नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई के लिए 5 जजों की संविधान पीठ का गठन किया है। यही पीठ आगामी 10 जनवरी से मामले की सुनवाई करेगी।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में बीते 8 सालों से लंबित राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई 10 जनवरी तक के लिए टाल दी गई थी।

अयोध्या विवाद पर जल्द सुनवाई की मांग वाली जनहित याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ के सामने राम जन्मभूमि मामले से जुड़ी कुल 15 याचिकाएं हैं जिसपर अब संविधान पीठ सुनवाई करेेगी।

बेंच गठन के साथ ही सुनवाई की प्रक्रिया का भी जल्द एलान हो सकता है। नई बेंच को ये अधिकार है कि वो मामले के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करे, ताकि मामले पर तेजी से सुनवाई हो सके। हालांकि इस बारे में पता 10 जनवरी को सुनवाई के बाद ही चल सकेगा।

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हिंदू महासभा के वकील ने मामले में रोजाना सुनवाई की अदालत से मांग की है। दलील दी गई कि अगर इस मामले पर रोजाना सुनवाई होती है तो दो महीने में फैसला आ सकता है।

वहीं इस केस में पक्षकार इकबाल अंसारी ने प्रधानमंत्री के उस बयान का समर्थन किया है जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जब तक ये मसला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तब तक सरकार अध्यादेश नहीं लाएगी।

उच्चतम न्यायालय ने पिछली सुनवाई में कहा था कि उसके द्वारा गठित एक उपयुक्त पीठ राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि मालिकाना विवाद मामले की सुनवाई की तारीख तय करने के लिए 10 जनवरी को आदेश देगी।

इस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वर्ष 2010 के आदेश के खिलाफ 14 याचिकाएं दायर हुई हैं। उच्च न्यायालय ने इस विवाद में दायर चार दीवानी वाद पर अपने फैसले में 2.77 एकड़ भूमि का सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच समान रूप से बंटवारा करने का आदेश दिया था। इससे पहले 29 अक्तूबर को न्यायालय ने इस मामले को ‘‘उपयुक्त पीठ'' के समक्ष जनवरी के प्रथम सप्ताह के लिये सूचीबद्ध किया था। बाद में अखिल भारत हिन्दू महासभा (एबीएचएम) ने एक अर्जी दायर कर सुनवाई की तारीख पहले करने का अनुरोध किया था परंतु न्यायालय ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था।

न्यायालय ने कहा था कि 29 अक्टूबर को ही इस मामले की सुनवाई के बारे में आदेश पारित किया जा चुका है। अखिल भारत हिन्दू महासभा (एबीएचएम) इस मामले में मूल वादियों में से एक एम सिद्दीक के वारिसों द्वारा दायर अपील में एक प्रतिवादी है। इससे पहले, 27 सितंबर, 2018 को तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत से 1994 के एक फैसले में की गयी टिप्पणी पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास नये सिरे से विचार के लिये भेजने से इनकार कर दिया था। इस फैसले में टिप्पणी की गयी थी कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।

यह मुद्दा अयोध्या भूमि विवाद की सुनवाई के दौरान उठा था। विभिन्न हिन्दू संगठन विवादित स्थल पर राम मंदिर का यथाशीघ्र निर्माण करने के लिये अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं। शीर्ष अदालत में शुक्रवार की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही थी क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को ही कहा था कि अयोध्या में राम मंदिर के मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अध्यादेश लाने के बारे में निर्णय का सवाल उठेगा।