भोपाल: मध्य प्रदेश में 230 सीटों के लिए वोटिंग जारी है। मतदान के दौरान कोई दिक्कत न हो इसके लिए चुनाव आयोग ने पुख्ता प्रबंध किया है। जिसकी अहम जिम्मेदारी राज्य में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांता राव निभा रहे हैं।

कांता राव ने इस बारे चुनाव के बारे में कई अहम जानकारियां दी। उनके मुताबिक प्रदेश में पहली बार सभी बूथों पर वीवीपैट मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। वीवीपैट के जरिए मतदाता अपने वोट और उम्मीदवार को लेकर किसी तरह के संशय की स्थिति में नहीं रहेंगे।

क्या है वीवीपैट?

वीवीपैट का पूरा नाम वोटर वेरीफ़ाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल है। इसके तहत वोट डालने के तुरंत बाद ही एक कागज की पर्ची बनती है। जिस पर उस उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न होता है, जिसके लिए वोट डाला गया है।

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किसी तरह के विवाद की स्थिति में ईवीएम में पड़े वोट के साथ वीवीपैट से निकली पर्ची का मिलान किया जा सकता है। हाल के चुनावों में ईवीएम में छेड़छाड़ को लेकर कई सवाल उठाए गए थे। हालांकि इन पर चुनाव आयोग ने पुख्ता जवाब दिया कि ईवीएम से छेड़छाड़ संभव नहीं है। वीवीपैट के इस्तेमाल से अब इस तरह के विवादों पर विराम लगने की उम्मीद है।

कैसे काम करता है वीवीपैट?

आप देख पाएंगे कि ईवीएम में एक शीशा लगा होता है। जिसपर वीवीपैट की पर्ची सात सेकंड तक देखी जा सकती है। मतलब ये कि इस पर्ची में मतदाता अपने उम्मीदवार को पहचान कर तस्दीक कर सकता है।

वीवीपैट मशीन पूरी तरह स्वदेशी जिसे 2013 में डिजाइन किया गया था। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया ने इस मशीन का निर्माण किया था।

साल 2013 में ही नागालैंड में इस मशीन का पहली बार इस्तेमाल किया गया था। जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने सराहना करते हुए इस मशीन के आगे इस्तेमाल को हरी झंडी दी थी।

बता दें कि चुनाव आयोग ने तीन साल पहले ही तय कर लिया था कि 2019 के चुनाव में वीवीपैट का पूर्ण इस्तेमाल शुरू हो जाएगा।

वीवीपैट मशीनों को बनाने के लिए चुनाव आयोग ने सरकार से 3174 करोड़ की मांग की थी। फिलहाल अभी तक केंद्र ने आयोग को या फिर निर्माता कंपनी को पूरी राशि मुहैया नहीं कराई है।