नई दिल्ली : इसरो का महत्वाकांक्षी चंद्रयान-2 मिशन तेजी से चंद्रमा की ओर बढ़ रहा है। यह 7 सितंबर को चंद्रमा की सतह पर लैंड करेगा। जिसे लेकर दुनियाभर की निगाहें इस पर हैं। चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा, और इसके 4 घंटे बाद रोवर प्रज्ञान बाहर आएगा जो कि चंद्रमा की सतह पर 14 दिनों में कुल 500 मीटर की दूरी तय करेगा। विक्रम के चांद को छूने के साथ ही वैज्ञानिकों को चंद्रमा से पृथ्‍वी की वास्‍तविक दूरी पता चल जाएगी, जो अभी उनके लिए अबूझ पहेली बना हुआ है।

अभी तक कोई भी देश यहां तक नहीं पहुंचा है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा पांच साल बाद यहां अपने अंतरिक्ष यात्री उतारने की योजना बना रहा है। Manoeuvre ऑर्बिट में प्रवेश की समय 11:55hrs अनुमानित की गई है।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने चंद्रयान-2 के साथ अपना एक लूनर लेजर रेट्रोरेफ्लेक्‍टर एरे भेजा है जो वैज्ञानिकों को चंद्रमा की पृथ्‍वी से असली दूरी बताएगा। नासा के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि हम चंद्रमा की सतह पर ज्‍यादा से ज्‍यादा लेजर रेट्रोरेफ्लेक्‍टर एरे भेजना चाहते हैं। उन्‍होंने बताया कि रेट्रोरेफ्लेक्‍टर एक तरह के परिष्‍कृत शीशे होते हैं जो पृथ्‍वी से भेजी गई लेजर लाइट के सिग्‍नल को वापस भेजते हैं।

वैज्ञानिकों की मुताबिक लेजर लाइट्स के वापस पृथ्‍वी पर आने पर लैंडर के वास्‍तविक स्‍थान का पता लग जाएगा। इससे पृथ्‍वी से चंद्रमा की वास्‍तविक दूरी का सटीक आकलन किया जा सकेगा। चंद्रमा की सतह पर इस तरह के 5 उपकरण पहले से मौजूद हैं लेकिन उनमें कुछ गड़‍बड़ियां हैं। इसी वजह से चंद्रमा की वास्‍तविक दूरी का पता नहीं चल पाता है।

नासा के पूर्व अंतरिक्ष यात्री डोनाल्ड ए थॉमस ने कहा कि पूरी दुनिया इसे टकटकी लगाए देख रही है। हम चंद्रमा के भूमध्य रेखा के पास उतर चुके हैं, लेकिन दक्षिण ध्रुव पर कभी नहीं गए। यह हमारे लिए बेहद खास है, क्योंकि यहां बर्फ मिलने की उम्मीद है। बर्फ मिली तो पानी व उससे ऑक्सीजन मिल मिलने की संभावना है।

बेहद खास है चंद्रयान-2 का रेट्रोरेफ्लेक्‍टर

इटली के भौतिक विज्ञानी डेल एंजेलो के मुताबिक चंद्रमा की सतह पर मौजूद रेट्रोरेफ्लेक्‍टर काफी बड़े हैं लेकिन चंद्रयान-2 के साथ भेजा गया रेट्रोरेफ्लेक्‍टर लेजर की कम किरणों को बर्बाद करता है। इसी वजह से अब चंद्रमा की सतह की सटीक माप की जा सकेगी। इससे अलावा जब प्रज्ञान रोवर चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करेगा तो जमीन की ऊंचाई का पता चलेगा।

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21 जुलाई, 1969 को जब चंद्रमा की सतह पर पहली बार अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्‍ट्रांग ने अपोलो 11 के जरिए कदम रखा तो उन्‍होंने अपने पीछे सतह पर लेजर रेट्रोरेफ्लेक्‍टर को छोड़ दिया था। इस लेजर रेट्रोरेफ्लेक्‍टर पर पृथ्‍वी की ओर केंद्रीत करके दो फुट चौड़े पैनल पर 100 शीशे लगाए गए थे। बताया जाता है कि करीब 50 साल बाद भी ये रेट्रोरेफ्लेक्‍टर अभी काम कर रहे हैं।

बता दें कि भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के लिए आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण है। चंद्रयान-2 के मॉड्यूल से लैंडर विक्रम सफलतापूर्वक अलग हो गया। इसरो ने भी ट्वीट कर इसकी पुष्टि की है। इसरो के अनुसार, भारतीय समयानुसार आज लैंडर विक्रम दिन में करीब 1 बजकर 35 मिनट पर सफलतापूर्वक अलग हो गया। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने इस अलगाव को मायके से ससुराल के लिए रवाना होने जैसा बताया है।

वैज्ञानिकों ने उच्च स्तरीय बैठक के बाद लैंडर विक्रम के अलग होने के लिए जो समय निर्धारित किया था, उसी वक्त पर अलगाव सफलतापूर्वक हुआ। शनिवार को इसरो वैज्ञानिकों की उच्‍च स्‍तरीय बैठक हुई थी। समीक्षा बैठक में शामिल एक अधिकारी ने कहा, 'लैंडर और रोवर के अलग होने का समय सोमवार को दोपहर 1.30 बजे रखा गया है।' आज निर्धारित समय के करीब ही दोपहर 1 बजकर 35 मिनट पर यह लैंडर विक्रम अलग हुआ।