नई दिल्ली : लोकसभा में आज तीन तलाक बिल पर चर्चा के दौरान समाजवादी पार्टी की तरफ से जब रामपुर से सांसद आजम खान बोलने खड़े हुए तो बवाल हो गया।

आजम खान ने अपनी बात की शुरुआत एक शेर से की, ‘तू इधर-उधर की ना बात कर…’ लेकिन इसके बाद जो आजम खान ने कहा उसपर भारतीय जनता पार्टी की ओर से कड़ा विरोध व्यक्त होना शुरू हो गया। जिस वक्त आजम खान बोल रहे थे तब स्पीकर की कुर्सी पर भाजपा सांसद रमा देवी बैठी हुई थीं।

आजम खान ने चेयर पर बैठी रमादेवी से कहा, आप मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि मेरा मन करता है कि आपकी ऑखों में मैं आंखे डाले रहूं।’ अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर आए आजम खान के इस बयान के बाद मानों सदन में बवाल खड़ा हो गया। भाजपा के सदस्यों ने आजम खान को सदन से माफी मांगने की मांग करते हुए जमकर हंगामा किया। सत्तापक्ष के अनुरोध पर विधानसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आजम खान को सदन से बदतमीजी जैसे शब्दों के इस्तेमाल के लिए माफी मांगने की व्यवस्था दी। हालांकि आजम खान बिना कुछ कहे सदन से वाकआउट कर गए।

चर्चा की शुरुआत रविशंकर प्रसाद ने की और उसके बाद कई सांसदों ने अपनी बात रखी। इसी दौरान भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने जब अपनी बात रखी तो उन्होंने कहा कि सबकी बातें जब सुन रही थी तो अचानक जवाहर लाल नेहरू की याद आई।

मीनाक्षी लेखी ने कहा कि फ्रेंच पत्रकार आंद्रे मालरॉक्स ने कभी जवाहर लाल नेहरू से पूछा था कि आपको आजाद भारत में सबसे बड़ी किस मुश्किल का सामना करना पड़ा। जिसके जवाब में नेहरू ने कहा था कि सबसे बड़ी मुश्किल थी कानून के हिसाब से राज्य की स्थापना करना।

इसके अलावा जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि इसके साथ ही धार्मिक देश में सेक्युलर राज्य (शासन) बनाना। मीनाक्षी लेखी ने कहा कि क्या आज नरेंद्र मोदी के सामने ऐसी ही मुश्किलें नहीं हैं। आज भी इसी तरह के विवाद खड़े किए जा रहे हैं कि लोग कह रहे हैं धर्म संकट में है। उन्होंने कहा कि तब हिंदू कोड बिल था और अब तीन तलाक बिल है।

मीनाक्षी लेखी ने कहा कि हिंदू कोड बिल की वजह से बी.आर. अंबेडकर को कांग्रेस से इस्तीफा देना पड़ा। हिंदू कोड बिल को लाने में खुद जवाहर लाल नेहरू ने बड़ी भूमिका निभाई थी।

इससे पहले विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि तीन तलाक पर रोक लगाने संबंधी विधेयक सियासत, धर्म, सम्प्रदाय का प्रश्न नहीं है बल्कि यह 'नारी के सम्मान और नारी-न्याय' का सवाल है और हिन्दुस्तान की बेटियों के अधिकारों की सुरक्षा संबंधी इस पहल का सभी को समर्थन करना चाहिए ।

रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019' को चर्चा एवं पारित करने के लिये पेश किया जिसमें विवाहित मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की संरक्षा करने और उनके पतियों द्वारा तीन बार तलाक बोलकर विवाह तोड़ने को निषेध करने का प्रावधान किया गया है ।

आरएसपी के एन के प्रेमचंद्रन ने विधेयक को चर्चा एवं पारित करने के लिये पेश किये जाने का विरोध करते हुए इस संबंध में सरकार द्वारा फरवरी में लाये गये अध्यादेश के खिलाफ सांविधिक संकल्प पेश किया। संकल्प पेश करने वालों में अधीर रंजन चौधरी, शशि थरूर, प्रो. सौगत राय, पी के कुन्हालीकुट्टी और असदुद्दीन औवैसी भी शामिल हैं।

प्रेमचंद्रन ने कहा कि इस विधेयक को भाजपा सरकार लक्षित एजेंडे के रूप में लाई है । यह राजनीतिक है । इस बारे में अध्यादेश लाने की इतनी जरूरत क्यों पड़ी । उन्होंने यह भी कहा कि इस बारे में उच्चतम न्यायालय का फैसला 3:2 के आधार पर आया ।

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वहीं, विधि एवं न्याय मंत्री ने कहा कि संविधान के मूल में लैंगिक न्याय है तथा महिलाओं और बच्चों के साथ किसी भी तरह से भेदभाव का निषेध किया गया है। मोदी सरकार के मूल में भी लैंगिक न्याय है । हमारी ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', ‘उज्जवला' जैसी योजनाएं महिलाओं को सशक्त बनाने से जुड़ी हैं । इसी दिशा में पीड़ित महिलाओं की संरक्षा के लिये हम कानून बनाने की पहल कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि तीन तलाक की पीड़ित कुछ महिलाओं द्वारा उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था। यह 5 न्यायमूर्तियों की पीठ थी । इस फैसले का सार था कि शीर्ष अदालत ने इस प्रथा को गलत बताया। इस बारे में कानून बनाने की बात कही गई।

प्रसाद ने कहा, ‘‘तो अगर इस दिशा में आगे नहीं बढ़े तो क्या पीड़ित महिलाएं फैसले को घर में टांग लें ।'' प्रसाद ने कहा कि यह ''नारी के सम्मान और नारी-न्याय का सवाल है , धर्म का नहीं।'' प्रसाद ने कहा कि पिछले साल दिसंबर में तीन तलाक विधेयक को लोकसभा ने मंजूरी दी थी। लेकिन यह राज्यसभा में पारित नहीं हो सका। संसद के दोनों सदनों से मंजूरी नहीं मिलने पर सरकार इस संबंध में अध्यादेश लेकर आई थी जो अभी प्रभावी है।

विधि एवं न्याय मंत्री ने कहा कि 2017 से अब तक तीन तलाक के 574 मामले विभिन्न स्रोतों से सामने आये हैं । मीडिया में लगातार तीन तलाक के उदाहरण सामने आ रहे हैं। इस विधेयक को सियासी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए । यह इंसाफ से जुड़ा विषय है। इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है। प्रसाद ने कहा कि20 इस्लामी देशों ने इस प्रथा को नियंत्रित किया है । हिन्दुस्तान एक धर्मनिरपेक्ष देश है तो वह ऐसा क्यों नहीं कर सकता । उन्होंने बताया कि इसमें मजिस्ट्रेट जमानत दे सकता है । इसके अलावा भी कई एहतियाती उपाए किये गए हैं ।

भाजपा की अगुवाई वाली राजग सरकार के पास निचले सदन में पूर्ण बहुमत है और उसके लिए इसे पारित कराना कोई मुश्किल काम नहीं होगा। लेकिन राज्यसभा में सरकार को कड़ी परीक्षा का सामना करना पड़ सकता है जहां संख्या बल के लिहाज से सत्ता पक्ष पर विपक्ष भारी है। जनता दल (यू) जैसे भाजपा के कुछ सहयोगी दल भी विधेयक के बारे में अपनी आपत्ति जाहिर कर चुके हैं।