अधिक मास में है दान का बड़ा महत्व, किए गए दान का मिलता है दस गुना फल

importance of donation in Adhik maas  - Sakshi Samachar

अधिक मास में दान का महत्व 

इस मास में दान का मिलता है दस गुना फल 

अधिक मास चल रहा है जिसका हिंदू धर्म में बड़ा महत्व है क्योंकि हर तीन साल में एक बार इस अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है, इसे अधिक मास, मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित हुए। अधिकमास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार न हुए। ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया तो भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया। अधिकमास के अधिपति श्रीहरि भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही नाम है इसीलिए अधिकमास को पुरुषोत्तम मास नाम से पुकारा जाता है।

माना जाता है कि अधिकमास में किए गए धार्मिक कार्यों का 10 गुना अधिक फल मिलता है। इस माह यज्ञ-हवन का विशेष महत्व है। श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन इस माह विशेष रूप से फलदायी है।

अधिक मास में किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इस माह दान का विशेष महत्व है। अधिक मास में दीपदान करना एवं धार्मिक पुस्तकों का दान करना शुभ माना जाता है। धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि किस दान का कैसा फल मिलता है। वहीं, दान करने का मनोवैज्ञानिक महत्व भी है। इसलिए अधिक मास में भी दान देने की परंपरा है।

दान का महत्व

स्कंद पुराण के प्रभासखंड में महादान का महत्व बताया गया है। इनमें गाय, सोना, चांदी, रत्न, विद्या, तिल, कन्या, हाथी, घोड़ा, शय्या, वस्त्र, भूमि, अन्न, दूध, छत्र और जरूरी चीजों के साथ घर का दान करना चाहिए। इनके अलावा अग्नि पुराण का कहना है कि अधिक मास में सोना, अश्व (घोड़ा), तिल, हाथी, रथ, भूमि, घर, कन्या और कपिला गाय का दान करना चाहिए। गरुड़ पुराण कहता है कि दान न देने से प्राणी दरिद्र होता है और दरिद्र होने के बाद पाप करता है। श्रीमद्भागवत पुराण का कहना है कि जीवन के लिए जरूरी संपत्ति, चीजें और धन रखनी चाहिए। अन्य का दान कर देना चाहिए। महाभारत में बताया गया है कि जो धन प्राप्त होता है उसका भोग या संग्रह करने से तो दान देना अच्छा है।

दान से पड़ता है सकारात्मक असर

दान करने के कई मनोवैज्ञानिक लाभ भी मिलते हैं। हॉवर्ड बिजनेस स्कूल के मनोविज्ञान की प्रोफेसर मिशेल नॉर्टन और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ सोंजा ल्युबोमिरस्कि ने एक जर्नल में लिखा है कि दान करने में जो खुशी मिलती है। वो खुद पर खर्चा करने की खुशी से ज्यादा होती है। इसके अलावा टेक्सास यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक आर्ट मार्कमेन का भी कहना है कि दान करने पर मिलने वाली खुशी का शरीर पर सकारात्मक असर पड़ता है। 
दान करने से मन और विचारों में खुलापन आता है। दान से मोह की शक्ति कमजोर पड़ती है। हर तरह के लगाव और भाव को छोड़ने की शुरुआत दान और क्षमा से ही होती है। दान करने से इंसान का अहम और मोह खत्म होता है। दान करने से मन की कई ग्रंथियां खुलती है और अपार संतुष्टि मिलती है। दान करने से कई तरह के दोष भी खत्म होते हैं।

दान का फल

धर्मग्रंथों के मुताबिक कुछ दान का फल इसी जन्म में मिल जाता है तो कुछ दान का फल अगले जन्म में मिलता है। जिसके प्रभाव से जीवन में अचानक बड़े बदलाव हो जाते हैं। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जल दान तृप्ति मिलती है। अन्न दान से अक्षय सुख, तिल के दान से संतान सुख, भूमि दान से मनचाही चीज मिल सकती है। सोने का दान करने से लंबी उम्र मिलती है। घर का दान करने से उत्तम भवन और चांदी का दान देने से अच्छा रूप मिलता है। इसके साथ ही ये भी कहा गया है कि अपनी स्थिति को देखते हुए दान देना चाहिए।

अधिक मास में करें इन चीजों का दान 

अधिक मास भगवान विष्णु की साधना-आराधना का मास है। इस मास में भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जप एवं दान आदि करने से सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। अधिक मास या फिर कहें मलमास में दीपदान का अत्यधिक महत्व है। इस पावन पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु के हाथों में रहने वाले शंख के पूजन और दीपदान से न सिर्फ भगवान विष्णु की ​बल्कि उनके साथ माता लक्ष्मी की भी कृपा प्राप्त होती है और इन दोनों देवी-देवता के आशीर्वाद से जातक का घर धन-धान्य से हमेशा भरा रहता है।

इस दान का मिलेगा 10 गुना फल

सनातन परंपरा में दान का अत्यधिक महत्व है। यही कारण है कि हम अक्सर व्रत, पर्व, मास एवं ऋतुओं आदि के आधार पर अक्सर अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करते रहते हैं। 12 मास के बाद जो 13वां मास यानी मलमास या पुरुषोत्तम मास कहलाता है, उसके अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं। इस मास में श्री हरि की कृपा पाने के लिए साधक को उनकी पूजा में प्रसाद स्वरूप पुआ बनाकर चढ़ाना चाहिए और लोगों में इसे प्रसाद के रूप में दान देना चाहिए।

मनोकामना विशेष की पूर्ति के लिए पुरुषोत्तम मास में गुड़, घी, चावल आदि को आटे के द्वारा बनाए जाने वाले पुआ को किसी ब्राह्मण को दान करें। इस दान से न सिर्फ आपके कष्ट दूर होंगे बल्कि आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी और जिंदगी में श्री हरि की कृपा से मिठास ही मिठास बनी रहेगी। जीवन में सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होगी।

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