भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों को दूसरों पर अभिव्यक्त करता है। भाषा का स्वरुप निरंतर बदलता रहता है। अतः यह बात सभी भाषाओं पर लागू होती है। भाषा का महत्व सिर्फ उसकी अभिव्यति क्षमता या संप्रेषण क्षमता में ही नहीं है बल्कि व्यक्ति, जाति, संस्कृति को प्रतिबिंबित करने की क्षमता भी उसमे निहित है।

हिन्दी भारत गणराज्य की राष्ट्रीय आधिकारिक भाषा है और इतना ही नहीं यह दुनिया की सबसे व्यापक रूप में बोली जाने वाली भाषा है। यह विश्व की तीसरी और भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।

हिन्दी के क्रमिक विकास पर नजर डालते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे देश में मुस्लिम और अंग्रेज़ शासन से पहले राजदरबारों में काम-काज के लिए संबद्ध क्षेत्र की भाषा का प्रयोग होता था। उससे पहले संस्कृत, पाली, प्राकृत भाषा का प्रयोऊ होता था। मुग़ल शासकों के दरबार में अधिकतर फ़ारसी भाषा और अरबी लिपि का प्रयोग हुआ करता था। स्थानीय लोगों और सैनिकों के संपर्क से विक्सित एक नई-भाषा सत्रहवीं-अठारवीं शताब्दी से सरकारी कामकाज में भी प्रयुक्त होने लगी जिसे उर्दू कहा गया।

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अंग्रेजों के दरबारों में अंग्रेजी और राजा-महाराजाओं के दरबारों में स्थानीय भाषा चलती रही। संपूर्ण उत्तर, पंजाब, पश्चिमी उत्तर, मध्य भारत तथा दक्खन में लोकोपयोगी कामों के लिए हिन्दी या दक्खनी का प्रयोग होता रहा। 19 वी सदी में ईसाई मिशनरी, फोर्ट विलियम कॉलेज एवं नवजागरण ने हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। नवजागरण के नेताओं ने राष्रीय एकता के लिए हिन्दी के प्रयोग पर बल दिया।

वहीँ दूसरी ओर राजाराम मोहन राय, केशवचन्द्र सेन, एनी बीसेंट, महर्षि दयानंद सरस्वती आदि का योगदान भी महत्वपूर्ण है। महर्षि दयानंद सरस्वती गुजरती एवं संस्कृत के विद्वान् थे किंतु सारा धार्मिक साहित्य उन्होंने हिन्दी में लिखा। 1925 में सबसे प्रमुख राजनीतिक संगठन अखिल भारतीय राष्ट्रीय संगठन ने कानपुर अधिवेशन में प्रस्ताव स्वीकार किया कि अपने सभी कार्यों में हिन्दी का प्रयोग करे। 19 वी शताब्दी के अंत तक खड़ीबोली गद्य की भाषा बन गयी। 20 वी शताब्दी में गद्य का विकास तीव्रता से हुआ और पद्य का स्थान गद्य ने लिया।

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राज्य या प्रशासन की भाषा को राजभाषा कहते हैं। राजभाषा का शब्द भंडार एक सुनिश्चित ढाँचे में ढला होता है या दुसरे शब्दों में कहें तो प्रयोजन विशेष होता है। इसके माध्यम से सभी प्रशासनिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। दुसरे शब्दों में कहें तो उस भाषा को राज्य भाषा कहते हैं, जो सरकारी कामकाज के लिए स्वीकार की गई हो और जो शासन तथा जनता के बीच आपसी संपर्क के काम आती हो।

जहाँ तक हिन्दी का सवाल है, स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने भारतीय भाषाओं और विशेषकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा के रूप में प्रचलित करने का प्रयास किया। इस राष्ट्रीय जागरण के परिणाम स्वरूप हिन्दी का उत्तरोत्तर प्रसार होने लगा और यह मत व्यक्त किया जाने लगा कि देश के अधिकांश लोगों की बोली होने के कारण हिन्दी को भी भारत की राष्ट्रभाषा बनाया जाना चाहिए।

महात्मा गांधी का विचार था कि भारतीय भाषाओं में केवल हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है, जिसमें उपर्युक्त सभी गुण मौजूद हैं। महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं के उद्गारो का परिणाम यह हुआ कि जब भारतीय संविधान सभा में संघ सरकार की राजभाषा निश्चित करने का प्रश्न आया तो विशद विचार मंथन के बाद 14 सितंबर, 1949 को हिन्दी को भारत संघ की राजभाषा घोषित किया गया। भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ और तभी से देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी विधिवत भारत संघ की राजभाषा है।

जिस तरह किसी भी स्वाधीन देश के लिए राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का महत्त्व होता है उसी तरह राजभाषा का भी। प्रजातांत्रिक देश में जनता और सरकार के बीच भाषा की दीवार नही होनी चाहिए और शासन का काम जनता की भाषा में किया जाना चाहिए। जब तक विदेशी भाषा में शासन होता रहेगा, तब तक कोई देश सही अर्थों में स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषा में ही स्पष्टता और सरलता से अपने विचारों को अभिव्यक्त कर सकता है। नूतन विचारों का स्पंदन और आत्मा की अभिव्यक्ति, मातृभाषा में ही सम्भव है।

राजभाषा देश के भिन्न भिन्न भागों को एक सूत्र में पिराने का कार्य करती है इसके माध्यम से जनता न केवल अपने देश की नीतियों और प्रशासन को भलीभांति समझ सकती है, बल्कि उसमें स्वयं भी भाग ले सकती है। प्रजातंत्र की सफलता के लिए ऐसी व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। विश्व के सभी स्वतंत्र देश और नवोदित राष्ट्रों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि उनका उत्थान, उनकी अपनी भाषाओं के माध्यम से ही सम्भव है।

हिन्दी को संघ की राजभाषा 1950 में ही घोषित कर दिया गया था, किंतु केंद्र सरकार के कामों में हिन्दी को अंग्रेजी का स्थान देने के लिए गंभीरता से प्रयास केंद्र सरकार द्वारा 1960 ओर विशेषकर राजभाषा अधिनियम, 1963 के पास होने के बाद से प्रारंभ किया गया। उस समय यह अनुभव किया गया कि हिन्दी के माध्यम से प्रशासन का कार्य चलाने के लिए कुछ प्रारंभिक तैयारियों की आवश्यकता पड़ेगी, जैसे तकनीकी एवं पारिभाषिक शब्दावली निर्माण के लिए शिक्षा मंत्रालय ने 1950 में वैज्ञानिक तथा तकनीकी बोर्ड की स्थापना की थी। इसके मार्गदर्शन में शिक्षा मंत्रालय के हिन्दी विभाग ने तकनीकी शब्दावली के निर्माण का कार्य चालू किया था।

बाद में हिन्दी विभाग का विस्तार होते होते सन् 1960 में केंद्रीय हिन्दी निदेशालय की स्थापना हुई। इसके कुछ समय बाद 1961 में राष्ट्रपति के आदेशानुसार वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना की गई। निदेशालय तथा आयोग ने अब तक विज्ञान, मानविकी, आयुर्विज्ञान, इंजीनियरी, कृषि तथा प्रशासन आदि के 4 लाख अंग्रेज़ी के तकनीकी शब्दों के हिन्दी पर्याय प्रकाशित कर दिये हैं। इसी प्रकार राजभाषा (विधायी) आयोग तथा राजभाषा खंड ने विधि शब्दावली का निर्माण कार्य लगभग पूरा कर लिया है। सन 1979 में प्रकाशित विधि शब्दावली इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। इसमें हजारों विधिक शब्दों के हिन्दी पर्याय प्रकाशित किए गए हैं।

14 सितम्बर 1949 से लेकर आज तक संवैधनिक प्रावधनों एवं संकल्पों के दृढ़ आधर पर हिन्दी राजभाषा के रूप में प्रतिषिठत हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 से लेकर अनुच्छेद 351तक राजभाषा संबंधी संवैधानिक प्रावधान किए गए। संवैधनिक स्तर पर भी हिन्दी के अनुप्रयोगात्मक आयामों को सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों आदि में अपनाने पर जोर एवं प्रोत्साहन दिया जाता रहा है। हिंदी को प्रशासनिक, कार्यालयी व व्यावसायिक स्तरों पर प्रयोग में लाने के लिए शब्दावली निर्माण के साथ-साथ हिन्दी में कार्य करने के लिए कम्प्यूटर, टेलीप्रिंटर व अन्य यांत्रिक साधनों की व्यवस्था व सुविधएं प्रदान की जा रही हैं।

हिन्दी राष्ट्रभाषा बन गई, राजभाषा का दर्जा भी भी उसे दिया गया, लेकिन यह एक दुखद सत्य है कि स्वतन्त्रता के साठ वर्ष बाद भी उसकी राह के रोड़े और समस्याएँ कमोबेश बनी हुई हैं। समस्याएँ आतंरिक भी हैं और बाह्य भी। आतंरिक समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना तो भाषाविज्ञानियों और विद्वानों का ही है किन्तु बाह्य समस्याओं का समाधान पूरे राष्ट्र की मानसिक जागरूकता पर निर्भर करता है। किसी भाषा के राष्ट्रभाषा बनने के लिए उसका सरल होना एक अनिवार्य शर्त है।

प्रो. शकीला खानम, डीन, डॉ.बीआर अंबेडकर सार्वत्रिक विश्वविद्यालय, हैदराबाद की कलम से...