लेखक: के. रामचंद्र मूर्ति

हैदराबाद: चुनावी राजनीति में तीन महीने का वक्त लंबा माना जाता है। 6 सितंबर को जब तेलंगाना के मुख्यमंत्री कलवाकुंटला चंद्रशेखर राव (KCR) ने तेलंगाना विधानसभा भंग किया था, तब सियासी पंडितों का आकलन था कि केसीआर के लिए चुनावी राहें बेहद आसान है। कांग्रेस पार्टी में उहापोह की स्थिति थी क्योंकि पार्टी के भीतर ही आधा दर्जन से अधिक नेताओं में सीएम बनने की लालसा पल रही थी।

चुनाव प्रचार खत्म हो चुका है, स्थिति इतनी जटिल है कि कोई भी 7 दिसंबर के मतदान के नतीजों पर कयास लगाने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। कोदाडा में अपनी अंतिम चुनावी मीटिंग में बोलते हुए राहुल गांधी ने कहा कि तेलंगाना में सत्ता के बदलाव की सुनामी आने ही वाली है। हालांकि राहुल गांधी के दावों को कुछ लोग बढ़ा चढ़ाकर कही बात मान सकते हैं। लेकिन इतना तो तय है कि राहुल ने तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी में जान फूंकने और अनुशासन लाने में सफलता हासिल की है। राहुल तेलंगाना में समाज के विभिन्न वर्गों के बीच समन्यवय बनाने में भी सफल साबित हुए। तेलंगाना में कांग्रेस अब अधिक संगठित और लड़ने के लिए मुस्तैद है।

माहौल में बड़ा बदलाव

तीन महीने पहले किसी ने सोचा नहीं होगा कि कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के नेतृत्व में सीपीआई और प्रोफेसर कोदंडराम की पार्टी तेलंगाना जन समिति (TJS) के बीच बेहतर तालमेल बैठा लेंगे। किसी ने अंदाजा भी नहीं लगाया था कि बीते साढ़े तीन दशकों से एक दूसरे की मुख़ालतफ करने वाली कांग्रेस और तेदेपा के बीच कोई संभावना हो सकती है।

नरेंद्र मोदी से नाता तोड़ने के बाद तेदेपा सुप्रीमो नारा चंद्रबाबू नायडू की तरफ से राहुल गांधी के और नजदीक जाने के साफ संकेत मिल रहे हैं। चंद्रबाबू की तरफ से पहला संकेत कर्नाटक में कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में दिखा था, जब बाबू ने गर्मजोशी से राहुल गांधी से हाथ मिलाया।

तेदेपा प्रमुख हाल के दिनों में विपक्षी पार्टियों को एंटी-मोदी फ्रंट बनाने के लिए एकजुट करने में लगे हैं। बावजूद इसके चीजों के इस तेजी से बदलाव को लेकर अंदाजा लगा पाना मुश्किल था, जिसने तेलंगाना विधानसभा चुनाव को इस कदर जटिल बना दिया।

परिदृश्य इस कदर बदल चुके हैं कि राजनीतिक पंडित विभिन्न राजनीतिक दलों की जीत की संभावनाओं पर पूरी तरह बंटे हुए हैं। राजनेता-व्यवसायी के बाद चुनावी विश्लेषक बने लगडपति राजगोपाल अपने सर्वे के साथ हाजिर हैं, जिसमें तटस्थ मतदाताओं का रुझान कांग्रेस नीत पीपुल्स फ्रंट की तरफ साफ देखा जा सकता है।

गुजरात की तरह सामाजिक गठजोड़

राहुल गांधी ने तेलंगाना में भी जमीन तैयार कर ली है, जैसा कि उन्होंने गुजरात में सामाजिक गठजोड़ के जरिए किया। राजनीतिक और सामाजिक गठजोड़ के लिए राहुल ने गदर, बीसी नेता कृष्णैया, दलित नेता मंदाकृष्णा मदिगा, टीजेएक के कोदंडराम, सीपीआई के सुधाकर रेड्डी सरीखे नेताओं को अपने साथ लाने में सफल रहे। इस मामले में रोडमैप बनाने और इसे क्रियान्वित करने में चंद्रबाबू नायडू की भी अहम भूमिका रही।

माना जा रहा है कि आंध्र के मुख्यमंत्री की तरफ से पीपुल्स फ्रंट के लिए अतिरिक्त संसाधन का योगदान किया गया। बाबू ने कई समझौते भी किए। उन्होंने टीडीपी के लिए महज 13 सीटों पर ही समझौता कर लिया। जबकि 2014 में अकेले तेलंगाना में तेदेपा को 15 सीटें हासिल हुई थी। चंद्रबाबू ने न सिर्फ कांग्रेस के लिए ये कुर्बानी दी है बल्कि तेलंगाना में कांग्रेस के इंजन का पोषण करने और इसे गाइड करने का भी बीड़ा उठाया है।

चंद्रबाबू अहम घटक के तौर पर साबित हो रहे हैं। जो पीपुल्स फ्रंट की उम्मीदों को या तो बेहतर कर सकते हैं या फिर बिगाड़ सकते हैं। चंद्रबाबू का साथ एक तरफ पीपुल्स फ्रंट को जहां फायदा दिला रहा है, तो वहीं इससे फ्रंट को नुकसान भी पहुंच रहा है। बाबू फंड्स के साथ फ्रंट को सहयोग कर रहे हैं। जबकि चंद्रबाबू के संगठन ने तेलंगाना के एक खास वर्ग को पहले ही नाराज कर दिया है। माना जा रहा है कि किसी तरह जो लोग कांग्रेस को वोट करने वाले थे। वो उसके तेदेपा से गठजोड़ के बाद टीआरएस की तरफ जाने का मन बना रहे हैं। अपने खास अंदाज में चंद्र बाबू ने विभिन्न मौकों पर जनसभाओं में मोदी और केसीआर की जमकर आलोचना की है।

राहुल गांधी की तुलना में कई बार तो पीएम मोदी के खिलाफ चंद्रबाबू की टिप्पणी अधिक तीखी पाई गई। केसीआर को हराने के चक्कर में, चंद्रबाबू नायडू ने राष्ट्रीय स्तर पर खुद को मोदी की नीतियों का सबसे बड़ा आलोचक स्थापित किया है।

राहुल गांधी की बदौलत ही तेलंगाना में चंद्रबाबू की जमकर आवभगत हो रही है। वहीं चंद्रबाबू खासकर हैदराबाद शहर और खम्मम को ही केंद्रित किए हुए हैं। जहां सीमांध्र से आए आंध्र मूल के लोगों की बहुतायत है।

वास्तव में बीजेपी न तेलंगाना और न ही आंध्रप्रदेश में बड़ी ताकत है, बावजूद इसके बीजेपी कई राष्ट्रीय मुद्दों पर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच सकती है। जिससे कुल मिलाकर पीपुल्स फ्रंट को ही नुकसान की उम्मीद है।

राहुल गांधी चंद्रबाबू नायडू के प्रशंसक बनते जा रहे हैं और उनके बीच की दोस्ती और प्रगाढ़ होती जा रही है। चंद्रबाबू की इस दलील पर राहुल ने भी हामी भरी, जिसमें उन्होंने कृष्णा नदी में पानी नहीं होने और गोदावरी नदी का पानी दोनों तेलुगू राज्यों को मुहैया करने की वकालत की थी। केसीआर ने गजवेल में अपनी अंतिम जनसभा में लोगों को उन स्थितियों से आगाह किया जब तेलंगाना में कृष्णा नदी का पानी मुहैया नहीं होगा। केसीआर ने चंद्रबाबू पर तेलंगाना के शासन को कांग्रेस पार्टी के जरिए नियंत्रित करने की मंशा रखने का आरोप लगाया।

राहुल गांधी के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए चंद्रबाबू नायडू ने कहा था कि विपक्षी पार्टियों की एकता आगामी लोकसभा चुनाव तक जारी रहेगी। कोदंडराम, सीपीआई के सुधाकर रेड्डी, गदर, मंदाकृष्मा मदिगा, डॉ चेरुकू सुधाकर ने भी लोगों से पीपुल्स फ्रंट को वोट करने की अपील की है। राहुल गांधी ने कहा कि सब को साथ लेकर चलने वाली ये कवायद आगे भी जारी रहेगी।

मीडिया ने दिखाया बड़ा असर

हाल के चुनावों में मीडिया ने अपना बड़ा असर दिखाया है। बड़े अखबार और चैनल जो अक्सर टीडीपी को प्रमुखता से दिखाते रहे, इन्होंने तेलंगाना में केसीआर को जबदस्त पब्लिसिटी दी। केसीआर और उनके मुखर पुत्र के तारक रामा राव (केटीआर) कई हफ्तों तक अखबारों के पहले पन्ने पर छाए रहे।

लेकिन तेदेपा के थर्ड फ्रंट में शामिल होते ही अखबारों और चैनलों ने अपने पैंतरे बदल लिए, साथ ही कांग्रेस और तेदेपा के पक्ष में कई सामग्री प्रचारित और प्रसारित की जाने लगी।

पाठकों और दर्शकों को अखबारों और चैनलों पर सियासी विज्ञापनों की बाढ़ सी दिखी। आंकलन में, कुल दस विज्ञापनों में पिपुल्स फ्रंट की तरफ से कम से कम सात विज्ञापन दिए गए। बाकी के दो बीजेपी की तरफ से जबकि एक ही तेरास की तरफ से दिया गया।

लगडपति की दिमागी सियासत

दिमागी चाल चलने में चंद्रबाबू ने एक बार फिर खुद को एक्सपर्ट साबित किया है। अपने ससुर और तेदेपा के संस्थापक एन टी रामाराव को अपदस्थ करने के समय से ही ये महारत उन्होंने हासिल कर ली। चंद चुनावों पर सर्वे करने वाले लगडपति राजगोपाल को उन्होंने तैयार किया। मंगलवार को राजगोपाल ने मीडिया को संबोधित किया और बताया कि लोकप्रिय समर्थन पीपुल्स फ्रंट के साथ है। राजगोपाल के मुताबिक आदिलाबाद, खम्मम, नलगौंडा और निजामाबाद में फ्रंट आगे है। जबकि करीमनगर, वरंगल और महबूबनगर में तेरास का समर्थन ज्यादा है। हालांकि ट्वीट कर केटीआर ने राजगोपाल के सर्वे को खारिज किया। केटीआर के मुताबिक दो महीने पहले लगडपति उन्हें (केटीआर) को 65 सीटें जीतने वाले मैसेज करते थे। अब चंद्रबाबू नायडू के प्रभाव में उनके सुर बदल गए हैं। इसके बाद तो केटीआर और राजगोपाल के बीच ट्वीट वार शुरू हो गया।

बुधवार को एक बार फिर लगडपति ने प्रेस कांफ्रेंस कर दावा किया कि सर्वे रिपोर्ट उनकी टीम ने तैयार किए हैं। इसमें किसी के प्रभाव का सवाल ही पैदा नहीं होता है। राजगोपाल ने दावा किया कि वरंगल जिले में भी लोगों ने तेरास के खिलाफ और पीपुल्स फ्रंट के पक्ष में अपना मूड बदल लिया है।

सियासी सौदेबाजी में लगडपति ने ऐसा लगता है कि अपनी विश्वसनीयता खो दी है। हालांकि उनका प्रयास कुछ हद तक मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस, तेदेपा, टीजेएस, सीपीआई के आक्रामक कैंपेन ने जाहिर तौर पर तेरास की आसान जीत को मुश्किल बना दिया है। हालांकि सत्ताधारी तेरास की फिर से वापसी की संभावनाओं पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ेगा।

कुल मिलाकर कहें तो चंद्र बाबू नायडू खुद के राज्य में विपक्ष के हमलों से हलकान हैं। ऐसे में उन्हीं मुद्दों पर पड़ोसी राज्य के सीएम पर आक्रमण करने को लोग पचा नहीं पा रहे हैं।

केसीआर के खिलाफ कांग्रेस पार्टी की तरफ से लगाए तमाम आरोप आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू के खिलाफ भी लागू होते हैं। इन आरोपों में शामिल है परिवारवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, लचर प्रशासनिक व्यवस्था आदि आदि।