भीमा-कोरेगांव में जुटे लाखों लोग, जानिए 100 साल पहले यहां क्या हुआ था?

भीमा कोरेगांव स्मारक पर जुटे लाखों लोग - Sakshi Samachar

पुणे: पिछले साल हुए जातिगत संघर्ष के विपरीत कोरेगांव भीमा लड़ाई की वर्षगांठ पर मंगलवार को नेताओं सहित करीब पांच लाख लोगों ने सौहार्दपूर्ण माहौल और भारी सुरक्षा के बीच स्तम्भ स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की जिसे दलित अपने गौरव का प्रतीक मानते हैं। इस साल का कार्यक्रम पिछले साल से काफी अलग था क्योंकि पिछले साल जहां इस कार्यक्रम को लेकर जातिगत संघर्ष हुआ था, वहीं मंगलवार को इस कार्यक्रम में सौहार्दपूर्ण माहौल दिखा। बीते साल भीमा कोरेगांव मामले में हुई हिंसा पर अदालती कार्रवाई जारी है।

स्थानीय लोगों ने श्रद्धांजलि देने पहुंचे लोगों का स्वागत उन्हें गुलाब देकर किया और उन्हें पानी तथा नि:शुल्क भोजन भी उपलब्ध कराया। मदद और स्वागत का यह सिलसिला सोमवार से ही चल रहा था। पिछले साल हुई हिंसा के मद्देनजर सुरक्षा एजेंसियां ड्रोन कैमरों और सीसीटीवी के जरिए चप्पे-चप्पे पर नजर रखे हुए थीं। गत वर्ष हुई हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे। पुलिस इस हिंसा के पीछे कथित माओवादी संपर्कों की जांच कर रही है। पुलिस का मानना है कि हिंसा 31 दिसंबर 2017 को पुणे में एल्गार परिषद के सम्मेलन में हुए भड़काऊ भाषणों के चलते भड़की थी।

यह भी पढ़ें:

कोरेगांव-भीमा मामले पर कई प्रतिष्ठित नागरिकों ने की SIT जांच की मांग

पुलिस ने बताया कि कम से कम पांच हजार पुलिसकर्मी, 1,200 होमगार्ड, राज्य रिजर्व पुलिस बल की 12 कंपनियां और 2,000 दलित स्वयंसेवी पेरने गांव के आसपास तैनात किए गए जहां लोगों ने स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की। विशेष पुलिस महानिरीक्षक विश्वास नांगरे पाटिल ने कहा कि पेरने गांव और इसके आसपास ऐहतियातन इंटरनेट सेवाएं रोक दी गईं। कोरेगांव भीमा में एक जनवरी 1818 को हुई लड़ाई में मारे गए सैनिकों की याद में ब्रितानिया हुकूमत ने ‘जय स्तम्भ' खड़ा किया था। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आज सुबह बताया कि बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती के साथ ही 500 सीसीटीवी कैमरे, 11 ड्रोन कैमरे और 40 वीडियो कैमरे लगाए गए। पुणे जिले की सीमा के पास पुलिस चौकियां स्थापित की गईं।

दलितों का मानना है कि 1818 की लड़ाई जातिवादी व्यवस्था पर जीत थी क्योंकि ब्रिटिश सेना में बड़ी संख्या में दलित महार सैनिक थे जिन्होंने पेशवाओं-मराठा शासन के ब्राह्मण संरक्षकों को हरा दिया था। पुलिस के अनुसार मराठवाड़ा, विदर्भ और उत्तरी महाराष्ट्र के दूरदराज के इलाकों तथा देश के अन्य हिस्सों से भी लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे। पेरने गांव के एक निवासी ने कहा, ‘‘यह इतिहास में पहली बार है जब दलित समु दाय के लोग इतनी बड़ी संख्या में जय स्तंभ पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे हैं।'' नवी मुंबई से पहुंचे रंजीत खंडारे ने कहा कि इस साल यहां आने वाले लोगों की संख्या दोगुनी है।

पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि लगभग 40 हजार लोग पास के वाधु बुद्रुक पहुंचे जहां 17वीं सदी के दलित आदर्श गोविन्द महार की समाधि है। सुबह के समय पहले-पहल श्रद्धांजलि देने वालों में भारिपा बहुजन महासंघ के नेता एवं संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के पौत्र प्रकाश आंबेडकर शामिल थे। महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री दीपक केसरकर, दलित नेता आनंदराज आंबेडकर, रोहित वेमुला की मां राधिका, भाजपा के राज्यसभा सदस्य अमर साबले भी श्रद्धांजलि देने पहुंचे। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले शाम के समय युद्ध स्मारक पहुंचे और श्रद्धांजलि दी।

भीमा कोरेगांव का इतिहास

एक जनवरी 2018 को महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में जमकर हिंसा हुई थी। पेशवाओं और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई इस लड़ाई में मराठा सेना की हार हुई थी। इस जंग में ईस्ट इंडिया कंपनी के महार रेडीमेंट के सैनिकों की बड़ी भूमिका थी। महार जाति दलितों में शुमार है। लिहाजा इसे सामंतवाद के खिलाफ वंचितों की लड़ाई के तौर पर हर साल याद किया जाता है। भीमा कोरेगांव में अंग्रेजों की जीत हुई थी, जबकि दलित वर्ग इसे साम्राज्यवाद की नहीं बल्कि सामंतवाद के खिलाफ जीत मानते रहे हैं।

Advertisement
Back to Top