नई दिल्‍ली : छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाने वाले शरद यादव बिहार की राजनीति के साथ देश में बड़ा मुकाम हासिल किया है। शरद यादव को कभी गैरकांग्रेसवाद का प्रतीक माना जाता था लेकिन अब वह अपने वजूद को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दरअसल, लोकसभा चुनाव के बाद उनकी पार्टी, लोकतांत्रिक जनता दल का राजद में विलय होना था, लेकिन ढाई महीने गुजर जाने के बाद भी लोजद का राजद में विलय नहीं हो पाया है। आपको बता दें कि लालू यादव ने शरद को इसी शर्त पर मधेपुरा से राजद का टिकट दिया था कि उनकी पार्टी का विलय राजद में होगा।

दूसरी तरफ, पारिवारिक झगड़े ने लालू यादव को इस कदर उलझा दिया है कि अब उनकी विलय जैसे मामले में बहुत कम दिलचस्पी रह गयी है। दल की मौजूदा हालत से लालू बेहद परेशान हैं। ऐसी स्थिति में वे पार्टी पर कोई दूसरा बोझ नहीं डालना चाहते। चुनाव हार चुके शरद यादव को अब बोझ माना जा रहा है। वे रांची जा कर लालू यादव से मिल चुके हैं लेकिन उन्हें विलय के लिए हरी झंडी नहीं मिली है।

वहीं शरद यादव की पार्टी के नेता इस बात से चिंतित हैं कि अगर अभी राजद में प्रवेश नहीं मिला तो विधानसभा चुनाव के पहले बहुत दिक्कत होगी। हालत ये है कि शरद यादव न लालू का भरोसा जीत पा रहे हैं न अपने दल का। राजद के एक नेता का कहना है कि पार्टी अब 'रिजेक्टेड माल' जमा नहीं करना चाहती।

गैरकांग्रेसवाद के प्रतीक थे शरद यादव

1974 में जबलपुर लोकसभा का उपचुनाव जीत कर युवा शरद यादव ने देश की राजनीति में पहली बार ये संदेश दिया था कि महाशक्तिमान इंदिरा गांधी को हराया भी जा सकता है। इसके बाद वे गैरकांग्रेसवाद के सबसे बड़े प्रतीक बन गये। जनता पार्टी के दौर में वे देश के बड़े नेता रहे। 1989 में वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार में भी उनका कद बड़ा रहा। उनकी हैसियत किंगमेकर की थी।

1990 में जब बिहार में गैरकांग्रेस सरकार बनाने का समय आया तो देवीलाल और शरद यादव ने ही लालू यादव को मुख्यमंत्री बनाने में मदद की थी। वक्त का पहिया तेजी से घूमा। समय बदला तो शरद यादव अपने राजनीतिक भविष्य के लिए लालू पर ही निर्भर हो गये। लालू से तकरार हुई तो नीतीश के पास पहुंच गये। देश का यह बड़ा समाजवादी नेता अपने वजूद को बचाने के लिए कभी लालू तो कभी नतीश के दरबार में हाजिरी बजाने को मजबूर होता रहा।

स्वतंत्र पहचान बनाने में नाकाम

ऐसा नहीं है कि शरद ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश नहीं की। नीतीश से अलग होने के बाद उन्होंने 2018 में लोकतांत्रिक जनता दल के नाम से एक नया दल बनाया। इसमें जनता दल के कुछ पुराने नेता जैसे अर्जुन राय, उदय नारायण चौधरी शामिल हुए। लेकिन इस दल को कोई अहमियत नहीं मिली।

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शरद यादव ने नीतीश के खिलाफ कई यात्राएं की लेकिन जनमानस पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। बल्कि कहें तो जनता ने नकार दिया। लोकसभा चुनाव के समय शरद यादव वे महागठबंधन के एक घटक दल के रूप में चुनाव लड़ना चाहा तो लालू ने इंकार कर दिया। लालू ने शर्त रख दी कि सिर्फ शरद यादव को चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा और वह भी राजद के सिंबल पर। दूसरी शर्त ये थी कि चुनाव के बाद शरद को अपनी पार्टी का राजद में विलय करना होगा। मजबूर शरद को लालू की शर्त माननी पड़ी। लोकसभा चुनाव में हार कर सारी संभावनाओं पर पानी फेर दिया। अब शरद यादव की पार्टी राजद के लिए एक बोझ की तरह हो गई है।

शरद यादव को लेकर राजद में मतभेद

शरद यादव को लेकर राजद में दो तरह की राय है। एक पक्ष के मुताबिक, शरद की हैसियत भले कम हो गयी है लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बिल्कुल कम नहीं हुई है। तेजस्वी, तेजप्रताप और मीसा भारती की वजह से राजद में जिस तरह से खींचतान मची हुई है उन सब के बीच शरद यादव का पार्टी में आना ठीक नहीं रहेगा। वैसे भी विधानसभा चुनाव के लिए वे प्रभावकारी नहीं रहेंगे।

राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह चाहते हैं कि शरद यादव की पार्टी का राजद में विलय हो जाए। लेकिन शिवानंद तिवारी इस विलय के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि कोई भी नेता अपने दल के स्वतंत्र अस्तित्व को मिटते हुए देखना नहीं चाहता। बाद में दिक्कतें हो सकती हैं।

राजद का एक धड़ा मानता है कि शरद अब चुके हुए चौहान हैं। उनके आने से पार्टी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। जब वे खुद चुनाव नहीं जीत सकते तो दूसरे की जीत के लिए क्या प्रचार करेंगे। अगर उन्होंने अपनी पसंद के उम्मीदवारों को टिकट दिलाने की जिद पकड़ ली तो राजद के लिए और भी नुकसानदेह होगा।

राजद सु्प्रीमो लालू यादव अगर ठीक होते तो शायद वे शरद पर मेहरबान हो भी सकते थे लेकिन वे तो खुद मुश्किलों के दौर से गुजर रहे हैं। इस वजह से शरद यादव का मामला अधर में ही लटक गया है। अब आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगा की शरद यादव किया फैसला लेते हैं। इसके लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।