नयी दिल्ली: CBI निदेशक आलोक वर्मा ने 77 दिन बाद अपना कार्यभार संभाल लिया है। केन्द्र सरकार ने 23 अक्टूबर 2018 को देर रात आदेश जारी कर वर्मा के अधिकार वापस लेकर उन्हें जबरन छुट्टी पर भेज दिया था। इस कदम की व्यापक स्तर पर आलोचना हुई थी। हालांकि इस आदेश को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया।

वर्मा और उप विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ एजेंसी ने भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया था। दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेजने वाला अक्टूबर का यह आदेश एजेंसी के इतिहास में सरकार के हस्तक्षेप का यह अपनी तरह का पहला मामला था। सरकार ने न्यायालय में यह कहकर अपने निर्णय को सही ठहराने की कोशिश की कि एजेंसी के दो वरिष्ठतम अधिकारी एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे थे ऐसे लड़ाई झगड़े में यह कदम उठाना आवश्यक था लेकिन शीर्ष अदालत ने उनकी यह दलील खारिज कर दी।

सरकार ने तत्कालीन संयुक्त निदेशक एम. नागेश्वर राव को वर्मा का कार्यभार सौंप दिया था, जिन्हें बाद उन्हें एजेंसी का अतिरिक्त निदेशक बना दिया गया था। वर्मा ने इस कदम को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी। उच्चतम न्यायालय ने वर्मा को जबरन छुट्टी पर भेजने के केन्द्र के निर्णय को रद्द कर दिया, हालांकि वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर CVC की जांच पूरी होने तक उन पर (वर्मा) कोई भी महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेने पर रोक लगाई है। महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों की कोई स्पष्ट व्याख्या ना होने से इस बात पर असमंजस है कि वर्मा की शक्तियां कहां तक सीमित होंगी।

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उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि वर्मा के खिलाफ आगे कोई भी निर्णय CBI निदेशक का चयन एवं नियुक्ति करने वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा लिया जाएगा। आलोक कुमार वर्मा का केन्द्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के निदेशक के रूप में दो वर्ष का कार्यकाल 31 जनवरी को पूरा हो रहा है।

शीर्ष अदालत ने फैसले में विनीत नारायण प्रकरण में दी गई अपनी व्यवस्था और इसके बाद कानून में किए गए संशोधन का जिक्र करते हुए कहा कि विधायिका की मंशा CBI निदेशक के कार्यालय को हर तरह के बाहरी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रखने और CBI की संस्था के रूप में निष्ठा और निष्पक्षता बरकरार रखने की रही है। बाद में लोकपाल अधिनियम के जरिए CBI निदेशक के चयन का काम 'चयन समिति' को सौंप दिया गया था। चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्षी दल के नेता और प्रधान न्यायाधीश शामिल होते हैं।