अमरावती: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और 15 अन्य को चारा घोटाले के एक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद आंध्र प्रदेश कैडर के एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि मामला तार्किक निष्कर्ष तक पहुंच गया। दरअसल, उन्होंने मामले की जांच की थी।

यह मामला 21 साल पहले उजागर हुआ था। उस वक्त अपने गृह राज्य बिहार में प्रतिनियुक्ति पर तैनात वरुण सिंधु के. कौमुदी ने पशुपालन घोटाला इकाई, पटना के सीबीआई पुलिस अधीक्षक होने के नाते मामले की करीबी निगरानी की थी और मामले में आरोपपत्र भी दाखिल किया था। दो दशक से भी पुराने मामले को याद करते हुए कौमुदी ने कहा कि पटना स्थित सीबीआई अदालत को ट्रक भर दस्तावेजों की प्रति सौंपी गई थी।

आईपीएस ने बताया कि मुझे इससे जुड़े एक अन्य मामले में लालू प्रसाद को गिरफ्तार करने को कहा गया था, लेकिन उन्होंने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था। उन्होंने खुशी जताई कि मामला इतने साल बाद तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचा। वह फिलहाल नई दिल्ली में राष्ट्रीय जांच एजेंसी में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के पद पर तैनात हैं।

देशभर में चर्चित चारा घोटाले को भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी अमित खरे ने उजागर किया था। सरकारी राशि के बंदरबांट से जुड़े एक मामले में अदालत ने शनिवार को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद को दोषी करार दिया। सरकारी खजाने से अवैध तरीके से करीब 950 करोड़ रुपये की निकासी की कहानी को 'चारा घाटोला' कहा गया, जिसमें राजनेता, बड़े नौकरशाह और फर्जी चारा घोटाले को सबसे पहले वर्ष 1993-94 में पश्चिम सिंहभूम जिले के तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे ने चाईबासा कोषागार से 34 करोड़ रुपये से अधिक की निकासी को उजागर किया था और इसकी प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया था। अमित खरे इस समय विकास आयुक्त और योजना और वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव हैं। सीबीआई की विशेष अदालत ने चारा घोटाले से संबंधित जिस मामले में शनिवार को लालू प्रसाद सहित 16 लोगों को दोषी पाया है, वह देवघर के जिला कोषागार से फर्जी तरीके से 84.5 लाख रुपये निकाले जाने से जुड़ा हुआ है।