पटना : लोकसभा चुनाव के बाद देश के अन्य राज्यों में राजनीतिक स्थिरता नजर आ रही है, लेकिन बिहार में सरगर्मी बढ़ी हुई है। भाजपा और नीतीश कुमार के बीच बढ़ती दूरी, राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर का ममता बनर्जी से जुड़ना बहुत कुछ बयां कर रहे हैं।

अब सवाल उठ रहा है कि पश्चिम बंगाल में पीके भाजपा के खिलाफ रणनीति बनाएंगे। जबकि केंद्र और बिहार में जेडीयू और भाजपा सहयोगी हैं। ऐसे में पीके भाजपा को हराने के लिए बंगाल में ममता का साथ देंगे, जिसमें कहीं न कहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भी सहमति होगी, क्योंकि पीके जेडीयू के उपाध्यक्ष भी हैं। बिना नीतीश कुमारके सहमति के पीके इस तरह का कदम नहीं उठा सकते हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नीतीश कुमार इस तरह के फैसले इसलिए ले रहे हैं, ताकि वह भाजपा से अलग हो सकें। नीतीश कुमार ने कुछ दिन पहले ही अपने एक बयान के जरिए यह संदेश दे चुके हैं कि उन्हें किसी भी दल से गठबंधन से परहेज नहीं है।

दूसरी तरफ नीतीश कुमार को मालूम है कि मोदी सरकार कश्मीर में अनुच्छेद-370, 35 ए और राम मंदिर निर्माण जैसे मुद्दों से पीछे नहीं हटने वाली है। जबकि नीतीश कुमार की इस मामले में अलग राय है। ऐसे में नीतीश मोदी सरकार से किनारा करके अलग राह पकड़ना चाहते हैं।

जेडीयू ने किया अनबन से इनकार

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से बाहर रहने के फैसले के बाद गठबंधन में अनबन की खबरों को नकारते हुए बिहार में सत्तारूढ़ दल जनता दल यूनाईटेड (जदयू) ने शुक्रवार को कहा कि राज्य में राजग पूरी तरह एकजुट है। जदयू महासचिव रामचंद्र प्रसाद सिंह ने बिहार के शेखपुरा में संवाददाताओं से कहा कि जदयू पूरी दृढ़ता से गठबंधन में है और अस्थिरता की अटकलें बेबुनियाद है।

यह भी पढ़ें :

राहुल गांधी नहीं माने तो ये होंगे कांग्रेस के नए अध्यक्ष

संघ की राह पर अखिलेश, अकेले दम पर तैयार करेंगे नई फौज

बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने केंद्र की भाजपानीत राजग सरकार में जदयू को प्रतीकात्मक तौर एक मंत्रीपद की पेशकश को अस्वीकार करते हुए मंत्रिपरिषद में शामिल होने से इंकार कर दिया था। लेकिन उन्होंने अपने सहयोगी के साथ किसी भी मतभेद से इनकार किया था।