सारांश

लगातार दो दिन बैंक के सामने खड़े रहे लेकिन बैंक बंद होने से पहले काउंटर तक नहीं पहुंच पाए। तमिलनाडु में ठेकेदारों के हाथों ठगे गए अपने जवान बेटों को पैसा भेजने की जल्दी थी। सरकार के नोटबंदी के फैसले से उत्पन्न संकट की स्थिति में गरीबी और असहायता ने किसान को आत्महत्या की ओर धकेल दिया।

रायगढ़ (छत्तीसगढ़) : पुराने नोटों को नए नोटों में नहीं बदल पाने से निराश होकर छत्तीसगढ़ के एक गरीब किसान ने आत्महत्या कर ली। बैंकों के सामने लगी लंबी लाइनों के कारण पिछले दो दिनों से वो नोट बदल पाने में नाकाम रहे। यह दुखद घटना रायगढ़ जिले के गांव महाराजपुर की है।

पीटीआई की खबर के मुताबिक मृत किसान रवि प्रधान की पत्नी पुष्पलता ने बताया कि उन्हें पैसों की सख्त जरूरत थी क्योंकि तमिलनाडु में स्थित उनके बेटों को भेजना था। लेकिन 500 और 1000 रुपए के नोट सरकार द्वारा प्रतिबंधित किए जाने के कारण उन्हें बदलने में दिक्कतें आ रही थीं।

सारंगगढ़ के सब डिवीजनल पुलिस अधिकारी जुनास बाडा ने कहा, "प्रधान का शव 12 नवम्बर की रात में उनके घर में लटकता हुआ पाया गया। चूंकि वहां उनका कोई पत्र बरामद नहीं हुआ, इसलिए आत्महत्या का सही कारण क्या रहा होगा इसकी जांच की जाएगी।" उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी का बयान दर्ज करना बाकी है। इस मामले में पुलिस ने केस दर्ज किया है और तफ्तीश जारी है।

पुष्पलता ने कहा, "मेरे दो बेटे सुनील (22) और अनिल (20) तमिलनाडु में एक धागा मिल में काम कर रहे हैं। 10 नवम्बर को मेरे बेटों ने अपने पापा को फोन कर सूचित किया कि उन्हें तत्काल पैसों की जरूरत है क्योंकि उनका ठेकेदार मजदूरी का भुगतान किए बिना भाग गया। वो वहां से लौटकर आना चाहते हैं और उनके पास पैसे नहीं हैं।"

बता दें कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों से हर साल लाखों युवा रोजगार की तलाश में दूर-दूर के राज्यों में पलायन करते हैं जहां अक्सर उनके साथ ठेकेदार धोखा दे देते हैं।

पुराने नोट बंद कर दिए जाने के कारण गांव से दो किलोमीटर दूर स्थित बैंक की एक शाखा में वो लगातार दो दिनों तक कतार में पूरा दिन खड़े होते रहे फिर भी अपने पास मौजूद 3000 रुपए नहीं बदल पाए थे।

पुष्पलता ने कहा, "बैंक बंद होने से पहले वो काउंटर तक पहुंच ही नहीं पाए थे। वो बेहद निराश थे।"