जानिए महाराष्ट्र में कब-कब लगा है राष्ट्रपति शासन 

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महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर बनी राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए ऐसी आशंका व्यक्त हो रही है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। हम आपको बताते हैं कि राज्य में कब-कब राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था...

महाराष्ट्र के इतिहास में अब तक 2 बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है। राज्य में पहली बार 17 फरवरी 1980 को तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार को विधानसभा में पर्याप्त बहुमत होने के बावजूद सदन भंग कर दिया गया था। इसकी वजह से राज्य में 17 फरवरी से 8 जून 1980 तक अर्थात 112 दिन तक राष्ट्रपति शासन लगा था।

उसी तरह राज्य में 28 सितंबर 2014 को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। उस वक्त राज्य की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने अपने सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) सहित अन्य दलों के साथ अलग हुआ था और विधानसभा को भंग किया गया था। दूसरी बार राज्य में 28 सितंबर 2014 से लेकर 30 अक्टूबर यानि 32 दिनों तक रहा था।

गौरतलब है कि हाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा सहित किसी भी दल को स्पष्ठ बहुमत नहीं मिला था। हालांकि भाजपा और शिवसेना ने मिलकर 50:50 फार्मूले के तहत चुनाव लड़ा था। चुनाव में भाजपा को जहां 105 सीटें मिली थी, जबकि शिवसेना को 56 सीटें हासिल हुई थी। चुनावी नतीजों के बाद शिवसेना सरकार में शामिल होने के लिए 50:50 फार्मूले के तहत ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री बनने की जिद्द पर अड़ गई। हालांकि भाजपा पहले से कहती रही है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ही होंगे।

महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर शिवसेना के प्रति भाजपा का रुख पहले से नरम रहा और उसने शिवसेना को गृहमंत्री सहित कैबिनेट में समान संख्या में मंत्री पद देने की पेशकश की थी। परंतु मुख्यमंत्री पद को लेकर अड़ी शिवसेना अपनी मांग को लेकर भाजपा के साथ चल रहे 30 साल पुराने गठबंधन को तोड़ते हुए शरद पवार की नेतृत्व वाली एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से राज्य में सरकार बनाने का फैसला किया और इसी के तहत उसने सोमवार रात राज्यपाल कोश्यारी के सामने पेश होकर सरकार बनाने का दावा ठोका है।

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राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिए मंगलवार शाम 8 बजे तक का वक्त दिया है। अगर शिवसेना सरकार बनाने के लिए अपना बहुमत साबित नहीं कर पाई तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगना तय है। गौरतलब है कि सरकार बनाने के लिए अपने पास पर्याप्त संख्याबल नहीं होने और शिवसेना के अडियल रुख को देखते हुए भाजपा सरकार बनाने के दावे से पहले ही पीछे हट गई है।

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