लखनऊ : गरीब सवर्णों को 10% आरक्षण देने के केंद्र सरकार के फैसले के बीच उत्तर प्रदेश में पिछड़ों के आरक्षण को लेकर दो सहयोगी दलों के परस्पर विरोधी रुख ने सत्तारूढ़ भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा कर दी हैं। प्रदेश में भाजपा के सहयोगी दल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) ने जहां पिछड़ों के आरक्षण में आरक्षण संबंधी सामाजिक न्याय समिति की सिफारिश लागू करने के लिए भाजपा को 100 दिन का अल्टीमेटम दिया है, वहीं उसके दूसरे सहयोगी अपना दल-सोनेलाल ने इस रिपोर्ट के आधार पर ही सवाल उठाते हुए सख्त रुख अख्तियार कर लिया है।

मुख्यतः जाति आधारित राजनीति वाले उत्तर प्रदेश में सियासी गुणा-भाग के लिहाज से पिछड़ों और वंचित वर्गों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में भाजपा के सामने इन वर्गों में पैठ रखने वाले अपना दल और सुभासपा को एक साथ साधने की चुनौती है। प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा पिछड़ों के आरक्षण में आरक्षण की संभावनाओं के अध्ययन के लिए पिछले साल मई में गठित सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट को लेकर सुभासपा और अपना दल का रुख परस्पर विरोधी है।

समिति की रिपोर्ट में पिछड़ों को तीन श्रेणियों पिछड़ा, अति पिछड़ा और सर्वाधिक पिछड़ा में बांटने की सिफारिश की गई है। अपना दल की संरक्षक और केंद्र में स्वास्थ्य राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने समिति की रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि जातीय जनगणना किए बगैर इस रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू नहीं किया जा सकता।

उनकी मांग है कि सरकार पहले जातीय जनगणना कराए उसके बाद ही इसकी सिफारिश लागू की जाए। उनकी दलील है कि 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' के आधार पर आरक्षण में आरक्षण दिया जाना चाहिए, लेकिन जब सरकार ने जातीय जनगणना कराई ही नहीं है तो आखिर किस आधार पर आरक्षण में आरक्षण की व्यवस्था की जाएगी। अनुप्रिया ने तल्ख लहजे में यह भी कहा कि अगर सरकार जातीय जनगणना कराए बगैर सामाजिक न्याय समिति की सिफारिशों को लागू करती है तो यही माना जाएगा कि वह पिछड़ों को आपस में लड़ाना और बांटना चाहती है।

दूसरी ओर, समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए लगातार दबाव बना रहे सुभासपा के अध्यक्ष और प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने भाजपा को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि अगर वह 100 दिनों के अंदर रिपोर्ट की सिफारिशें लागू नहीं करती है तो उनकी पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ छोड़ कर राज्य की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

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राजभर ने कहा कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि वह पिछड़ों के लिए आरक्षण में आरक्षण की व्यवस्था को लोकसभा चुनाव से छह महीने पहले लागू कराएंगे लेकिन अब तो लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने में बमुश्किल 100 दिन बाकी रह गए हैं। अगर सरकार ने 100 दिनों के अंदर कोटे में कोटे की व्यवस्था नहीं की तो उनकी पार्टी एकला चलो की राह अपनाएगी।

बहरहाल, सामाजिक न्याय समिति की सिफारिशों पर भाजपा के ही दो सहयोगी दलों के परस्पर विरोधी रुख से एक बात तय है कि अगले लोकसभा चुनाव में कम से कम उत्तर प्रदेश में स्थितियां खासी दिलचस्प हो सकती हैं।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग के लोगों की तादाद 44% है और यह आंकड़ा किसी भी पार्टी का सियासी भविष्य तय करने के लिए काफी है। लोकसभा चुनाव बेहद नजदीक है। ऐसे में भाजपा आरक्षण के मुद्दे पर अपने सहयोगी दलों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वह इस मुश्किल से कैसे पार पाती है।