पटना : बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के सु्पीमो लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में अपेक्षाकृत कमजोर नजर आ रहे राजद के वोटबैंक में सेंधमारी की तैयारी शुरू हो गई है। बिहार में मुस्लिम और यादव समुदाय को आमतौर पर राजद का वोट बैंक माना जाता है। ऐसे में जदयू आरजेडी के इसी वोट बैंक में सेंध लगाने की जुगत में है। चर्चा इस बात की भी हो रही है कि बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी दलों के मुस्लिम नेताओं की पसंद के साथ मजबूरी बनते जा रहे हैं?

दरअसल विपक्षी राजद और कांग्रेस के नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के कामकाज की तारीफ और फिर उनकी पार्टी में शामिल होने की होड़ लगी है। ऐसे में यह सवाल और भी ज्यादा पूछा जाने लगा है कि भले ही नीतीश कुमार भाजपा के साथ सरकार चला रहे हैं लेकिन वे क्या बिहार की राजनीति में सक्रिय मुस्लिम नेताओं की पहली पसंद हैं?

 अब्दुल बारी सिद्दिकी और नीतीश कुमार 
अब्दुल बारी सिद्दिकी और नीतीश कुमार 

हाल ही में जब चार बार राजद से सांसद मोहम्मद अली अशरफ फातमी ने जदयू विधिवत रूप से ज्वाइन किया। उनसे पहले राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दिकी सदन के अंदर और बाहर बार-बार यह संदेश दे चुके हैं कि अब उन लोगों की राजनीति के तारणहार नीतीश ही हो सकते हैं।

अब यह भी चर्चा है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद भी देर सबेर जदयू का रुख कर सकते है। इसमें किसी को आश्चर्य की बात नहीं होगी। कांग्रेस नेता शकील अहमद खान ने भी बार-बार संकेत दिया है कि बिहार में नीतीश कुमार से अच्छा कोई प्रशासक नहीं है और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का अब कोई सवाल नहीं है।

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अधिकांश मुस्लिम नेताओं का मानना है कि अगर अगले विधानसभा चुनाव में राजद के साथ गठबंधन करके चुनाव मैदान में जाएंगे तो हार मिलना निश्चित है। लेकिन अगर नीतीश का साथ हो जाते हैं तो उन्हें कोई पराजित भी नहीं कर सकता।

सीएम नीतश कुमार
सीएम नीतश कुमार

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मुस्लिम नेताओं का यह भी मानना है कि जब तक नीतीश कुमार का नेतृत्व है तब तक भाजपा एक सीमा से ज़्यादा अपने एजेंडा को लागू नहीं कर सकती। इसका उदाहरण पिछले साल रामनवमी के बाद तब देखने को मिला जब दंगा भड़काने के आरोप में केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे को भी जेल की हवा खिलाने में नीतीश कुमार ने देर नहीं की।

राजनीतिक समीक्षक सुरेंद्र किशोर मानते हैं कि ‘राजनीति में वोटबैंक किसी की मिल्कियत नहीं होती। कोई भी दल कमजोर होगा तो मतदाता उससे छिटकेंगे और दूसरे दल उसे रोकेंगे। यही हाल आज बिहार में है। हालांकि, इसके लिए 2020 के विधानसभा चुनाव का इंतजार करना होगा।’