आज सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता राजा राम मोहन राय की 247वीं जयंती है। भारत के विचारों में सुधार लाने वाले राजा राम मोहन' का जन्म 22 मई 1772 को एक बेहद साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के राधानगर गांव के रहने वाले थे। साल 1931 में अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को राजा की उपाधि दी थी। राय को आधुनिक भारत का जनक भी कहा जाता है। राजा राम मोहन ने 19वीं सदी में समाज सुधार के लिए कई बड़े आंदोलन चलाए, जिनमें सती प्रथा को खत्म करना सबसे प्रमुख है। आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कई खास बातें...

फोटो का इस्तेमाल खबर की रिप्रजेंटेशन के लिए किया गया है।
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आजादी से पहले भारतीय समाज को दिलाई सती प्रथा, बाल विवाह से निजात

राजा राम मोहन राय का सारा जीवन महिलाओं के हक के लिए संघर्ष करते हुए बीता। दरअसल उनके इस संघर्ष की शुरुआत तब हुई जब उनकी भाभी को सती होना पड़ा था। राजा राम मोहन राय किसी काम के लिए विदेश गए थे और इसी बीच उनके भाई की मृत्यु हो गई। उसके बाद समाज के ठेकेदारों ने सती प्रथा के नाम पर उनकी भाभी को जिंदा जला दिया। इसके बाद मोहन राय ने सती प्र‍था के खिलाफ अपने आंदोलन छेड दिया। उन्होंने समाज में फैली उसकी इन कुरीतियों के खिलाफ गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक की मदद से साल 1929 में सती प्रथा के खिलाफ कानून बनवाया।जिससे महिलाओ की स्थिति में सुधार आया और उन्हें अपना जीवन जीने का मौका हासिल हुआ।

परिवार और समाज में झेलना पड़ा विद्रोह

एक बेहद साधारण ब्राह्मण परिवार जन्में राजा राम मोहन राय के माता- पिता काफी धार्मिक प्रवृत्ति के थे और उनका शुरू से ही ईश्वर में विश्वास था। किन्तु राज राम मोहन राय शुरू से ही अपने माता- पिता से इस बात को लेकर तर्क मांगते थे कि आखिर वे मूर्ति पूजा और पेंड़ो की पूजा क्यों करते है। उनके माता- पिता उन्हें केवल एक ही जवाब देते थे, कि भगवान की पूजा से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, लेकिन वे उनकी इन जवाबों से संतुष्ट नहीं थे। अक्सर उनके इस तरह के सवालों से परिवार और समाज में उन्हें काफी विद्रोह का सामना करना पड़ा था।

राम मोहन राय
राम मोहन राय

कई भाषाओं के जानकार थे राजा राम मोहन राय

राजा राम मोहन राय को कई भाषाओं का ज्ञान था।इन्हें अपने गाँव की ही एक स्कूल में संस्कृत और बंगाली की शिक्षा प्राप्त हुई। उन्होंने घर पर ही पारसी भाषा सीखी थी। राजा राममोहन राय एक बार घर छोडकर भी चले गए थे। तब उन्होंने इस दौरान कई राज्यों का भ्रमण किया था। इस दौरान उन्होंने अलग- अलग भाषाएँ सीखी। पटना में रह कर राय ने अरबी और फारसी भाषा का अध्ययन किया। पटना उस समय मुस्लिम संस्कृति का प्रसिद्ध केंद्र था। इसके बाद ये वाराणसी गए वाराणसी में इन्होने संस्कृत का ज्ञान अर्जित किया हिन्दू धर्म में सभी ग्रंथो को पढ़ा। राय बेहद ही जानकार थे उन्होंने कई धर्मों के धर्म ग्रन्थ का अध्ययन किया और उनके वास्तविक अर्थ को भी समझा।

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राजा राम मोहन राय की हुई थी तीन शादियां

राजा राम मोहन राय की तीन शादियां हुई थीं पर दुर्भाग्यवश इनकी तीनों ही पत्निया कम समय में ही मृत्यु को प्राप्त हो गईं। राय की पहली शादी 9 साल की उम्र में हुई थी, लेकिन किसी कारणवश इनकी पहली पत्नी की मृत्यु हो गई थी। 10 साल की उम्र में उन्होंने दूसरी शादी की। दूसरी पत्नी से इनके दो बेटे हुए पर कुछ दिनों बाद दूसरी पत्नी का भी देहांत हो गया। फिर इन्होंने तीसरी शादी की लेकिन उनकी यह शादी भी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई उनकी तीसरी पत्नी का भी देहांत हो गया। उनकी तीन शादियों के चलते उन्हें समाज में बहुविवाही कहा जाने लगा था।

1830 में हुई मृत्यु

राजा राममोहन राय 1830 में मुगल सम्राट के दूत बनकर किसी काम के लिए इंग्लैंड गए थे। यात्रा के दौरान राममोहन राय को मेनिंगजइटिस होने से 27 सितंबर 1833 में इनकी मृत्यु हो गई।