कौन थे बंदा सिंह बहादुर, सिखों के दसवें गुरु से क्या था उनका नाता? जानिए पूरी कहानी...

Know the story of Banda Singh Bahadur - Sakshi Samachar

लक्ष्मण देव का जन्म जम्मू कश्मीर में हुआ

मुग़ल अधिकारियों को पराजित करने में सफल

मुग़ल वंश ने भारत पर क़ब्ज़ा करने की शुरुआत 1526 में

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अठारहवीं शताब्दी के शुरु में ही हुई दो लड़ाइयां अपना ऐतिहासिक महत्व रखती हैं। इन दोनों लड़ाइयों ने पश्चिमोत्तर भारत में विदेशी मुग़ल वंश के कफ़न में कील का काम किया। ये लड़ाइयां थीं पंजाब में सरहिन्द और गुरदास नंगल की लड़ाई। इन दोनों लड़ाइयों का नेतृत्व बंदा सिंह बहादुर ने किया था।

मुग़ल वंश ने भारत पर क़ब्ज़ा करने की शुरुआत 1526 में की

बंदा सिंह बहादुर को इस संग्राम के लिए गुरु गोविन्द सिंह ने तैयार किया था। मध्य एशिया से आए मुग़ल वंश ने भारत पर क़ब्ज़ा करने की शुरुआत 1526 में की थी। जिन दिनों बाबर ने हिन्दुस्तान पर हमला किया था, उन्हीं दिनों भारत में एक ऐतिहासिक गुरु परम्परा प्रारम्भ हुई थी, जिसके वानी गुरु नानक देव थे। उसी गुरु परम्परा के दशम गुरु श्री गोविन्द सिंह हुए।

लक्ष्मण देव का जन्म जम्मू कश्मीर में हुआ

गुरु गोविन्द सिंह जी का जन्म 1666 में हुआ था और लक्ष्मण देव (जो कालान्तर में बंदा सिंह बहादुर के नाम से विख्यात हुए) का जन्म 1670 (मृत्यु 9 जून 1716) में हुआ था। गोविन्द राय का जन्म उस पाटलिपुत्र में हुआ था, जहां से शताब्दियों पहले सम्राट अशोक की सेनाएं निकलीं थीं और लक्ष्मण देव का जन्म उस जम्मू कश्मीर में हुआ था, जहां से सम्राट ललितादित्य ने कभी सांस्कृतिक भारत का स्वप्न देखा था।

भविष्य की रणनीति का संकेत

लक्ष्मण देव यानी बंदा सिंह बहादुर का जन्म राजौरी में हुआ था। लक्ष्मण देव और गोविन्द सिंह जी का आपस में कोई पारिवारिक सम्बंध नहीं था, लेकिन कालान्तर में दोनों का ऐसा सम्बंध विकसित हुआ, जिसने भारत का इतिहास बदल दिया।

साल 1469 में भारत भूमि पर गुरु नानक देव का जन्म हुआ था। 1526 में जब बाबर अपनी सेना लेकर अफ़ग़ानिस्तान को पार करता हुआ पंजाब की ओर बढ़ा तो गुरु नानक देव जी ने इसके दूरगामी दुष्परिणामों को देख लिया था और इसे हिन्दुस्तान पर हमला घोषित कर भविष्य की रणनीति का संकेत भी दे दिया था।

उज्बेक वंश की चौथी पीढ़ी

सत्रहवीं शताब्दी के शुरू में ही बाबर के उज्बेक वंश की चौथी पीढ़ी ने भारत के कुछ हिस्सों की सत्ता संभाली तो उधर गुरु नानक देव जी द्वारा स्थापित गुरु परम्परा के पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव जी गद्दीनशीन हुए। अर्जुन देव जी के नेतृत्व में भारत नई अंगड़ाई ले रहा था। जहांगीर ने गद्दी पर बैठते ही अपना पहला प्रहार किया। गुरु अर्जुन देव जी को 1606 में मुग़ल वंश ने शहीद कर दिया। अब विदेशी मुग़ल वंश को भारत से बाहर निकालने का एक नया मोर्चा पंजाब में शुरू हो गया था। अभी तक यह लड़ाई राजस्थान के रेगिस्तानों में ही लड़ी जा रही थी।

मध्यकाल तक मुग़लों का विरोध

जैसे जैसे मुग़ल वंश की सेनाएं भारत में आगे बढ़ती जा रहीं थीं, वैसे वैसे उनके ख़िलाफ़ संघर्ष भी फैलता जा रहा था। सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक आते आते मुग़ल वंश की कमान औरंगज़ेब (1658-1707) ने संभाल ली। लेकिन इस शताब्दी के मध्यकाल तक मुग़लों के विरोध के भी अनेक मोर्चे खुल चुके थे।

पंजाब में हिन्द की चादर गुरु तेगबहादुर ने इस का विरोध किया तो औरंगज़ेब ने उन्हें दिल्ली में शहीद करवा दिया। उधर असम को औरंगज़ेब की सेनाएं घेरे हुए थीं। भारत का उत्तर पूर्व ख़तरे में था। यहां मुग़ल वंश की ताक़त को असम सेनापति लचित बडफूकन ने ब्रह्मपुत्र की लहरों पर सरायघाट में 1671 में औरंगज़ेब की सेना को शिकस्त दी।

मुग़ल वंश को गहरी शिकस्त

उधर दक्षिण में शिवाजी महाराज (1630-1680) ने मुग़ल वंश को गहरी शिकस्त दी और 1674 में मुग़ल वंश की विजय पताका का उपहास करते हुए अपना राज्याभिषेक किया। मुग़ल सत्ता का व्यावहारिक अंत महाराष्ट्र में हो गया था। औरंगज़ेब ने किसी तरह पंजाब में क़िला बचाए रखने का प्रयास किया।

उसने हिन्द की चादर गुरु तेग़ बहादुर जी को 1675 में शहीद करवा दिया। हिन्द की चादर के सुपुत्र श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने 1699 में शिवालक की उपत्यकताओं में एक राष्ट्रीय सम्मेलन कर ख़ालसा पंथ की स्थापना कर दी। यही ख़ालसा पंथ कालान्तर में मुग़ल वंश का काल सिद्ध हुआ।

पंजाब में मुग़ल वंश की नींव

गुरु गोविन्द सिंह जी ने पंजाब में मुग़ल वंश की नींव को हिला दिया था। बाबर से शुरू हुआ मुग़ल वंश औरंगज़ेब तक आते आते लड़खड़ाने लगा था। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं में उसे घेर लिया गया था। अंतिम प्रहार गुरु गोविन्द सिंह जी ने किया। मुग़ल वंश का पतन शायद कहीं पहले हो जाता, लेकिन घर के जयचन्दों ने लड़ाई को लम्बी खींच दिया। इन संघर्षों का ही परिणाम था कि औरंगज़ेब की मौत के बाद लाल क़िले की सत्ता कमज़ोर होती गई।

औरंगज़ेब की मौत के बाद गुरु गोविन्द सिंह जी भी उसी ओर प्रस्थान कर गए थे जहाँ शिवाजी ने मुग़ल सत्ता को परास्त कर दिया था। आगे की लड़ाई जारी रखने के लिए उन्हें किसी योग्य पात्र की तलाश थी। बंदा बहादुर गुरु जी उसी तलाश का उत्तर था।

मुग़लों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ा

बन्दा सिंह बहादुर बैरागी एक सिख सेनानायक थे। उन्हें बन्दा बहादुर, लक्ष्मन देव और माधो दास भी कहते हैं। वे पहले ऐसे सिख हुए, जिन्होंने मुग़लों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ा, छोटे साहबज़ादों की शहादत का बदला लिया और गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा संकल्पित प्रभुसत्तासम्पन्न लोक राज्य की राजधानी लोहगढ़ में ख़ालसा राज की नींव रखी। यही नहीं, उन्होंने गुरु नानक देव और गुरु गोबिन्द सिंह के नाम से सिक्का और मोहरें जारी करके, निम्न वर्ग के लोगों को उच्च पद दिलाया और हल वाहक किसान-मज़दूरों को ज़मीन का मालिक बनाया।

अभी 15 वर्ष की उम्र के ही थे कि...

बाबा बन्दा सिंह बहादुर का जन्म कश्मीर स्थित पुंछ जिले के तहसील राजौरी क्षेत्र में विक्रम संवत् 1727, कार्तिक शुक्ल 13 (1670 ई.) को हुआ था। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मण देव था। लक्ष्मण देव के भाग्य में विद्या नहीं थी, लेकिन छोटी सी उम्र में पहाड़ी जवानों की भांति कुश्ती और शिकार आदि का बहुत शौक़ था। वह अभी 15 वर्ष की उम्र के ही थे कि एक गर्भवती हिरणी के उनके हाथों हुए शिकार ने उन्हें अत्यंत शोक में ङाल दिया।

मन में गहरा प्रभाव पड़ा

इस घटना का उनके मन में गहरा प्रभाव पड़ा। वह अपना घर-बार छोड़कर बैरागी बन गए। वह जानकी दास नाम के एक बैरागी के शिष्य हो गए और उनका नाम 'माधोदास बैरागी' पड़ा। उसके बाद उन्होंने एक अन्य बाबा रामदास बैरागी का शिष्यत्व ग्रहण किया और कुछ समय तक पंचवटी (नासिक) में रहे। वहां एक औघड़नाथ से योग की शिक्षा प्राप्त कर वह पूर्व की ओर दक्षिण के नान्देड़ क्षेत्र को चले गए, जहां गोदावरी के तट पर उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की।

गुरु गोबिन्द सिंह से प्रेरणा

3 सितम्बर 1708 ई. को नान्देड़ में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिन्द सिंह ने इस आश्रम में, और उन्हें सिख बनाकर उसका नाम बन्दा सिंह बहादुर रख दिया। पंजाब और शेष अन्य राज्यों के हिन्दुओं के प्रति दारुण यातना झेल रहे तथा गुरु गोबिन्द सिंह के सात और नौ वर्ष के उन महान बच्चों की सरहिंद के नवाब वज़ीर ख़ान द्वारा निर्मम हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए रवाना किया।

मुग़ल अधिकारियों को पराजित करने में सफल

गुरु गोबिन्द सिंह के आदेश से ही वे पंजाब आए और सिखों के सहयोग से मुग़ल अधिकारियों को पराजित करने में सफल हुए। मई, 1710 में उन्होंने सरहिंद को जीत लिया और सतलुज नदी के दक्षिण में सिख राज्य की स्थापना की। उन्होंने ख़ालसा के नाम से शासन भी किया और गुरुओं के नाम के सिक्के चलवाये।

राज्य-स्थापना हेतु आत्मबलिदान

बन्दा सिंह ने अपने राज्य के एक बड़े भाग पर फिर से अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत किया। 1715 ई. के प्रारम्भ में बादशाह फ़र्रुख़सियर की शाही फ़ौज ने अब्दुल समद ख़ां के नेतृत्व में उन्हें गुरुदासपुर ज़िले के धारीवाल क्षेत्र के निकट गुरुदास नंगल गाँव में कई मास तक घेरे रखा।

खाद्य सामग्री के अभाव के कारण उन्होंने 7 दिसम्बर को आत्मसमर्पण कर दिया। फ़रवरी 1716 को 794 सिखों के साथ वह दिल्ली लाए गए, जहां 5 मार्च से 12 मार्च तक सात दिनों में 100 की संख्या में सिखों की बलि दी जाती रही। 16 जून को बादशाह फ़ार्रुख़शियार के आदेश से बन्दा सिंह तथा उनके मुख्य सैन्य-अधिकारियों के शरीर काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए।

सुशासन

मरने से पूर्व बन्दा सिंह बहादुर जी ने अति प्राचीन ज़मींदारी प्रथा का अन्त कर दिया था तथा कृषकों को बड़े-बड़े जागीरदारों और ज़मींदारों की दासता से मुक्त कर दिया था। वह साम्प्रदायिकता की संकीर्ण भावनाओं से परे थे। मुसलमानों को राज्य में पूर्ण धार्मिक स्वातन्त्र्य दिया गया था। पांच हज़ार मुसलमान भी उनकी सेना में थे। बन्दा सिंह ने पूरे राज्य में यह घोषणा कर दी थी कि वह किसी प्रकार से भी मुसलमानों को क्षति नहीं पहुंचाएंगे और वे सिख सेना में नमाज़ पढ़ने और खुतवा करवाने को लेकर स्वतंत्र होंगे।

युद्ध स्मारक

बाबा बन्दा सिंह के 300वें शहीदी दिवस के अवसर पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल
सिख सैनिकों की वीरता और नायकत्व को याद रखने के उद्देश्य से एक युद्ध स्मारक बनाया गया है। यह उसी स्थान पर बना है, जहां छप्पर चीरी का युद्ध हुआ था। इस परियोजना का आरम्भ 30 नवम्बर 2011 को पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने किया था।

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