाएंगे और कहीं कोई धूमधाम नहीं होगी पर इससे इसकी अहमियत कम नहीं होती और लोग घरों में इसे मनाएंगे और दुआ करेंगे। 

ऐसा माना जाता है कि अलविदा जुमे की नमाज़ में जो भी साफ दिल से दुआ मांगी जाती है, वह ज़रूर पूरी होती है। अब ईद आने में महज़ एक-दो दिन रह गए हैं। अगर चांद शनिवार यानी 23 को दिखा भारत में 24 को ईद मनाई जाएगी, नहीं तो 25 को देशभर में ईद का ऐलान होगा। 

क्या है अलविदा जुमा

अलविदा जुमा का मतलब है किसी चीज़ का रुखसत होना, जैसे यहां इसका मतलब रमज़ान के ख़त्म होने से है। रमज़ान के महीने में आखिरी शुक्रवार को ही आखिरी जुमा कहा जाता है। यही वजह है कि इस मौके पर आखिरी जुमे के दिन अल्लाह से खास दुआ मांगी जाती है कि आने वाला रमज़ान हम सबको नसीब हो। अलविदा जुमा मनाने के बाद लोग ईद की तैयारियों में जुट जाते हैं। 

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क्यों है अलविदा जुमा खास?

अल्लाह ने आखिरी जुमे को सबसे खास बताया है। हदीस शरीफ में इस जुमे तो सय्यदुल अय्याम कहा गया है। माहे रमज़ान से प्यार करने वाले कुछ लोग अलविदा जुमे के दिन उदास हो जाते हैं। इस जुमे की रात ऐसी होती है, जिसे तलाशने पर हज़ारों महीने की इबादत का फायदा एक साथ मिलता है। यूं तो जुमे की नमाज़ पूरे साल खास होती है, लेकिन रमज़ान के दौरान ये दिन और भी खास बन जाता है।

  
रमज़ान का महत्व

रमज़ान उल मुबारक महीना हमसे अब रुखसत ले रहा है। रहमतों, बरकतों वाला यह महीना हमें आपस में प्यार, मोहब्बत और अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चलना सिखाता है। अल्लाह अपने हर बंदों पर रहम फरमाता है इसलिए रमज़ान के आखिरी अशरे में अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगनी चाहिए।

हदीस-ए-पाक के मुताबिक रमज़ान-उल-मुबारक के मुकद्दस महीने में जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और जहन्नुम के दरवाज़ों को बंद कर दिया जाता है। यह इंसानों के लिए बड़ी सआदत की बात है। माहे रमज़ान में भी शैतान गुनाहों से बाज़ नहीं रह पाते इसलिए इस दौरान उनको कैद कर दिया जाता है।

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