नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय गुरुवार को सबरीमाला मंदिर को लेकर पिछले साल दिए अपने फैसले के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले को सुनवाई के लिए बड़ी पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया है।

अब सात जजों की पीठ इसपर फैसला देगी। सीजेआई ने कहा, 'पूजा स्थलों में महिलाओं का प्रवेश केवल इस मंदिर तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश में भी शामिल है। याचिकाकर्ताओं का समर्थन धर्म और विश्वास पर बहस को पुनर्जीवित करना था।'

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे को लेकर दाखिल की गई पुनर्विचार याचिकाओं और राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर शीर्ष अदालत के 2018 के आदेश पर पुनर्विचार के लिए दाखिल याचिका पर फैसला सुनाएगी।

शीर्ष कोर्ट ने 2018 के आदेश में राफेल सौदे के सीबीआई जांच का आदेश नहीं दिया था। सबरीमाला मामले में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फरवरी में बहस पूरी कर ली थी और याचिकाओं के समूह पर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था। इन याचिकाओं में शीर्ष कोर्ट के 2018 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी। 2018 का फैसला सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत देता है।

प्रधान न्यायाधीश के इस महीने सेवानिवृत्त होने से पहले सुनाए जाने वाले महत्वपूर्ण फैसलों में से यह एक है।

पीठ ने केरल सरकार, त्रावणकोर देवासम बोर्ड (टीडीबी), नायर सर्विस सोसाइटी व अन्य सहित सभी पक्षों को सुना है। इसके बाद कोर्ट ने कहा कि वह यह आदेश देगी कि फैसले पर पुनर्विचार किया जाए या नहीं।

राफेल सौदे में केंद्र ने शीर्ष कोर्ट से कहा था कि सौदा राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल से जुड़ा है। अटॉर्नी जनरल के.के.वेणुगोपाल ने पीठ से कहा था, "हमने एक आईजीए पर हस्ताक्षर किया है..हम उसका पालन करने को मजबूर हैं..राफेल सजावट के लिए नहीं है। यह हम सभी की सुरक्षा के लिए जरूरी है..दुनिया में कहीं भी ऐसे मामले अदालत में नहीं जाते।"

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अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट से कहा था कि आईजीए के अनुच्छेद 10 के अनुसार, सौदे में मूल्य का खुलासा नहीं किया जा सकता।

उन्होंने पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करने पर जोर देते हुए कहा, "यह मामला, भारत व फ्रांस के बीच अंतर सरकारी समझौते के गोपनीयता व रक्षा सौदों से जुड़ा है।"

राफेल सौदे का विरोध करते हुए याचिकाकर्ताओं ने एक रिज्वाइंडर दाखिल किया, जिसमें कहा गया कि 14 दिसंबर, 2018 के फैसले पर पुनर्विचार होना चाहिए, क्योंकि यह बहुत से झूठ व सामग्री व प्रासंगिक सूचनाओं के छिपाए जाने पर आधारित है।