नई दिल्ली: जनता दल (यूनाइटेड) के चुनाव चिन्ह को लेकर शरद यादव अपना दावा गंवा चुके हैं। नीतीश खेमे में खुशी है। प्रतिक्रिया देने वाले तो कह रहे हैं कि ये तो होना ही था। कुछ हद तक इसका इल्म खुद शरद यादव को भी था। बावजूद इसके उन्होंने लालू और उनके करीबी नेताओं की शह पर अपनी राजनीति को दांव पर लगा दिया।

नीतीश खेमे के नेता चुटकी लेने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। उनकी मानें तो शरद अब लालू के सपूतों तेजस्वी और तेजप्रताप के चाचा बनेंगे। हालांकि इस भूमिका में वे कितने दिनों तक सहज रह पाते हैं ये देखने वाली बात होगी।

कुछ नेताओं की मानें तो शरद को जदयू में पूरा सम्मान मिल रहा था। वे कुछ नेताओं के बहकावे में आ गए और बगावत कर बैठे। जानते हैं चुनाव आयोग ने शरद के दावों को धता बताते हुए क्या कहा।

शुक्रवार को चुनाव आयोग ने अपने आदेश में बताया है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले समूह को विधायिका और पार्टी की राष्ट्रीय परिषद (नेशनल काउंसिल ऑफ द पार्टी) में जबरदस्त समर्थन मिला है, जो जेडीयू की शीर्ष संगठनात्मक संस्था है। आदेश में कहा गया है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला जनता दल (यूनाईटेड) ही असली जेडीयू है और बिहार की पार्टी के तौर पर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले ग्रुप को पार्टी के चुनाव चिन्ह तीर के इस्तेमाल अधिकार है।

बिहार की राजनीति को गहराई से समझने वाले जानकारों की मानें तो शरद यादव को भली भांति पता था कि वे पार्टी सिंबल की लड़ाई हार जाएंगे। बावजूद इसके उन्होंने चुनाव आयोग में दावा कर अपनी किरकिरी करवाई। शरद यादव सरीके घुटे हुए नेता से इस तरह की राजनीतिक अदूरदर्शिता की उम्मीद बेमानी है। दरअसल शरद यादव का विरोध का झंडा उठाने का बस एक ही मकसद था कि वे नीतीश के पाले के कुछ नेताओं को तोड़ सकें।

हालांकि शरद यादव अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। नीतीश कुमार से खफा चंद नेताओं ने ही शरद के सुर में सुर मिलाया। जिन्हें नीतीश भी भली भांति जानते हैं। कुल मिलाकर नीतीश से टक्कर लेकर शरद यादव ने अपनी राजनीतिक साख गंवा दी है। शरद के लिए अब एक ही रास्ता है कि वे लालू प्रसाद के पाले में चले जाएं। हालांकि लालू शरद के मिलन का बिहार की राजनीतिक पर कोई बड़ा असर पड़ने वाला नहीं है।

शरद यादव जब तक जदयू में रहे उन्हें पार्टी में पद के साथ सम्मान भी मिला। उनकी हैसियत राजद में उतनी ही सम्मानजनक होगी, इस पर लोग संदेह जता रहे हैं।