EVM से छेड़छाड़ से कितना संभव, कितना कठिन !

कॉंसेप्ट फोटो  - Sakshi Samachar

नई दिल्ली : चुनाव आयोग ने लोकसभा सहित चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में वोटों की गिनती गुरुवार को पूरी कर परिणाम घोषित करने की तैयारी पूरी कर ली है। ईवीएम के जरिए परिणामों में गड़बड़ी होने की चिंता विपक्षी दलों को सता रही है और यही वजह है कि विपक्षी दल गत कुछ वर्षों से ईवीएम के कामकाज पर लगातार शंका व्यक्त करते रहे हैं। यही नहीं, सत्तापक्ष द्वारा ईवीएम से छेड़छाड़ किए जाने की आशंका व्यक्त करते हुए विपक्ष हंगामा करता रहा है। दरअसल टैंपरिंग होता क्या है? क्या वास्तव में इसकी संभावना है? अगर है तो कैसे? यह सब जानने के लिए पहले आपको पहले ईवीएम का क्या मतलब जानना होगा? वे कैसे काम करते हैं?

ईवीएम का मतलब...

भारत के संसद और राज्यों की विधानसभाओं के लिए इससे पहले बैलेट पेपर के जरिए चुनाव कराए जाते थे और वह बहुत लंबी प्रक्रिया थी। वोटों की गिनती पूरी होकर चुनाव नतीजे आने में दो दिन से अधिक समय लगता था। ऐसे में बाहुबली उम्मीदवारों के पोलिंग केंद्रों पर कब्जा कर रिगिंग करने की पूरी संभावना होती थी। उस चुनाव प्रक्रिया की जगह इेलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन्श (ईवीएम) आए। इनमें मुख्य रूप से तीन हिस्से होते हैं। ईवीएम के पहले हिस्से को कंट्रोल यूनिट कहा जाता है जो हर पोलिंग केंद्र में पुलिंग अधिकारी के पास होता है। ईवीएम का यह यूनिट हर वोट की गिनती अपने आप कर लेता है। यह करंट पर निर्भर नहीं रहता और बैटरी पर ही चलता है। दूसरे हिस्से को बैलेटिंग यूनिट कहा जाता है, जिसपर उम्मीदवारों के नाम और उनके पार्टी चिन्हों के साथ बटनों वाला एक पैनल होता है। इस बार उम्मीदवारों की तस्वीरों की भी व्यवस्था की गई है।

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ईवीएम पैनल पर लगे बटन दबाना तीसरा हिस्सा। अगर वोटर किसी भी बटन को दबाता है तो उस बटन पर मौजूद उम्मीदवार के नाम वोट पड़ता है। अब वोटर उसके द्वारा डाला गया वोट किसे पड़ा यह जानने के लिए वीवीपैट की व्यवस्था शुरू की गई है।

वोटर के बटन दबाते ही बगल में मौजूद एक अन्य मशीन की स्क्रीन पर चुनाव चिन्ह के साथ एक स्लिप सात सेकेंड तक दिखता है। उसके बाद स्लिप मशीन के भीतर लगे बॉक्स में गिर जाएगा। उसी मशीन को वोटर वेरियेबुल पेपर ऑडिट ट्रायल मशीन (वीवीपैट) कहते हैं। उसके बाद जांच करने पर ईवीएम पहली यूनिट में शामिल डाटा और वीवीपैट के बॉक्स में गिरे स्लिप्स की संख्या के साथ मेल खानी चाहिए।

क्या ईवीएम में टैंपरिंग कर सकते है?

वोटिंग के दौरान ईवीएम में मौजूद डाटा में हेराफेरी या छेड़छाड़ करने को टैंपरिंग कह सकते हैं। अर्थात हारे हुए उम्मीदवार को विजयी घोषित करना और जीते हुए उम्मीदवार को हारा हुआ घोषित करना। ईवीएम को इंटरनेट कनेक्शन नहीं होना मुख्य रूप से गौर करने वाली बात है। इंटरनेट के जरिए डाटा में हेराफेरी करने की संभावना के मद्देनजर ईवीएम में इंटरनेट की सुविधा नहीं होती। बावजूद इसके टैंपरिंग करना है तो पोलिंग केंद्रों में घुसकर ईवीएम अपने कब्जे में लेना और परिणामों को अपने अनुकूल किया जा सकता है।

वास्तव में वोटर के बदले कोई दूसरा बटन दबाकर वोट डाल सकता है। चुनावकर्मी और सीसी कैमरे तथा विभिन्न पार्टियों के पोलिंग एजेंट पोलिंग केंद्र में मौजूद होते हैं, ऐसे में यह संभव नहीं है। उसके बाद पोलिंग एजेंटों की मौजूदगी में ईवीएम सीज कर कड़ी सुरक्षा के बीच उन्हें स्ट्रॉंग रूमों तक पहुंचाया जाता है।

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फिर कैसे टैंपर कर सकते हैं ?

ईवीएम को मतदान केंद्र से स्ट्रांग रूम तक ले जाने और स्ट्रॉंगरूम में रखे हुए ईवीएम की चोरी कर उनके स्थान पर इससे पहले टैंपरिंग किए गए ईवीएम रखने के जरिए चुनाव परिणामों से छेड़छाड़ किया जा सकता है।

स्ट्रॉंगरूम ले जाने वाले ईवीएम के नंबर और उनपर चुनाव अधिकारियों के हस्ताक्षरयुक्त सील होती है। वोटों की गिनती से पहले उन्हें ध्यान में लिया जाता है। गड़बड़ी को अंजाम देना हो तो हस्तक्षरों का नकल और सील भी मेल खानी चाहिए। यही नहीं, मतदान केंद्र से स्ट्रॉगरूम तक कड़ी सुरक्षा के बीच उन्हें भेजने के अलावा कदम-कदम पर नजर रखी जाती है।

इस मामले में चुनावकर्मी के साथ चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त माइक्रो पर्यवेक्षक सहित कई तरह के पर्यवेक्षक वीडियो ग्राफरों के साथ होते हैं। हर स्ट्रांगरूम के पास उम्मीदवार से जुड़ा एक व्यक्ति 24 घंटे नजर रख सके, यह सुविधा भी चुनाव आयोग ने प्रदान की है। इससे यह काम उतना आसान नहीं है।

क्या सत्तापक्ष को टैंपरिंग का मौका होता है ?

सभी विपक्षी दलों का आरोप है कि स्ट्रॉंगरूमों में सुरक्षित रखे गए ईवीएम को बदलने की संभावना होती है। सत्तापक्ष चाहे तो सुनिश्चित योजना के तहत ईवीएम के नंबर और चुनाव अधिकारियों द्वारा निर्देशित कोड का पता होना चाहिए तभी सुरक्षकर्मियों व कुछ उम्मीदवारों के व्यक्तियों को प्रलोभन देकर ईवीएम में गड़बड़ी कर सकते हैं।

इसीलिए चुनाव आयोग, वोटिंग कराने वाले सरकारी कर्मचारी, पार्टी एजेंटों की मिलिभगत होनी चाहिए, जोकि संभव नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव परिणामों में हेराफेरी करने का मन बना चुके व्यक्तियों के पास ईवीएम होने चाहिए और लेकिन उन्हें हासिल करना उतना आसान नहीं है।

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