किस तरह की मंदी से गुजर रहा है भारत, आज GDP के आंकड़े देंगे जवाब

Government Release Quarter GDP Figures - Sakshi Samachar

सरकार आज जारी करेगी जीडीपी का आंकड़ा

पिछली तिमाही में करीब 24 फीसदी की हुई थी भारी गिरावट

जीडीपी के 5 से 10 फीसदी तक निगेटिव रहने के आसार

नई दिल्ली : कोरोना महामारी (Coronavirus) के इस दौर में सरकार आज इस वित्त वर्ष 2020-21 की तीसरी तिमाही का आंकड़ा जारी करेगी। आर्थिक विश्लेषण से जुड़ी ज्यादातर एजेंसियों ने इस बार जीडीपी (GDP) में 5 से 10 फीसदी तक की गिरावट का अनुमान लगाया है। अगर ऐसा होता है तो देश मंदी के दौर से गुजर रहा है, यह बात मान लिया जाएगा।

एक तरफ देखा जाए कि अगर जीडीपी में 5 से 10 फीसदी की गिरावट होती है तब भी यह थोड़ी राहत की बात होगी। क्योंकि पिछली तिमाही यानी जून में भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 24 फीसदी की भारी गिरावट देखी गई थी। त्यौहारी सीजन के बाद अर्थव्यवस्था पटरी पर जरूर लौटी है, लेकिन गिरावट का दौर फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है।

आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि इस तिमाही के आंकड़ों के बाद यह कहना आसान होगा कि भारत मंदी के दौर से गुजर रहा है कि नहीं। सितंबर तिमाही में जीडीपी 5 से 10 फीसदी तक निगेटिव रहने पर तकनीकी रूप से भारत में मंदी आ जाएगी।

भारत की जीडीपी पर पड़ेगा असर

जलवायु परिवर्तन में बदलाव के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2030 तक 200 अरब डॉलर का प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का जोखिम है। इसका कारण तापमान में वृद्धि के कारण कामगारों का दफ्तर के बाहर रहकर काम करना कठिन होगा और इससे बाहर रहकर काम करने के घंटों में कमी आएगी। 

मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह कहा गया है। इसके अनुसार वर्ष में प्रचंडगर्मी वाले दिन इस समय की तुलना में 15 प्रतिशत बढ़ जाएंगे। रिपोर्ट के अनुसार 2017 की स्थिति को देखा जाए तो, गर्मी के समय होने वाले कार्यों का जीडीपी में योगदान करीब आधा है। वहीं जीडीपी वृद्धि में ऐसे कार्यों का योगदान करीब 30 प्रतिशत तथा रोजगार में करीब 75 प्रतिशत है। कुल 38 करोड़ लोगों को ऐसे कार्यों में रोजगार मिला हुआ है। 

इसमें कहा गया है, ‘‘पारा और उमस बढ़ने के कारण काम न हो पाने से जीडीपी को क्षति 2030 तक 2.5 से 4.5 प्रतिश्त तक हो सकती है। राशि के रूप में मोटे तौर पर यह 150 से 200 अरब डॉलर बैठेगी ।'' रिपोर्ट के अनुसार इससे निपटने के लिये भारत को बाहर रहकर काम करने वाले कर्मचारियों के लिये काम के घंटे को बदलना होगा, गर्मी से निपटने के उपाय करने होंगे तथा उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से श्रम और पूंजी को हटाने पर भी विचार करना पड़ सकता है। 

मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट के अनुसार इस बदली हुई स्थिति के अनुसार खासकर शहरी गरीबों को स्वयं को ढालाना चुनौतीपूर्ण होगा। इन लोगों को मदद की जरूरत होगी। केवल एयर कंडीशन उपलब्ध कराने को लेकर 110 अरब डॉलर की जरूरत पड़ेगी। रिपोर्ट के अनुसार कार्यबल पर पड़ने वाले प्रभाव के अलावा जलवायु बदलाव का असर फसलों पर भी पड़ सकता है। एक अनुमान के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण चावल, गेहूं, मकई जैसी फसलों के उत्पादन में 10 प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका है। इसमें कहा गया है, ‘‘पारा और उमस बढ़ने के कारण कृषि के लिये न केवल घंटे कम होंगे बल्कि उत्पादन में भी कमी की आशंका है।

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