आजादी के इतने साल बाद भी एक सवाल का जवाब नहीं मिला कि क्या क्रांतिकारी भगत सिंह को फांसी के फंदे से बचाया जा सकता था? कहा जाता है कि यदि राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी चाहते तो भगत सिंह की फांसी की सजा रुक सकती थी। और देश एक महान युवा क्रांतिकारी को नहीं खोता। अगर गांधीजी ने भगत सिंह का साथ दिया होता और उनकी रिहाई के लिए आवाज उठाई होती तो यह मुमकिन है था। मगर गांधी जी ने भगत सिंह के बारे ऐसा कुछ नहीं किया।

यह बहुत ही सोचने की बात है कि भगत सिंह के बारे में महात्मा गांधी ने कहा था, "मैंने किसी की जिंदगी को लेकर इतना रोमांच नहीं देखा, जितना कि भगत सिंह के बारे में देखा और सुना गया। हालांकि मैंने लाहौर में भगत सिंह को एक छात्र के रूप में कई बार देखा है। मुझे भगत सिंह के बारे में कुछ याद नहीं हैं। मगर पिछले भगत सिंह की देशभक्ति, उनके साहस और मानवता के बारे सुनना मेरे लिए गौरव की बात है।" इसके तुरंत बाद गांधी ने यह भी कहा, "मैं देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वह भगत सिंह के जैसा हिंसा का अनुकरण नहीं करें।"

गांधी जी के इस बयान के बाद यह सवाल देश में में गूंजा उठा कि आखिर महात्मा गांधी ने देश के इस महान क्रांतिकारी को बचाने की दिशा में कोई कदम क्यों नहीं किया? आखिर क्यों गांधीजी ने भगत सिंह की विचारधारा का विरोध किया था?

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गांधीजी के बारे में लोग यह भी मानते हैं कि अगर महात्मा गांधी जी ने भगत सिंह का समर्थन किया होता तो उनकी खुद की अहिंसा विचारधारा पर सवाल खड़े होते। गांधीजी अहिंसा के रास्ते पर वह बहुत आगे निकल चुके थे। जो उन्हें पसंद नहीं था। इससे साफ होता है कि गांधीजी और भगत सिंह की विचारधारा ही वह मुख्य वजह हिंसा और अहिंसा रही। इसी के चलते दोनों के बीच टकराव हुए। गांधीजी ने भगत सिंह से दूरी बनाना ही उत्तम समझा। भगत सिंह हिंसा और क्रांति का रास्ता अपनाया। दूसरी ओर महात्मा गांधी अहिंसा रास्ता अपनाया।

गौरतलब है कि क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च, 1931 को ही फांसी दे दी गई थी। वैसे इनकी फांसी 24 मार्च, 1931 की सुबह फांसी दी जानी थी। मगर हुकूमत ने नियमों का उल्लंघन कर इन तीनों बहादुरों को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी।

अंग्रेजों ने तो भगतसिंह को तो फांसी दे दी, मगर उनके विचारों को खत्म नहीं कर पाई। जिन्होंने देश की आजादी की आवाज उठाई थी। देश में आज भी भगतसिंह के क्रांति की पहचान हैं। उस दौर को अनेक उतार चढ़ाव के रूप में देखा गया। इंग्लैंड में किये गये सत्याग्रह के अनुभव के साथ महात्मा गांधी साल 1915 में भारत आ गये और देखते ही देखते ही वो भारत के आजादी आंदोलन में छा गये।

दूसरी ओर भगत सिंह ने छोटी सी उम्र में हिंसक क्रांति का रास्ता चुना। मगर दोनों के विचार एक ही थे कि देश आजाद हो। देश के सामान्य गरीबों के हितों को अहमियत देना शामिल था। दोनों चाहते थे कि देश की जनता शोषण से मुक्त हो और इसी दिशा में उनके प्रयास रहे।

विचार एक जैसे होने के बाद भी भगत सिंह नास्तिक थे और गांधीजी आस्तिक थे। मगर दोनों ही धर्म के नाम पर फैलाई जाने वाली नफ़रत के विरोधी थे। मगर आजादी के आंदोलन के दौरान अंग्रेज़ पुलिस अधिकारियों की लाठियों से घायल हुए लालाजी को देखकर भगत सिंह को बहुत गुस्सा आया। इसके चलते भगत सिंह ने अंग्रेजों से बदला लेने के लिए अपने साथियों के साथ मिलकर पुलिस सुपिरिटेंडेंट स्कॉट की हत्या करने की योजना बनाई। मगर एक ग़लती की वजह से स्कॉट की जगह 21 साल के पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या हो गई। तब इस मामले में भगत सिंह पुलिस की गिरफ़्त में नहीं आये।

इस घटना के कुछ समय बाद भगत सिंह ने असेंबली सभा में बम फेंका। तब सरदार पटेल के बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल सभा की कार्यवाही का संचालन कर रहे थे। इस घटना से पहले भगत सिंह किसी प्रकार जनहानि नहीं करना चाहते थे।

भगत सिंह मकसद बहरी अंग्रेज सरकार के कानों तक देश की सच्चाई को बम की गूंज से बताना चाहते थे। चाहे तो बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त भाग सकते थे। मगर उन्होंने अपनी गिरफ़्तारी के लिए आगे आये और पुलिस के सामने अपने आपको उनके हवाले कर दिया। उस समय भगत सिंह के पास उस वक्त उनकी रिवॉल्वर मौजूद थी। कुछ समय बाद ये सिद्ध हुआ कि पुलिस अफ़सर सांडर्स की हत्या में इसी रिवॉल्वर से की गई थी। इसी के चलते असेंबली में बम फेंकने और सांडर्स की हत्या के गंभीर मामले में भगत सिंह को अभियुक्त बनाकर फांसी दी गई।

इस मुद्दे पर गांधीजी कहते हैं, "भगत सिंह की बहादुरी के लिए हमारे मन में सम्मान उभरता है। मगर मुझे ऐसा तरीका चाहिए जिसमें खुद को न्योछावर करते हुए आप दूसरों को नुकसान न पहुंचाएं। लोग फांसी पर चढ़ने को तैयार हो जाएं।" गांधीजी अपनी किताब 'स्वराज' में लिखते हैं, "मौत की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए।"

वह कहते हैं, "भगत सिंह और उनके साथियों के साथ बात करने का मौका मिला होता तो मैं उनसे कहता कि उनका चुना हुआ रास्ता ग़लत और असफल है। ईश्वर को साक्षी रखकर मैं ये सत्य ज़ाहिर करना चाहता हूं कि हिंसा के मार्ग पर चलकर स्वराज नहीं मिल सकता। सिर्फ मुश्किलें मिल सकती हैं।

गांधी जी ने कहा, "मैं जितने तरीकों से वायसराय को समझा सकता था, मैंने कोशिश की. मेरे पास समझाने की जितनी शक्ति थी. वो मैंने इस्तेमाल की. 23वीं तारीख़ की सुबह मैंने वायसराय को एक निजी पत्र लिखा जिसमें मैंने अपनी पूरी आत्मा उड़ेल दी थी।"